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भोजपुरी लोकगीत : कि रचि ना

bhojapurii lokagiit : ki rachi na

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रोचक तथ्य

संदर्भ—हार का टूटना तथा पति का आश्वासन।

कि रचि ना।।टेक।।

बेंतवा चिरिय सइयाँ बाँगाला छावावेले।

कि रचि रचि ना, सइयाँ काटेले खिरकिया।।1।।

ताहि ऊपर सइयाँ साजे सुख सेजिया।

कि रचि रचि ना, आइ गइली सुख निनिया।।2।।

आधिहि राति सइयाँ बहियाँ लफवले।

कि रचि रचि ना, टूटि गइल गजमोतिया।।3।।

टूटे गजमोतिया, बिहरे मोरी छतिया।

कि रचि रचि ना, बाबा के रे गजमोतिया।।3।।

टूटे गजमोतिया, बिहरे मोरी छतिया।

कि रचि रचि ना, बाबा के रे गजमोतिया।।4।।

लागे देहु सँवरो हो हाजीपुर के हटिया।

कि रचि रचि ना, हम गुहाइबि गमोतिया।।5।।

एक स्त्री दूसरी से कहती है—बैत चीर कर मेरे पति ने घर छवाया और उसमें छोटी सी खिड़की बनवाई।।1।।

उस बँगले में पति ने सेज बिछाई, मुझे कुछ-कुछ नींद गई।।2।।

आधी रात को पति ने हाथ बढ़ाया, मेरा गजमुक्ता का बना हार टूट गया।।3।।

हार टूटने के दुःख से मेरी छाती फटने लगी, पिताजी का दिया हुआ हार था।।4।।

पति ने आश्वस्त किया कि—हे श्यामा, हाजीपुर (सोनपुर) की बाज़ार लगने दो, मैं तुम्हारा गजमुक्ता हार गुँथा दूँगा।।5।।

स्रोत :
  • पुस्तक : हिंदी के लोकगीत (पृष्ठ 126)
  • संपादक : महेशप्रताप नारायण अवस्थी
  • प्रकाशन : सत्यवती प्रज्ञालोक
  • संस्करण : 2002

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