चमके जिनिगिया में भोर
chamke jinigiya mein bhor
घिरि-घरि आवे आजु बदरिया
पवन बहे पुरवइया रेऽ,
रहि-रहि मोरा जियरा डोले
बोले ता-ता थइया,
गोरी; चमके जिनिगिया में भोर।
आज मोर मनवाँ के गोकुल
कान्हा देखि लोभावे, रेऽ,
राधा के संग लागे केहू
बंसी दूर बजावे,
गोरी; आजु मोरा जियरा बिभोर।
असरा के दुइ पंछी नाचें
मनवाँ हँसि-हँसि गाबे रेऽ,
उड़ि-उड़ि अँगना कागा बोले
परदेसी घर आबे,
गोरी; झाँके रे दुअरिया कि ओर।
- पुस्तक : बयार पुरवइया (पृष्ठ 35)
- रचनाकार : भोलानाथ गहमरी
- प्रकाशन : भारतीय प्रकाशन, इलाहाबाद
- संस्करण : 1964
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