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हम भेटब

hum bhetab

मार्कण्डेय प्रवासी

और अधिकमार्कण्डेय प्रवासी

    जहिया-जहिया हृदयहीनता

    खटकत मोनक बाटपर,

    हम भेटब—

    इतिहास-नदीकेर—

    चिक्कन-चुनमुन घाटपर!

    अछि कविता कोइलीक बहिनपा,

    नहि बाजत कागक भाषा;

    चीर-हरण नहिकऽ सकैत अछि—

    साहित्यिक द्यूतक पासा

    जहिया-जहिया—

    शील तथा आदर्श गीतमे नहि अभरत,

    हम भेटब—

    अपने सिमानपर—

    बैसल टूटल खाटपर!

    आइ भने किछु भाइ-बन्धु

    सगरो बबूर बनि जनमल छथि,

    भीतरसँ महकल छथि, तैयो—

    बाहर-बाहर गमकल छथि

    साँप जकाँ—

    डँसि लेत जखन सौंसे समाजकेँ दुर्जनता,

    आखर-आखर मंत्र बनत—

    विष उतरत—

    हमरे चाटपर!

    अछि गीदड़केँ हरिण कहै लेऽ

    होड़ मचल, हम मौन छी,

    भोनू भाव जानथि, तेँ हम

    गोनू रहितहुँ गौण छी

    जहिया-जहिया मैथिलत्व—

    हारल, धकिआओल-सन लागत,

    हम भेटब—

    तिलकोर जकाँ—

    चतरल साहित्यक टाटपर!

    स्रोत :
    • पुस्तक : हम भेटब (मैथिली गीत-नवगीत संग्रह) (पृष्ठ 11)
    • रचनाकार : मार्कण्डेय प्रवासी
    • प्रकाशन : जखन-तखन, दरभंगा
    • संस्करण : 2004

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