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ई देश ककर?

ii desh kakar?

देश ककर? कोस ककर?

जे पेटे टा ले जीवि रहल, जे अपने गुदड़ी सीबि रहल,

से देशक महिमा की जानत, जे स्वार्थक आसब पीबि रहल।

क्यो करय रंच भरोस जकर

की देश तकर?

अपने समाङकेँ नग्न अंग, टूटल-भाङल अपने अलंग,

अपने शरीर बनले अपंग, अपने समाजकेर अंग भंग।

तैयो सङोरमे जोश जकर

की देश तकर?

मुँहगरकेँ ऊँच मचान जतऽ, लुरिगरकेँ ऊँच मकान जतऽ,

मेहगरकेँ घी पकवान जतऽ, अवसर सभ हेतु समान कतऽ।

जे मुँहसच, सभटा दोष जकर

की देस तकर?

जे सत्ता टा ले मारि करय, रहि-रहि दिल्लीक खेहारि करय,

से कथा विकासक की जानत, जे दिन अछैत बटमारि करय।

बड़का-बड़का उद्घोष जकर

की देश तकर?

जकरा अन्तरमे राष्ट्रभक्ति, छै सहज सिनेहक अतुल शक्ति,

देशक कण-कणकेँ अपन बुझय, लुटबय सदिखय देशानुरक्ति।

देशक उन्नतिये कोष जकर

की देश तकर?

स्रोत :
  • पुस्तक : गजल ओ गीत
  • रचनाकार : शेखर प्रकाशन, पटना
  • प्रकाशन : सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी
  • संस्करण : 1991

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