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डोले सरद बयार

Dole sarad bayar

भोलानाथ गहमरी

भोलानाथ गहमरी

डोले सरद बयार

भोलानाथ गहमरी

और अधिकभोलानाथ गहमरी

    बिहँसत आइल दिन उजियार,

    यार अब डोललि सरद बयार।

    बीति गइल दिन बर-बरखा के

    बगिया भइलि उदास

    बदरा गइल बिदेस रात भर

    सिसिके नील अकास

    जस-जस टपके लोर नयन से,

    धरती लेइ संवार।

    यार…

    बिखरल मोती पात-पांत पर

    टहकि फुलाइल कास,

    झूललि डोर अकास-बँवर के

    कनइल भरल सुबास,

    अगराइल मन हर-सिंगार के

    महँकि उठल भिनसार।

    यार…

    गह-गह उगल कँवल जल उपरा

    हँसि-हँसि करे किलोल,

    रीति जाने प्रीति भँवरवा

    लेइ रस जाला डोल,

    देखि-देखि मन बिहसे मछरिया,

    अइसन झूठ पियार।

    यार…

    अमिरित परल धान के बाली

    चमकल नया बिहान,

    मँगा-मोती जड़लि जोन्हरिया

    बजरा भइल जबान,

    भूमि उठलि मदमातलि उखिया

    पोर पोर रसदार।

    यार…

    उतरलि आजु सरग धरती पर

    सजलि सुहागिन रात,

    कल-कल नदिया गीत सुनावे

    तरई चललि बरात,

    टह-टह रैन अँजोरिया टहकल,

    बहकल जिया हमार।

    यार…

    फिर से मिलल प्रान दियना के

    दूर भइल अन्हियार,

    आइल सुघर सुदिन अगहन के

    डोली परल ओहार,

    चललि गुंजरिया बालम के घर,

    भूमत चलल कँहार।

    यार…

    स्रोत :
    • पुस्तक : बयार पुरवइया (पृष्ठ 40)
    • रचनाकार : भोलानाथ गहमरी
    • प्रकाशन : भारतीय प्रकाशन, इलाहाबाद
    • संस्करण : 1964

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