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जब ते धनकू काका कल्लन हरिया

jab te dhanku kaka kallan hariya

रत्नेश अवस्थी

रत्नेश अवस्थी

जब ते धनकू काका कल्लन हरिया

रत्नेश अवस्थी

और अधिकरत्नेश अवस्थी

    जब ते धनकू काका कल्लन हरिया मढ़कन सब गुजरे हैं,

    सत्तिन चउरा खाली हुइगा सबै कहति हैं दिन बहुरे हैं,

    सबके लरिका शहर गए हैं,

    घर मा ताला डार गए हैं,

    फागुन फागु बिना हुई जाई,

    अउर तेलनिया टुस्किन गाई,

    टूरै वाले चले गए जब तबै आम केतने बउरे हैं,

    सत्तिन चउरा खाली हुइगा सबै कहति हैं दिन बहुरे हैं,

    अबकिउ सेंगरीआई हुई हैं,

    अउ कुआँ पर छाई हुई हैं,

    लेकिन लघ्घा को बनवाई,

    कउन दुपह-रि'क टूरै जाई,

    जब लरिकाई चली गई

    तब ब्यार मकोइया सब बिथरे हैं,

    सत्तिन चउरा खाली हुइगा

    सबै कहति हैं दिन बहुरे हैं,

    बड़ी गाँओ का गारी दींही,

    जबते खोली शहर लींही,

    लेकिन गाँओ ख़ूब दुलराएसि,

    जब उबेन हम तबै बोलाएसि,

    हमका टेर भुलानी वहिकै लागति है हमहू बहिरे हैं,

    सत्तिन चउरा खाली हुइगा सबै कहति हैं दिन बहुरे हैं,

    स्रोत :
    • रचनाकार : रत्नेश अवस्थी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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