आदमी की पहचान

रामनारायण मिश्र

आदमी की पहचान

रामनारायण मिश्र

और अधिकरामनारायण मिश्र

    दूसरों को भला-बुरा कहने में लोग बहुत जल्दी करते हैं, विशेषकर बुरा कहने में। 1601 ईस्वी में, जब मैं बस्ती ज़िले का डिप्टी इंस्पेक्टर होकर गया, तब बहुत से लोगों ने मुझसे कहा कि सबसे तो आपकी बन जाएगी; पर एक सब डिप्टी इंस्पेक्टर से जिनका नाम मुंशी जगदीश प्रसाद था, नहीं बनेगी। मुझसे कहा गया कि वे बड़े टेढ़े आदमी हैं।

    मेरे बस्ती पहुँचने पर, जितने और सब डिप्टी इंस्पेक्टर थे, मिलने आए; पर मुंशी जगदीश प्रसाद दौरे पर ही रहे। बहुत दिनों के बाद, जब उनका दौरा समाप्त हुआ और वह सदर में आए, तब मुझसे मिले। धीरे-धीरे मेरी जान पहचान उनसे बढ़ गई। उन्होंने कायस्थ कुल में जन्म लिया था और काशी के त्रिलोचन मुहल्ले में उनका घर था। चारों तरफ़ उनकी बुराई सुनते-सुनते मैं थक गया था। एक दिन मैंने उनसे कहा कि आइए, हम आप महीने पंद्रह दिन एक साथ दौरा करें। हम आप अलग-अलग स्कूल देखेंगे; पर रहेंगे एक साथ। उन्होंने इसको स्वीकार किया।

    थोड़े ही दिनों में मुझ पर प्रकट हो गया कि वे बड़े ऊँचे दर्जे के आदमी हैं; परंतु रूखे हैं। केवल रुखाई के कारण, उनके उज्ज्वल गुणों को लोगों ने नहीं पहचाना। वे बैलगाड़ी पर दौरा किया करते थे, समय बचाने के लिए शाम को भोजन के उपरांत बैलगाड़ी में सो रहते थे, और सबेरा होते-होते दूसरे स्थान पर पहुँच जाते थे। नियम यह है, कि सदर से पाँच मील के अंदर भत्ता नहीं मिलता। पाँच मील, या इससे अधिक जाने पर मिलता है। वे अपने सिद्धांत पर इतने दूर थे, कि जिस दिन बस्ती से रवाना होते, रात को अपनी नींद ख़राब करके देख लेते, कि बारह बजे से पहले पाँच मील पूरे हो गए या नहीं! यदि पाँच मील में थोड़ा भी कम होता, तो वह उस दिन का भत्ता नहीं लेते थे।

    स्कूलों के डिप्टी लोग उन दिनों मुदर्रिसों से आटा-दाल तक लिया करते थे। मुंशी जगदीश प्रसाद तो गाँव के ज़मीदारों और रईसों का भी निमंत्रण स्वीकार नहीं करते थे। किसी से बर्तन भी मँगनी नहीं माँगते थे। लोग उन्हें बुरा कहते थे; पर वे बहुत अच्छे निकले।

    इस प्रकार का अनुभव मुझे कई बार हुआ है। जिनको लोगों ने बुरा बतलाया, उनको मैंने अच्छा पाया। कहा जाता है, कि संसार में कोई भी फूल पत्ती ऐसी नहीं है, जिसमें औषध का गुण हो और कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है, जिसकी प्रकृति में थोड़े बहुत देवताओं के भाव हों। इसलिए 'किसी को बुरा कहने में जल्दी करो' यह सबक मुझे अपने ही जीवन में कई बार मिला है।

    बरेली से जब मैं जौनपुर बदल कर आया था, उस समय भी लोगो ने वहाँ के डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के सेक्रेटरी, बा० घनश्यामदास के संबंध में, जो वहाँ डिप्टी कलेक्टर थे, बड़ी भयानक बातें बतलाई थीं। थोड़े ही दिनों के व्यवहार से मैंने उनको बड़ा कार्य दक्ष और परिश्रमी पाया। वे चाहते थे कि सब लोग उनके जैसे हो जाएँ; इसलिए आलसी और ढीले लोग उनकी निंदा करते थे। शिक्षा प्रचार की उन्हें धुन थी; इसलिए हम लोगों में परस्पर बहुत प्रेम हो गया।

