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जाहि ठाढ़िपर ठाढ़ भेल छह

jahi thaDhipar thaaDh bhel chhah

मार्कण्डेय प्रवासी

मार्कण्डेय प्रवासी

जाहि ठाढ़िपर ठाढ़ भेल छह

मार्कण्डेय प्रवासी

और अधिकमार्कण्डेय प्रवासी

    जाहि ठाढ़िपर ठाढ़ भेल छह,

    तकरे व्यर्थ कटै छह तोँ,

    मिथिलोमे सभ टा कलिया नहि—

    कालिदास कहबै छह हौ!

    शिखर ध्वस्त कयने—

    शिखरत्व सुलभ भऽ सकब असंभव छह,

    केवल अथक परिश्रम आ—

    प्रतिभासँ सभ किछु संभव छह

    ज्ञान तथा कर्मक इंधन बिनु—

    हवन-कुंड नहि धधकतह,

    निष्कर्मी रहि इच्छानलमे—

    व्यर्थे तोँ धधकै छह हौ!

    अपन आँगनक बात—

    समेटल अपने आँगनमे राखह

    भाषामे मर्यादा पोसह

    काग-जकाँ तोँ नहि भाखह

    अपने भाइ-बन्धु छिटकी—

    व्यर्थ लगौने घुमै छह,

    स्वयं आत्महंताक मार्गपर—

    व्यर्थ डेग बढ़बै छह हौ!

    लघुता त्यागि संयमक पथपर

    बढ़ि विराट्केँ अपनाबह

    अपन कंठसँ अपन संस्कृतिक

    गीत-गान सदिखन गाबह

    अपन देशमे अपन वेशमे

    अपने शैलीमे छजबह,

    अपनापनकेँ बिसरि-भुलाकऽ—

    व्यर्थें तोँ बहकै छह हौ!

    आबह, घृणा फेकिकऽ—

    प्रेम तथा करुणाकेर ज्वार बनह,

    भनहि प्रवासी: काज बहुत छह,

    कर्मयोग तोँ अपनाबह

    सज्जन छह तँ दुर्जनताकेँ—

    त्यागब बहुत जरूरी छह,

    शीतलता चाहै छह तैयो—

    व्यर्थे तोँ टहकै छह हौ!

    स्रोत :
    • पुस्तक : हम भेटब (मैथिली गीत-नवगीत संग्रह) (पृष्ठ 96)
    • रचनाकार : मार्कण्डेय प्रवासी
    • प्रकाशन : जखन-तखन, दरभंगा
    • संस्करण : 2004

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