Font by Mehr Nastaliq Web

हमको अब वरदान न देना!

hamko ab vardan na dena!

स्वरिका कीर्ति

स्वरिका कीर्ति

हमको अब वरदान न देना!

स्वरिका कीर्ति

और अधिकस्वरिका कीर्ति

    मान सहित स्वीकार पराजय

    अपमानित यशगान देना!

    हमको अब वरदान देना!

    देव! तुम्हारे देवालय में हमने कितने दीप जलाए

    कर कर के मनुहार भाग्य के रूठे सभी नक्षत्र मनाए,

    किंतु कभी इन उपवासों का कोई फलित परिणाम पाया,

    जीवन की अविराम थकन को, दो पल का आराम आया,

    अब पीड़ा उत्सव लगती है,

    अब इसको अवसान देना!

    मधुमय मौसम जिस उपवन के सारे बीत गए एकाकी,

    उन कलियों में खिल जाने की कोई चाह नहीं है बाकी,

    जिनकी ये ही नियति उन्हें पतझड़ के सारे दिन जीने हैं,

    कंठ जिन्हें अभ्यास कि उनको घूँट विषैले ही पीने हैं,

    अब उनको ये चाह नहीं है,

    अब उनको सम्मान देना!

    भाग्य तुम्हे आभार कि तुमने नहीं राह में फूल बिछाए,

    जग से जितना सिमटे, उतना हम अपने अंतर में आए,

    जिसने विरह नहीं जानी, उसने कुछ भी अभिसार जाना,

    जिसको दुख ने छुआ नहीं, उसने जीवन का सार जाना,

    दुख जिनके जीवन का तप है,

    सुख देकर व्यवधान देना!

    स्रोत :
    • रचनाकार : स्वरिका कीर्ति
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY