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हमरो गाँव रे

hamro gaanv re

भोलानाथ गहमरी

भोलानाथ गहमरी

हमरो गाँव रे

भोलानाथ गहमरी

और अधिकभोलानाथ गहमरी

    काँट कूस से भरलि डगरिया

    धरीं बचा के पाँव रे,

    माटी उपरा छान्हीं छप्पर

    ऊहे हमरो गाँव रे।

    चान-सुरुज जिनिकर रखवारा,

    माटी जिनिकर थाती,

    लहरे खेतन बीच फसिलिया,

    देखि के लहरेले छाती,

    घर-घर सबकर भूख मेटावे,

    नाहीं चाहे नाँव रे।

    ऊहे हमरो गाँव रे।

    चारूँ ओर सुहावन लागे,

    निरमल ताल तलइया,

    अमवाँ की डढ़िया पर बइठलि,

    गावे गीत कोइलिया,

    थकल बटोही पल भर बइठें,

    बगिया के छाँह रे।

    ऊहे हमरो गाँव रे।

    सनन्-सनन्-सन् बोले बयरिया,

    चरर-मरर बँसवरिया,

    घरर-घरर-घर मथनी बोले,

    दहिया की कँहतरिया,

    साँझ-सबेरे गइया बोले,

    बछरू बोले माँव रे।

    उहे हमरो गाँव रे।

    निकसें पनियाँ के पनिघटवा,

    घूँघट काढ़ि गुंजरिया,

    मथवा पर धइ, चलें डगरिया,

    दुइ-दुइ भरल गगरिया,

    सुधिया आवे जो नन्दगाँव के,

    रोवें सौ-सौ साँवरे।

    उहे हमरो गाँव रे।

    तन कोइला मन हीरा चमके,

    चमके कलस पिरितिया,

    सरल सोभाव सनेही जिनिकर,

    अमिरित बासलि बतिया,

    नेंह भरलि निसिकपटि गगरिया,

    छलके ठाँवे-ठाँव रे।

    ऊहे हमरो गाँव रे।

    स्रोत :
    • पुस्तक : बयार पुरवइया (पृष्ठ 77)
    • रचनाकार : भोलानाथ गहमरी
    • प्रकाशन : भारतीय प्रकाशन, इलाहाबाद
    • संस्करण : 1964

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