Font by Mehr Nastaliq Web

देश के लाल

desh ke laal

भोलानाथ गहमरी

भोलानाथ गहमरी

देश के लाल

भोलानाथ गहमरी

और अधिकभोलानाथ गहमरी

    जाग-ऽ जाग-ऽ देसवा के सजग सबल लाल,

    धरती करेले हो पुकार।

    जवनी धरतिया में सोनवाँ उगवल-ऽ,

    पवल-ऽ अमोल पियार,

    अँखिया लागलि आजु कवनी बिदेसिया क,

    धोखवा से कइलसि वार।

    अपनी धरतिया के तुहूँ भइया पहरू

    देसवा के सुनि ल-ऽ गोहार,

    कोखिया लजिया बचइह-ऽ रे बिरना

    दुसुमन ठाढ़ दुआर।

    ओहि रे दुअरिया पर शिव जी पहरा

    पारवती रखवार,

    केतनो जे रबना हो सीस चढ़इहें कि

    बचिहें ना कुल परिवार।

    एक-एक जोधा ईहाँ राम की मुरतिया

    सत गहे तरुवार,

    बैरी जो चरन बढ़ाई एहि भुंइयाँ त-ऽ

    लेइ लेइहें सीस उतार।

    स्रोत :
    • पुस्तक : बयार पुरवइया (पृष्ठ 62)
    • रचनाकार : भोलानाथ गहमरी
    • प्रकाशन : भारतीय प्रकाशन, इलाहाबाद
    • संस्करण : 1964

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY