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सुनि के रोअइया मजूरवन के पूतवन के

suni ke roaiya majurvan ke putvan ke

विजेन्द्र अनिल

विजेन्द्र अनिल

सुनि के रोअइया मजूरवन के पूतवन के

विजेन्द्र अनिल

और अधिकविजेन्द्र अनिल

    सुनि के रोअइया मजूरवन के पूतवन के, फाटे ला करेजवा हमार,

    भोरहीं मचेला कोहराम रोज घरवा में, लड़ेलन रोजे चारि बार।

    गुरवा-मिठइया सपने में लउकेला, मिलेला उहनीं के भात,

    सतुआ के लिबरी फजिरहीं खा चाटेलन स, ओही कटेला दिन रात।

    रोजे-रोजे सतुओ भेंटाला नाहीं भोरवा में, कटि जाला कबहूँ उपास,

    दिन भर आसरा में ताकेलन टुकुर-टुकुर मिटि जाला रतिया में आस।

    देहिया में बाटे एगो फटही भगइया हो, एगो बड़ुए फटही कमीज,

    ओहू में से निकलेला मंहक पसेनवा के, भरल बड़ुए ओहु में गलीज।

    अँखिया उठा के जब ओह पाटी ताकीला त, लउकेला पाकवा के घर,

    ओही रे महलिया में राजा बाबू राजकरसु, करेलन सगरे कहर।

    भोरवा में चाभेलन खोउआ-मलइया हो, दूधवा से रोज लागे भोग,

    चेरिया-लंउड़ियन के कमी ना महलिया में, देखीं सभे सनजोग।

    केहू के मिलत नइखे फटही लुगरिया हो, सतुओ भेंटात नइखे रोज,

    केहू घरे छने रोज-रोज मलपुअवा हो, रोजे-रोजे होला महाभोज।

    दूनो जाना हवन एके देसवा के पूतवा हो, काहे बड़ुए अतना के फेर,

    जागऽ जागऽ जागऽ अब देस के पहरुआ हो, खतम करेके बा अन्हेर।

    स्रोत :
    • पुस्तक : विजेन्द्र अनिल के गीत (पृष्ठ 7)
    • रचनाकार : विजेन्द्र अनिल
    • प्रकाशन : संरचना प्रकाशन, आरा
    • संस्करण : 1993

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