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सुनऽ सुनऽ संघतिया हमार बतिया

sunऽ sunऽ sanghatiya hamar batiya

विजेन्द्र अनिल

विजेन्द्र अनिल

सुनऽ सुनऽ संघतिया हमार बतिया

विजेन्द्र अनिल

और अधिकविजेन्द्र अनिल

    सुनऽ सुनऽ संघतिया हमार बतिया।

    पोथी पतरा ना हमरा बुझाला

    सगरे बिनाइल बा मकरी के जाला,

    पेटवे के फिकिर में बीते रतिया।

    घरवा में बानीं जा दुइए परानी

    दादा के छावल टुटही पलानी

    सांवग ना लागल कि बने खटिया।

    माथा से उतरे ना करजा के बोझा

    हँसे के मिलल मउगी के सोझा

    दुखवा-दरदवा से भरल छतिया।

    कान्ह जुआठ अउर हथवा में पैना

    चिरंई हम हईं जेकर कतरल बा डैना

    हमरे लगवले बा सभे घतिया।

    लोग कहे भोर भइल, घाम छितराइल

    हमरा तनिको ना फरक बुझाइल,

    मरले बा केहू हमार मतिया।

    सुनऽ सुनऽ संघतिया हमार बतिया।

    स्रोत :
    • पुस्तक : विजेन्द्र अनिल के गीत (पृष्ठ 13)
    • रचनाकार : विजेन्द्र अनिल
    • प्रकाशन : संरचना प्रकाशन, आरा
    • संस्करण : 1993

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