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अनभुआर ई बाट

anabhuar ii baat

सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी

और अधिकसुधांशु ‘शेखर’ चौधरी

    भोतिआयल सन विकल बटोही, अनभुआर बाट,

    थतमत डेग, बढ़य तँ कोमहर सूझि ने रहलै घाट।

    थाकल-ठेहिआयल छै जीवन,

    छिछिआइत बीतल छै यौबन।

    चलल निरन्तर, रुकल ने कहियो, आइ मुदा अछि आँट,

    भोतिआयल सन विकल बटोहीं, अनभुआर बाट।

    जनारण्यसँ घेरल-बाढ़ल,

    रहल सदा ममतासँ छारल।

    मुदा अपन सन कतहु ने किछुओ, अवसादक टा हाट,

    भोतिआयल सन विकल बटोहीं, अनभुआर बाट।

    अन्धकारमे जे इजोत सन,

    से भगजोगनी केर नोत सन।

    आश-लताकेर गहन जालसँ टूटय सहजेँ टाट,

    भोतिआयल सन विकल बटोहीं, अनभुआर बाट।

    चिर सफलता टा संजोगल,

    निंघटि चुकल छै सकल मनोबल।

    संघर्षे नहि, रङ-रभसोसँ सहजे चित उचाट,

    भोतिआयल सन विकल बटोही अनभुआर बाट।

    स्रोत :
    • पुस्तक : गजल ओ गीत
    • रचनाकार : शेखर प्रकाशन, पटना
    • प्रकाशन : सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी
    • संस्करण : 1991

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