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हरसे किसनवां

harse kisanvan

रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’

और अधिकरामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’

    देखि-देखि खेतवा के हरसे किसनवां।

    हो जाई पूरा मन के सगरी सपनवां॥

    कहेला किसान सुनु मुनुआ के माई।

    अबकी आपन दुख सब मिटि जाई॥

    गेहुंआ के बेचि के किनाई कंगनवां॥

    हो जाई पूरा मन...

    खेतवा में लहरेला गेहूंआ के बलिया।

    झूमेला मन देखि मटरवा के फलिया॥

    भरि जाई अबकी खेत खरिहनवां॥

    हो जाई पूरा मन...

    होली में तोहरा के चुनरी ले आइबि।

    नकिया के तोहरी हम झुलनी गढ़ाइबि॥

    ले देइबि कनवां के तोहे ऐरनवां॥

    हो जाई पूरा मन...

    मुनिया के अबकी करबि हम सगाई।

    मुनुआ के शुरू होई अबकी पढ़ाई॥

    आयी खुसी अबकी अपनी अँगनवां॥

    हो जाई पूरा मन...

    स्रोत :
    • पुस्तक : गँउवा के माटी अनमोल (पृष्ठ 46)
    • रचनाकार : रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’
    • प्रकाशन : अखिल भारतीय भोजपुरी समाज, गोमतीनगर, लखनऊ
    • संस्करण : 2010

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