हम नहि जायब री जायब सखी
hum nahi jayab ri jayab sakhi
(बारहमासा)
मास असाढ़ घटा घन घोर, मोहि तेजि हरि गेला देशक ओर
पलटियो ने अयला
हम नहि जायब री जायब सखी, सब केलि कदमतर मची हो
सावन सब के पिया छैन कोर, हमर कर्म बिधि लिखल भोर
पिया मुख सपना
भादव भवन भयावन साँझ, रैन जे लागे अग्नि समान
पिया बिनु भारी
आसिन आयल पुरत मन आस, मोहि तेजि हरि गेला कुबजाक पास
लायब कोन बिध से
कार्तिक घर-घर दीप अकास, हरि बिन भवन हमर अन्हार
अगहन घर-घर नवरस सारि, हरि गेला मधुपुर जीव गेला मारि
कहब दुख ककरा
जनु जा सखि पूस मास भेल बिन पिया सेजो न सोहाय
तुराइ के जोड़े
माघहिं सखि सब पूजल तुसारी, तनिक पिया छनि देस-विदेस
गौरी हम पुजलौं
फागुन सखि सब खेलै रंग देती धमाउर सखि सब संग
होय फिचकारी
चैत भ्रमर फूल लेल निज नार, हमर भ्रमर बिन एहन संसार
लियावन अयता
बैसाखहि मधुकर तेजल पिरीत, जीवन से मरन थिक बड़ हीत
पियब विष घोरि
आयल जेठ हेठ भेल बरषा, आहो नन्दलाल जीवसँ भेंट
धैर्य धरू राधा
हम नहि जायब री जायब सखि सब झूलन केली
कदम तर मचतै
- पुस्तक : मैथिली लोकगीत (पृष्ठ 362)
- संपादक : अणिमा सिंह
- प्रकाशन : साहित्य अकादमी, नई दिल्ली
- संस्करण : 1993
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