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चाहय की विधा

chahay ki vidha

अमित पाठक

अमित पाठक

चाहय की विधा

अमित पाठक

और अधिकअमित पाठक

    अदृश्य रूप असुर केर माया

    पीबय शोणित मनुक्खक काया

    आश अहीं पर आबि उबारू

    निज सन्तति हे राम...

    नहि जानि की छै माया प्रभुकेँ चाहै की विधना

    मोल ने रहलै जिनगीक कोनो चाहै की विधना...।

    चहुँदिस भयसँ भेल अन्हारे

    बाँचि सकत के ककर सहारे

    गेल पसरि कोन व्याधि कतयसँ

    अपनहुँ भेल अदना

    नहि जानि की छै...।

    उपजि कतहुँसँ पसरल सगरे

    लोक व्यथित की गाम की नगरे

    मोन सशंकित मुँह मलिन

    नोरे भिजल नैना

    नहि जानि की छै...।

    हे परमेश्वर हे प्रतिपालक

    करह निदान तोहीँ अरिकालक

    तुअ अबलम्बक आश जगतकेँ

    धयल तोरहि चरणा

    नहि जानि की छै...।

    स्रोत :
    • पुस्तक : गीत-गगन (पृष्ठ 103)
    • रचनाकार : अमित पाठक
    • प्रकाशन : नवारम्भ
    • संस्करण : 2024

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