इकाई-2 : काव्य लक्षण-काव्य हेतु-काव्य प्रयोजन
ikai 2 ha kavya lakshan kavya hetu kavya prayojan
हिन्दवी डेस्क
Hindwi Desk
इकाई-2 : काव्य लक्षण-काव्य हेतु-काव्य प्रयोजन
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काव्य लक्षण
ध्यान देने की बात है कि भारतीय काव्यशास्त्र में काव्य पर एक स्वतंत्र इकाई के रूप में भी चिंतन-मनन हुआ है। भरत मुनि ने नाटक पर आधारित काव्य लक्षण प्रस्तुत किया।
संस्कृत आचार्यों द्वारा दिए गए काव्य लक्षण
भामह
अलंकारवादी भामह का काव्य लक्षण इस प्रकार है—'शब्दार्थौ सहितौ काव्यम्' (काव्यालंकार 1/16) अर्थात शब्द और अर्थ दोनों का सहभाव काव्य है। भामह ने अपने ग्रंथ 'काव्यांलकार' में अपने से पहले की दो विचारधाराओं का उल्लेख किया है। एक विचारधारा अर्थालंकारों को काव्य-सौंदर्य का मूलाधार मानती है तथा दूसरी शब्दालंकारों को। किंतु दोनों विचारधाराएँ काव्य-सौंदर्य का आधार अलंकारों में ही खोजती हैं। अर्थालंकारवादी भामह तथा शब्दालंकारवादी दंडी दो भिन्न विचारधाराओं की एकता अलंकार युग में प्रस्तुत करते हैं।
दंडी
आचार्य दंडी ने काव्य के शरीर पर विचार करते हुए कहा कि 'शरीरं तावदिष्टार्थ व्यवच्छिन्ना पदावली' ही काव्य है। उनके द्वारा निरूपित 'शरीरं तावदिष्टार्थ...' का 'तावद्' शब्द वाक्यालंकारों के लिए भी प्रयुक्त हुआ। उनका मत है कि केवल उसी शब्द-समूह (पदावली) को काव्य-शरीर कहा जा सकता है जो काव्य के लिए अभिलक्षित सरसता से युक्त हो और कवि-प्रतिभा से युक्त सुंदर पदावली से व्यवच्छिन्न हो। इष्टार्थ-युक्त पदावली का अर्थ यह भी है कि ऐसे पदों में 'योग्यता', 'आकांक्षा', 'आसक्ति' आदि विशेषताएँ भी विद्यमान हों। कारण, जिन पदों में वाक्यत्व की योग्यता नहीं होती।
वे 'काव्य' नहीं कहे जा सकते। पदावली का 'इष्टार्थत्व' ही काव्यार्थ में चमत्कार की सृष्टि करता है जिसमें लोकोत्तर आह्लादत्व का भाव पूरी तरह अंतर्मुक्त है।
वामन
भामह मानते थे शब्दालंकार और अर्थालंकार से विशिष्ट शब्दार्थ काव्य है। केवल शब्द और अर्थ को काव्य मानना तो प्रचलन है—'काव्यशब्दोऽयं गुणालंकारसंस्कृतयोः शब्दार्थयोर्वर्तते। शब्दार्थमात्र वचनोऽत्र गृह्यते।' (काव्यलंकार-सूत्र-वृत्तिः)।
वामन यह भी कहते हैं कि काव्य के शोभा कारण-धर्म को अलंकार कहते हैं। 'सौन्दर्यमलंकारः 'अलंकृतिरलंकारः', 'काव्य शोभायाः कर्तारो धर्मा गुणाः।' इस प्रकार वामन ने काव्य की ग्राह्यता को 'सौंदर्य' से निबद्ध कर दिया। वामन के अनुसार दोष-रहित, सगुण, सालंकार शब्दार्थ काव्य है।
वामन का प्रदेय यह माना जा सकता है कि उन्होंने दंडी के मार्ग को 'रीति' में नए ढंग से विस्तार दिया तथा अलंकार से आगे गुण की चर्चा करते विचार को आगे बढ़ाया।
रुद्रट
अलंकारवादी आचार्य रुद्रट ने काव्य का लक्षण किया 'ननु शब्दार्थों काव्यम्' रुद्रट का कहना है कि शब्दार्थ निश्चय ही काव्य है।