    आदमी को पहचानना बहुत कठिन काम है। किसी आदमी के पूरे गुण उसके जीवन के केवल एक अंग को लेकर नहीं जाने जा सकते। मनुष्य की पूरी परीक्षा उसके घरेलू जीवन और सार्वजनिक जीवन दोनों को दृष्टिगोचर रखने से हो सकती है। संभव है, कि उसके नौकर-चाकर और स्त्री-बच्चे, जो राय उसके बारे में रखते हों, उसमें और उन लोगों की राय में अंतर हो, जो उसके साथ व्यापार आदि में संबंध रखते हों। मनुष्य की मनोवृत्ति को जानना बड़ी जटिल समस्या है। उसका स्वभाव किस समय किस बात से प्रेरित होकर क्या करेगा, साधारणतः यह बतलाना कठिन है। \लार्ड रौबर्ट्स थे तो बड़े बहादुर सेनापति; पर बिल्ली से डरते थे। उन्हें बिल्ली से डरते समय देखकर कौन कह सकता था, कि वे एक साम्राज्य के सेनाध्यक्ष हैं; परंतु थे वे प्रबल सैनिक, जिनका लोहा उनके बहुत से प्रतिद्वंद्वी लोगों को मानना पड़ा था; इसलिए किसी की एक कमज़ोरी देखकर उसके सारे जीवन पर लाँछन लगाना चाहिए।

    एक दिन एक मित्र से एक सभा में वाद-विवाद हो गया। पाँच छ: दिनों बाद वे सड़क पर मुझसे मिले और सामना बचाते हुए बग़ल से निकल गए। मैंने सोचा, कि वे उस दिन की बहस से अप्रसन्न हो गए हैं; परंतु दो ही दिन के बाद मालूम हुआ, कि उस दिन उनकी प्यारी बहन का देहांत हो गया था; इसलिए परेशानी की हालत में वे मेरे पास से चले गए। उसके बाद जब वे मिले, उन्होंने पूर्ववत स्नेह प्रकट किया। कोई इस प्रकार की घटना हो भी जाए, उदारता की दृष्टि से उसको देखना चाहिए।

    एक दिन भिनगा नरेश स्वर्गवासी राजा उदयप्रतापजी ने मुझसे कहा कि जब तक पूरी तरह से जाँच लो, किसी का विश्वास करो। मैंने कहा, मेरा सिद्धांत इसका उल्टा है, अर्थात् जब तक इसका प्रमाण मिल जाए कि अमुक आदमी चोर है, उस पर पूरा विश्वास करो। राजर्षि उदयप्रताप सिंह जी बड़े कार्य दृक्ष, बड़े दानी और बड़े बुद्धिमान थे; परंतु प्रायः सबको वह संदेह की दृष्टि से देखते थे। दार्शनिक हर्बर्ट स्पेंसर ने ठीक कहा है, कि जो अविश्वास से जीवन आरंभ करता है, वह अपना और दूसरे का जीवन दु.खमय बना देता है और जो जगत् में विश्वास से काम लेता है, उससे संसार सच्चाई का व्यवहार रखता है। इस वाक्य की सत्यता योरप जाकर एक क्षण में मालूम हो जाती है। वहाँ यात्री रेल के कुलियों का विश्वास करते हैं, और जहाँ कह देते हैं, वहीं उनका असबाब पहुँच जाता है। बैंक वाले चेक देखते ही रुपया दे देते हैं और पीछे हिसाब करते हैं कि चेक देने वाले के जिम्मे बैंक में रुपया है या नहीं। इसका परिणाम यह है कि आपस के विश्वास के कारण एक हज्जाम भी तीन-चार साथियों से मिलकर एक दूकान खोल लेता है और सब मिलकर कमा खाते हैं। उन देशों में अधिक व्यापारी आपस में मिलजुल कर ही काम करते हैं। वहाँ किसी दूकानदार के यहाँ आप आध घंटे तक भी चीज़ें देखते रहिए और कुछ भी लीजिए, तब भी वह आपको धन्यवाद देगा और कहेगा कि आज नहीं तो कल सही; आप कभी कभी तो हमारे ऊपर कृपा कर ही देंगे। इस प्रकार वे निराशा में भी आशा का आह्वान करते हैं और अपने को, और जिनसे संसार में काम पड़ता है, उनको प्रसन्न रखते हैं। वे मनुष्यों को बुरा कहने में जल्दी नहीं करते और सदा अपने को प्रसन्न चित्त रखते हैं। ईश्वर के जगत् में आशा की नदी बहती है, कोई उसमें से एक लुटिया भर लेता है, कोई एक लोटा, कोई गगरा; कुछ अभागे लोग नदी का बहाव ही देखते रह जाते हैं; पर उसमें आचमन करने का भी उनको अहोभाग्य नहीं प्राप्त होता।

    स्रोत :
    • पुस्तक : हंस (आत्मकथा अंक) (पृष्ठ 5)
    • संपादक : प्रेमचंद
    • रचनाकार : रामनारायण मिश्र
    • प्रकाशन : विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी
    • संस्करण : 1932

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