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कातिक पित्त प्रकोप सब के कतय ठहार हैत रे

katik pitt prakop sab ke katay thahar hait re

अज्ञात

अज्ञात

कातिक पित्त प्रकोप सब के कतय ठहार हैत रे

अज्ञात

और अधिकअज्ञात

    (पचमासा)

    कातिक पित्त प्रकोप सब के कतय ठहार हैत रे

    क्रोध छली बलवान सबसँ हैत की परिणाम रे

    मास अगहन शीत उपजल करब कोन प्रयास रे

    पूस उपजल क्रोध तनमे मानत नहि किछु कान रे

    माघमे हम रहब कोन बिधि कृष्ण मधुपुर गेल रे

    फागुनमे मन घुमय लागत लोग चलता संग रे

    स्रोत :
    • पुस्तक : मैथिली लोकगीत (पृष्ठ 358)
    • संपादक : अणिमा सिंह
    • प्रकाशन : साहित्य अकादमी, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1993

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