दुनियाँ में चार दिन क जिनिगी के खेल
duniyan mein chaar din ka jinigi ke khel
रामजियावान दास ‘बावला’
Ramjiyaavan Das ‘Bawla’
दुनियाँ में चार दिन क जिनिगी के खेल
duniyan mein chaar din ka jinigi ke khel
Ramjiyaavan Das ‘Bawla’
रामजियावान दास ‘बावला’
और अधिकरामजियावान दास ‘बावला’
दुनियाँ में चार दिन क जिनिगी के खेल बाय झमेल कवने काम कै।
जाये के अकेल बा झमेल कवने काम कै॥
कंचन महल दहल जाई पगला।
पंछी महल से निकल जाई पगला।
हम हम कइले विचार तोर फेल बाय झमेल कवने काम कै॥
खाय ले खवाय ले बनाय ले बनाय ले।
नाहीं जानी दियवा में केतना रे तेल बाय झमेल कवने काम कै॥
सपना के अपना समुझि अरुझइले।
घर के न घाट के तूँ कतहूँ के भइले।
छुटि जाई गाड़ी तुफान मेल रेल बाय झमेल कवने काम कै॥
होय परतीत प्रीत करले तूँ राम से।
नाम से न भाग भाई भाग बुरे काम से।
तोर मोर 'बावला' बेकार के दलेल बाय झमेल कवने काम कै॥
- पुस्तक : गीत मंजरी
- संपादक : हरिराम द्विवेदी, जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
- रचनाकार : रामजियावान दास ‘बावला’
- प्रकाशन : सर्व भाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली
- संस्करण : 2021
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