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जागलि घरती के भाग

jagali gharti ke bhaag

भोलानाथ गहमरी

भोलानाथ गहमरी

जागलि घरती के भाग

भोलानाथ गहमरी

और अधिकभोलानाथ गहमरी

    बरि उठे दियना, बिहँसि उठे अंगना,

    जागलि धरती के भाग।

    बरिस-बरिस पर लवटल दिनवाँ

    बूझलि बिरहा आग,

    केतनो अमवसा के घिरली अन्हरिया

    कि चम-चम चमके सुहाग।

    जागलि…

    आजु सरग से उतरलि जोती

    लिहलें चनरमाँ बिराग,

    नाचि उठलि अब धरती के कन-कन

    हँसि उठें सेस हो नाग।

    जागलि…

    पाहुन अइसन बनि ठनि आइल

    बन्हले पियरिया के पाग,

    एकहि रतिया के आव-भगत मे

    लाखन बरेला चिराग।

    जागलि…

    सब सखियन मिलि अरती उतारेली

    गावेली प्रीति के राग,

    गंगा-जमुनवाँ लछिमी मनावेली

    लागे ना सेनुरा में दाग।

    जागलि…

    माटी दियना सनेहिया बाती

    तेलवा भरल अनुराग,

    केतने मिलनुवाँ निछावर भइलें

    खुलि गइलें केतने के भाग।

    जागलि…

    मिलि लेहु, मिलि लेहु बारी रे सनेहिया

    हिरदया लिहले पराग,

    होत भिनसहरा सपन होइ जइहें

    जोरि लेहु नेहियाँ ताग।

    जागलि…

    स्रोत :
    • पुस्तक : बयार पुरवइया (पृष्ठ 45)
    • रचनाकार : भोलानाथ गहमरी
    • प्रकाशन : भारतीय प्रकाशन, इलाहाबाद
    • संस्करण : 1964

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