Font by Mehr Nastaliq Web

श्वेत पाँवों को पायल न पहना सका

shvet panvon ko payal na pahna saka

रत्नेश अवस्थी

रत्नेश अवस्थी

श्वेत पाँवों को पायल न पहना सका

रत्नेश अवस्थी

और अधिकरत्नेश अवस्थी

    श्वेत पाँवों को पायल पहना सका

    पग महावर धरे द्वार तक गए,

    रास्तों में गुजारे हर अवरोध को,

    कंटकों से हमें मिल गए बोध को,

    एक चंचल-सी तितली ने जारी रखा,

    रोज़ शामों-सहर प्रेम के शोध को,

    हम सदा ही डरे एक होने से पर,

    दो किनारे स्वयं धार तक गए,

    इतने उलझे रहे हम सुलझते ही क्या,

    एक धुन में चले थे तो रुकते ही क्या,

    रात पूनम की थी साथ में तुम वहाँ,

    फिर नदी में गिरा चाँद करते ही क्या,

    वो नदी में पड़ा कह रहा था कि तुम,

    एक-दो से निकल चार तक गए,

    संकुचित हो क़दम आगे बढ़ने लगे,

    रोज़ रस्मों रिवाजों से लड़ने लगे,

    जाति के धर्म के सारे भ्रम तोड़कर,

    मन की गोपन कथाएँ भी पढ़ने लगे,

    आज कुमकुम भरे पग लिए द्वार से,

    पार देहरी के परिवार तक गए,

    स्रोत :
    • रचनाकार : रत्नेश अवस्थी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

    संबंधित विषय

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY