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अभिलाषा

abhilasha

जीवि रहल छी किए ने बूझी, जीवन असहाय,

विश्व-धारमे एकसर नाविक, निर्बल निरुपाय।

डेग-डेगपर मोकि रहल अछि काम, क्रोध लोभ,

घेरल छी दुर्दाम ग्लानिसँ, चढ़ल करेजा क्षोभ।

होयत कहिया अन्त जानी जीवनकेर भार,

नहि जानी पहुँचत कहिया नाव सागरक पार।

ताकि रहल छी युग-युगसँ भेटय किछुओ आलोक,

अन्तहीन जनु हमर प्रतीक्षा दऽ रहले नित शोक।

सांसारिक लक्ष्यक पाछाँ हम रहलहुँ बहुत बेहाल,

भेटल बहुत, बहुतमे हुसलहुँ, संघर्षक छल जाल।

सूत्रधार, सामर्थ्य आब नहि, संघर्षक नहि बेर,

अभिलाषा एतबे ने नचाबी एहि जीवनकेँ फेर।

स्रोत :
  • पुस्तक : गजल ओ गीत
  • रचनाकार : शेखर प्रकाशन, पटना
  • प्रकाशन : सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी
  • संस्करण : 1991

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