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उदयनाचार्य

udaynacharya

कालीकान्त झा ‘बूच’

कालीकान्त झा ‘बूच’

उदयनाचार्य

कालीकान्त झा ‘बूच’

और अधिककालीकान्त झा ‘बूच’

    अभिनव अवध ललाम,

    जतऽ उदयनक घरारी।

    पावन करियन गाम,

    जतऽ उदयनक घरारी।

    सिंहमात्र पशु आरो किछु नहि,

    हम मनुष्य छी उदयन कहि।

    पौलनि विजय विराम,

    जतऽ उदयनक घरारी।

    वर्णित अछि भावी पुराण मे,

    परिशिष्टां के अछि प्रमाण मे।

    उतरल छल गोधाम,

    जतऽ उदयनक घरारी।

    हीर गर्व के कयल विखंडित,

    जे छल बौद्धक उद्भट पंडित।

    पसरल सगरो नाम,

    जतऽ उदयनक घरारी।

    भक्ति भावना मूक बनल छल,

    नास्तिकता बन्दूक बनल छल।

    थर-थर लोक तमाम,

    जतऽ उदयनक घरारी।

    भेल सनातन पुर्नस्थापित,

    हत् उत्साह बौद्ध अभिशापित।

    निर्भय चारू धाम,

    जतऽ उदयनक घरारी।

    आओल माधव चमत्कार लऽ,

    आचार्यक अंशावतार लऽ।

    पसरल ख्याति तमाम,

    जतऽ उदयनक घरारी।

    आक्रोशित भऽ जगन्नाथ पर,

    पौलनि हत्या दोष मुँक्तिवर।

    भेटल यश विश्राम,

    जतऽ उदयनक घरारी।

    एक हाथ मे ज्ञान सुदर्शन,

    तर्क गदा दोसर मे सदिखन।

    वाक्युद्ध अविराम,

    जतऽ उदयनक घरारी।

    सूर्य पूब उगथि असत्य अछि,

    उदयाधरित दिशा तथ्य अछि।

    नवदृष्टिक आयाम

    जतऽ उदयनक घरारी।

    तेसर कर कमलक कुसुमांजलि,

    चरिम मे शंखक किरणावलि।

    नर भऽ प्रगटल श्याम,

    जतऽ उदयनक घरारी।

    आइ जतऽ अछि तरूवर पीपर,

    छल एहीं ठाँ आचार्यक घर

    पर्णकुटी विच गाम,

    जतऽ उदयनक घरारी।

    हंस भट्ट वेदान्त अरण्यक,

    सिंहबनल पहुँचल मिथिला तक।

    छूटल सभ केँ घाम,

    जतऽ उदयनक घरारी।

    आगाँ पूजा पुष्पक बारी,

    पाछाँ साग पात तरकारी।

    जीवन क्रम निष्काम,

    जतऽ उदयनक घरारी।

    बौद्धक विद्वान धुरंधर,

    वैदिक केँ ललकारि घरे घर।

    भेल जयी सभ ठाम,

    जतऽ उदयनक घरारी।

    अर्थाभाव आत्मसम्मानी,

    घर अन्हार किरणा बलिदानी।

    सम-यम नियम विराम,

    जतऽ उदयनक घरारी।

    आबि गेल उदयन सँ भीरऽ,

    लागल ज्ञानक गुद्दी तीरऽ।

    जहिना कुकुरक चाम,

    जतऽ उदयनक घरारी।

    सकशास्त्र मे अजेय छथि,

    दर्शन मे तेँ अपरिमेय छथि।

    गर्वित ध्वनित खराम,

    जतऽ उदयनक घरारी।

    तर्क-वितर्कक गोला छूटल,

    प्रतिमा पुंजक ज्वाला फूटल।

    अविरल आठोधाम,

    जतऽ उदयनक घरारी।

    एखनहुँ आस्तिकता उत्साहित,

    कयलनि भगवत् भक्ति प्रवाहित।

    अनिरूद्ध उगन्त, बलराम,

    जतऽ उदयनक घरारी।

    अपना केँ सिंह मानि कऽ,

    लागल गरजऽ फानि फानि कऽ।

    निर्भय वारे आम,

    जतऽ उदयनक घरारी।

    डीहक पाँजरि सुमन फुलाओल,

    बुद्धिनाथ आरसी आओल।

    मणिपाठक केर ठाम,

    जतऽ उदयनक घरारी।

    अरूण, तरूण, चन्द्रभानु, प्रवासी,

    नमथि डीह लग मिथिला वासी।

    विकल जपै छथि नाम,

    जतऽ उदयनक घरारी।

    पीपर तर आचार्य गुप्त छथि,

    तेज प्रखार यद्यपि शुशुप्त छथि।

    शतशः हमर प्रणाम,

    जतऽ उदयनक घरारी।

    स्रोत :
    • पुस्तक : कलानिधि (पृष्ठ 75)
    • रचनाकार : कालीकान्त झा ‘बूच’
    • प्रकाशन : श्रुति प्रकाशन, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2010

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