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के देई गुड़ रोटी

ke dei guD roti

भोलानाथ गहमरी

भोलानाथ गहमरी

के देई गुड़ रोटी

भोलानाथ गहमरी

और अधिकभोलानाथ गहमरी

    चलऽ हो धनियाँ, काटीं सोना चानी।

    चलऽ हो धनियाँ…

    गउवाँ के बहरे बा, खेत-खरिहनवाँ,

    नाचेला जिनिगी के जहवाँ सपनवाँ,

    हमरी धरतिया बा जियरा के रानी।

    चलऽ हो…

    सगरे सिवनियाँ में लागल बा मेला,

    कइसे के जाईं तोहें छोड़ि के अकेला,

    के देई गुड़-रोटी के देई पानी।

    चलऽ हो…

    दाना से दाना बा हमके कमाना,

    जांगर के बूता से परवत उठाना,

    लगन लगाईं जा दुनहूँ परानी।

    चलऽ हो…

    जब-जब डोले धनीं पछुवा बयरिया,

    मन डोले आँगन से खेतवा बधरिया,

    लहर-लहर लहरे हमार जिन्दगानी।

    चलऽ हो…

    स्रोत :
    • पुस्तक : लोक रागिनी (पृष्ठ 117)
    • रचनाकार : भोलानाथ गहमरी
    • प्रकाशन : रागिनी प्रकाशन, गाजीपुर
    • संस्करण : 1995

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