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की जे कहु बिन कुमर श्याम

ki je kahu bin kumar shyaam

अज्ञात

अज्ञात

की जे कहु बिन कुमर श्याम

अज्ञात

और अधिकअज्ञात

    (चौमासा)

    की जे कहु बिन कुमर श्याम बिरहा घेरि लेल तनमे री

    आयल मास असाढ़ सखि री बिजली चमकि उठै घनमे री

    पिया पिया पिया कहि रटय पपिहरा मोरवा सोर करै बनमे री

    सावन सब सखि डारि हिडोला झूलि रहै पिया के संगमे री

    हम धनि सोची ठाढ़ी अटरिया छन छन मदन दहै तनमे री

    भादो के रैनि भयावन आली री ककरासँ कहौं बिरह बतिया री

    कठिन कठोर भेल श्याम जी के छतिया अजहुँ लिखि भेजै

    पतिया री

    रहलो जाय श्याम बिनु आली री आसिन सूर गहै प्रभु के री

    जोगिनि होइ हम बन-बन ढूँढ़ब मिलता श्याम सखा हँसि कए री

    स्रोत :
    • पुस्तक : मैथिली लोकगीत (पृष्ठ 354)
    • संपादक : अणिमा सिंह
    • प्रकाशन : साहित्य अकादमी, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1993

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