Font by Mehr Nastaliq Web

मैथिल-मनसँ पढ़िअउ!

maithil manasan paDhiau!

मार्कण्डेय प्रवासी

मार्कण्डेय प्रवासी

मैथिल-मनसँ पढ़िअउ!

मार्कण्डेय प्रवासी

और अधिकमार्कण्डेय प्रवासी

    रजत-पत्रपर खचित कयल हम—

    स्वर्णिम गीतक भाषा,

    एकरे नाम मैथिली छै,

    मैथिल-मनसँ पढ़िअउ!

    द्वेषक चिता धधकने रागक सिद्धि-साधना सम्भव

    प्रेम मधुरता दैछ, घृणा अछि लाल ओल-सन कबकब

    फेकि निराशा, संचित रखलहुँ—

    रक्षित मोनक आशा,

    एकरे हम लिपिबद्ध कयल,

    मैथिल-मनसँ पढ़िअउ!

    शाश्वत परम्पराक अद्यतन खनन-रत्न अइ मे अछि

    अछि वैह वेद, जीवन-स्वर संरक्षित जइ मे अछि

    विश्वासक ब्रह्मास्त्र लिखल,

    अपनत्वक आश्रम सेहो,

    सभ किछु भेटि सकत अइ मे—

    मैथिल-मनसँ पढ़िअउ!

    साँप-गोजरक संशय त्यागू, आँखि-पाँखि गरुड़क भेटत

    हृदय-प्राण राधामय हो तँ, अभरि कृष्ण मुरली टेरत

    संघर्षक हुंकारो भेटत,

    त्यागपूर्ण स्वीकारो,

    भारतीयता चाही तँ—

    मैथिल-मनसँ पढ़िअउ!

    स्रोत :
    • पुस्तक : हम भेटब (मैथिली गीत-नवगीत संग्रह) (पृष्ठ 25)
    • रचनाकार : मार्कण्डेय प्रवासी
    • प्रकाशन : जखन-तखन, दरभंगा
    • संस्करण : 2004

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY