Font by Mehr Nastaliq Web

रजधानी को सन्नाटों की

rajdhani ko sannaton ki

रत्नेश अवस्थी

रत्नेश अवस्थी

रजधानी को सन्नाटों की

रत्नेश अवस्थी

और अधिकरत्नेश अवस्थी

    रजधानी को सन्नाटों की,

    कवियों कुकुरों की भाटों की,

    इन्हें ज़रूरत-सी लगती है,

    बहरे कानों पर चाटों की,

    तुमने क्या आबाद किया है,

    केवल सब बर्बाद किया है,

    चुप्पी रखते रखते तुमने,

    शहर मुर्शिदाबाद किया है,

    जाने कैसे खुलेगी इनसे,

    साँकल बंद कपाटों की,

    इन्हें ज़रूरत-सी लगती है,

    बहरे कानों पर चाटों की,

    भूल गए सब भाई चारा,

    पकड़ लिया हाथों में आरा,

    आओ खाओ लूटो मारो,

    जैसे भी हो करो किनारा,

    घर से सबको बेघर कर के,

    छाई मड़इया है टाटों की,

    इन्हें ज़रूरत-सी लगती है,

    बहरे कानों पर चाटों की,

    तुमसे क्या कुछ हो पाएगा,

    सबका घर जब जल जाएगा,

    कलकत्ता से लेकर दिल्ली,

    जब लाशों से पट जाएगा,

    एक नया फ़रमान मिलेगा,

    बड़ी ज़रूरत है घाटों की,

    इन्हें ज़रूरत-सी लगती है,

    बहरे कानों पर चाटों की,

    स्रोत :
    • रचनाकार : रत्नेश अवस्थी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY