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झलकेले मोतिया

jhalkele motiya

भोलानाथ गहमरी

भोलानाथ गहमरी

झलकेले मोतिया

भोलानाथ गहमरी

और अधिकभोलानाथ गहमरी

    लहरेला खेतवा-सिवनवाँ,

    चल-ऽ हो गोरी काटीं जा धनवाँ।

    लहरेला…

    ओहि रे सिवनियाँ में मेला बा लागल,

    गंउवाँ नगरिया के भागि आजु जागल,

    सांच भइल हमरो सपनवाँ।

    चल हो गोरी…

    धरती पहिरले बा धानी चुनरिया,

    धीरे-धीरे भइली सयानी उमिरिया,

    अगहन में होइहें गवनवाँ।

    चल हो…

    धनवाँ के सीपी में झलकले मोतिया,

    पोरे-पोरे बिहँसे हमार मेहनतिया,

    चमकल बा सगरे पसिनवाँ।

    चल हो…

    बैला के पावें से हीरा दंवाई,

    हथवा के गोरी तोरा कंगना गढ़ाई,

    सोनवां भरे खरिहनवाँ।

    चल हो…

    स्रोत :
    • पुस्तक : लोक रागिनी (पृष्ठ 111)
    • रचनाकार : भोलानाथ गहमरी
    • प्रकाशन : रागिनी प्रकाशन, गाजीपुर
    • संस्करण : 1995

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