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हमरा गाममे

hamra gamme

मार्कण्डेय प्रवासी

और अधिकमार्कण्डेय प्रवासी

    एक अनजानल शहर बसि रहल हमरा गाममे!

    आदमीकेँ आदमी डँसि रहल हमरा गाममे!!

    आधुनिकता जाम लेने

    सड़कपर टहलैत अछि

    तेज गति पयबाक इच्छा

    हृदयमे धड़कैत अछि

    पाँकमे आदर्श अछि फँसि रहल हमरा गाममे!

    देह रहिते नेह—

    कर्पूरे-जकाँ उड़ि रहल अछि

    एक घटना अन्य घटनासँ

    सतत जुड़ि रहल अछि

    द्वेष दसकंधर बनल हँसि रहल हमरा गाममे!

    अछि कतहु जँ भूख तँ

    अनपच कतहु ढकरैत अछि

    पशु-जकाँ रोटीक खातिर

    आदमी झगड़ैत अछि

    जीवनक व्याकरण अछि घसि रहल हमरा गाममे!

    अछि उपटि चलि गेल

    पुरना डीहसँ शालीनता

    आचरणमे नहि झलकि

    पबइछ पुरान कुलीनता

    खाधिमे अपनत्व अछि खसि रहल हमरा गाममे!

    एक अनजानल शहर बसि रहल हमरा गाममे!!

    स्रोत :
    • पुस्तक : हम भेटब (मैथिली गीत-नवगीत संग्रह) (पृष्ठ 66)
    • रचनाकार : मार्कण्डेय प्रवासी
    • प्रकाशन : जखन-तखन, दरभंगा
    • संस्करण : 2004

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