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न रौशनी हम प' पड़ती है

na raushani hum pa paDti hai

सुनील मिश्र

सुनील मिश्र

न रौशनी हम प' पड़ती है

सुनील मिश्र

और अधिकसुनील मिश्र

    रौशनी हम प' पड़ती है हम रौशनी में पड़ते हैं

    अँधेरों में बैठकर हम ताजों में नगीने जड़ते है

    चमक देखी कोई हमने हमको यही मालूम हुआ

    क्या बनाते हैं हम लोग जिस पर इतना अकड़ते हैं

    ख़ुद से इश्क-सा होने लगा है जब से यह जाना है

    हम सरीखे लोग भी कभी-कभी आँखों में गड़ते है

    ज़मीं सहमी-सी रहती है फ़िज़ा ख़ामोश रोती है

    कहर की आँधियों में जब हरे हरे शजर उखड़ते हैं

    ज़मीं पर रहना है और सच्चाइयों में जीना भी है

    सच आँखों में रखते हैं तो ख़्वाब हम से लड़ते हैं

    सड़क पर घर बनाने के कोई हालात क्या पूछे

    यक़ीं तो तब ही आता है जब अपने घर उजड़ते हैं

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुनील मिश्र
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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