मास हे सखि सरस अगहन
maas he sakhi saras aghan
(बारहमासा)
मास हे सखि सरस अगहन भूजल चूड़ाक संग यौ,
तरै चेचरा पलै रान्हल झोरसँ बहल तेल यौ।
पूस हे सखि अन्न नबका रान्हल माँगुर माछ यौ,
दुइ मिलि हम पलै रान्हल आब नहि बाँचत प्राण यौ।
माघ हे सखि जाड़ भारी रान्हल माँगुर माछ यौ,
दुइ मिलि हम पलै रान्हल आब नहि बाँचत प्राण यौ।
फागुन हे सखि आबि पहुँचल आयल पछबाक ओर यौ,
सेदैत मारा आगि लागल आब नहि बाँचत कौल यौ।
चैत हे सखि रोग चहुँदिसि रूप नयना धार यौ,
तरै भुटनी सोन्ह रान्हल बैद करथि दबाय यौ।
मास हे सखि आबि पहुँचल आयल मास बैसाख यौ,
गेल रुचि और प्रेम माछसँ आब नहि किछु चाही यौ।
जेठ हे सखि आबि पहुँचल रान्हल भाँकुर माछ यौ,
दुइ मिलि हम पलै रान्हल आब नहि बाँचत प्राण यौ।
मास हे सखि आबि पहुँचल आयल नवल असाढ़ यौ
आम दए दए सौर रान्हल झोर भेल बड़ दिव्य यौ।
सावन हे सखि सर्वं सुहावन रान्हल टेंगरा माछ यौ,
दुइ मिलि हम पलै रान्हल आब नहि बाँचत प्राण यौ।
भादब हे सखि झिंगा रान्हल संग कोतरी माछ यौ,
आसिन हे सखि मूर रान्हल गर्भ लेल प्रसाद यौ।
कार्तिक हे सखि आबि पहुँचल गरै गैंचा माछ यौ,
गेल रुचि और प्रेम माछसँ आब नहि किछु चाही यौ।
- पुस्तक : मैथिली लोकगीत (पृष्ठ 364)
- संपादक : अणिमा सिंह
- प्रकाशन : साहित्य अकादमी, नई दिल्ली
- संस्करण : 1993
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