Font by Mehr Nastaliq Web

मेघ उमड़े-घुमड़े घनघोर

megh umDe ghumDe ghanghor

रमाकान्त मुकुल

रमाकान्त मुकुल

मेघ उमड़े-घुमड़े घनघोर

रमाकान्त मुकुल

और अधिकरमाकान्त मुकुल

    प्यासल धरतीं अकुला के

    ताके अम्बर के ओर

    मेघ उमड़े-घुमड़े घनघोर

    मूर्च्छित धरती के मुँह पर

    पानी के छींटा मारे

    जब ले आँख खुले ना तब ले

    बरस बरस पुचकारे

    पकड़ इन्द्रधनुषी आँचर के

    उड़ा रहल बा छोर

    मेघ उमड़े-घुमड़े घनघोर

    अन्तर के अनकहल पीर

    जागल जाग बुताइल

    छलक पड़ल रस के गागर

    धरती के हिय जुड़ाइल

    ताप-शाप से मुक्ति मिल गइल

    वन में नाचत मोर

    मेघ उमड़े-घुमड़े घनघोर

    स्रोत :
    • पुस्तक : आँचर के टुकड़ा (पृष्ठ 14)
    • रचनाकार : रमाकान्त मुकुल
    • प्रकाशन : भोजपुरी संस्थान, पटना
    • संस्करण : 2003

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY