सोचय ब्रजबाल मधुपुर बिलमि
sochay brajbal madhupur bilami
(बारहमासा)
सोचय ब्रजबाल मधुपुर बिलमि रहल नन्दलाल
कि त्यागि सबके
अषाढ़ मास तन छिजत न छाँह विरह बाण लागत उर माहिं
कि कानि-कानि अँखिया
बरिसय नीर भामिनि भूषण-बसन अधीर
कि धीर कोना धरबै
सावन सखा अजहुँ नहि आयल घेरि घटा नव बादल छायल
कि बड़े-बड़े बुनिया
बरिसय नीर दामिनि दमकय बहै समीर
कि बिजुरी डर लागै छै
भादव निकलय चाहै प्राण हरि बिनु भामिनि सुत पति आन
कि जीव कोना रखबै
ज्ञान-ध्यान सब हरि लेल चित-चिन्ता दुःख दू गुन देल
कपट कर हमसँ
आसिन आस अवधि बीति गेल ऐला नहि स्याम एहन किये भेल
मधुपुरमे कुब्जा बस कैलक पढ़ि जादू हरि के हरि लेलक
कि सुधि बिसरैला
कातिक कलपि कहय ब्रज बाला नहि ऐला घर घूरि नन्दलाला
कि हम सब निशिचर गमारी गुआरि मधुपुरमे बसु सुन्दर नारि
कि त्यागि कोना ऐता
अगहन आनन्द मधुपुर धाम जतै रे बसै कुब्जा घनश्याम
कि हमरा ठग कए
मधुपुर गेल पाछिल प्रीति सबै तजि देल
कि सुमिरि हिया सालै
पूस ऊधो पाँति लै कए आयल जोग-बैराग कठिन समुझायल
जप तप संयम नियम अचार जोगिन गति विधवा बेवहार
सुमिरि उर दाहय
अब तैं माघ मनोरथ भंग एक दिन कयलन्हि प्रेम तरंग
हम बृन्दावन पकड़ि नचायल अब मधुपुरमे चतुर कहायल
दारा कुब्जा के
फागुन घर-घर करै विलाप अतर-गुलाब उड़य चौपास
रचै धमाउर दए पिचकार हरि बिनु गोकुल भेल उजार
विरह अगियासँ
चैत स्याम नहि अयला अधार नहि रस जानय प्रीतक गमार
काग कोइलिया भमरा भुजंग ई चारो कपटी रस-भंग
कि प्रीति न जानै
बैसाख श्याम ने अयला अधार कपटी कुटिल निठुर नन्दलाल
हमरा ठकि कए मधुपुर गेल पाछिल प्रीति सबै तजि देल
सुमिरि हिया फाटै
बरखा बरिसय बहय हेमन्त नहि अयला हरि सीते बसन्त
कि धीर कोना धरबै
विषम जेठ सखि भेलहुँ निरास इहो रे गावोल मनोहर दास
कि नयन कबे देखबै
- पुस्तक : मैथिली लोकगीत (पृष्ठ 360)
- संपादक : अणिमा सिंह
- प्रकाशन : साहित्य अकादमी, नई दिल्ली
- संस्करण : 1993
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