काव्य लक्षण के निरूपण में चमत्कारमय शब्दार्थ संबंध के सौंदर्य को काव्य मानने का आग्रह करने वाले आचार्यों में हेमचंद्र, विद्यानाथ, वाग्भट्ट, जयदेव आदि प्रमुख हैं। इनके लक्षण इस प्रकार हैं—
हेमचंद्र
अदोषौ सगुणौ सालंकारौ च शब्दार्थौ काव्यम् (काव्यानुशासन)।
विद्यानाथ
गुणालंकार सहितौ शब्दों दोष वर्जितौ। (प्रताप रुद्रयशोभूषण)।
वाग्भट्ट
शब्दार्थौ निर्दोषौ सगुणौ प्रायः सालंकारौ काव्यम् (काव्यानुशासन)।
जयदेव
निर्दोषा लक्षणावती सरीतिर्गुणभूषणा।
सालंकार रसानेकवृत्तिर्वाक्काव्यनाम भाक्॥ (चन्द्रालोक)
भोज
निर्दोष गुणवत्काव्यमलंकारैरलंकृतम्।
रसाविन्तं कविं कुर्वन प्रीति कीर्ति च विदंति॥ (सरस्वती कंठाभरण)
आनंदवर्धन
काव्यलक्षण-प्रसंग में इनके दो कथन उल्लेख्य हैं जो काव्य के बाह्य एवं आंतरिक रूप की ओर संकेत करते हैं।
'शब्दार्थ-शरीरं तावत् काव्यम्' 'ध्वनिरात्मा काव्यस्य।' इन कथनों के अनुसार-काव्य उस शब्दार्थ-रूप शरीर को कहते हैं जिसकी आत्मा ध्वनि (व्यंग्यार्थ) है। यद्यपि यह लक्षण काव्य के आंतरिक तत्व ध्वनि की ओर सर्वप्रथम संकेत करता है, किंतु स्वयं 'ध्वनि' शब्द अत्यंत व्याख्यापेक्ष है।
कुंतक
उन्होंने 'वक्रोक्ति' को काव्य का व्यापक गुण मानते हुए उसे काव्य की आत्मा कहा।
वक्रता को 'वैचित्र्य' तथा 'वैदग्ध्य भंगी भणिति' अर्थात् विदग्ध व्यक्ति के कहने का विशेष गुण कहा। काव्य के भाव-पक्ष की कला-पक्षीय व्याख्या करते हुए उन्होंने काव्य का लक्षण इस प्रकार प्रस्तुत किया—
शब्दार्थों सहितौ वक्रकविव्यापारशालिनि।
बन्धे व्यवस्थितौ काव्यं तद्विदास्ह्लादकारिणी॥ (वक्रोक्तिजीवितम)
यहाँ 'वक्रोक्ति' से तात्पर्य है—विशिष्ट अर्थ को अभिव्यक्त करने के लिए भाषा के भंडार में अनेक शब्द होते हैं।
मम्मट
मम्मट ने 'दोषरहित, गुणसहित और कभी-कभार अनलंकृत, शब्द और अर्थमयी रचना को काव्य' कहा है—तदोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृती पुनः क्वापि (काव्य-प्रकाश)। इसमें दोषों के अभाव और गुणों के भाव को प्रधानता प्रदान की गई है और अलंकारों को नितांत आवश्यक नहीं माना है।
विश्वनाथ
साहित्य-दर्पणकार विश्वनाथ रसवादी आचार्य हैं। उन्होंने अपने पक्ष को सामने रखते हुए काव्य का लक्षण किया है—वाक्यं रसात्मकं काव्यम्। (साहित्य-दर्पण, परिच्छेद-1) अर्थात रसयुक्त वाक्य काव्य है।
राजशेखर
राजशेखर ने काव्य के लिए कहा है—'गुणवदलंकृतं च वाक्यमेव काव्यम्' (काव्य-मीमांसा)
अर्थात् गुणों और अलंकारों से युक्त वाक्य का नाम काव्य है। राजशेखर मानते थे कि अतिशयोक्तिपूर्ण होने से न तो कोई काव्य त्याज्य होता है न असत्य। क्योंकि काव्य में जो अर्थवाद या अतिशयोक्ति होती है—उसका समर्थन शास्त्र और लोक दोनों करते हैं।
पंडितराज जगन्नाथ
उन्होंने कहा कि काव्य शब्द में होता है। रमणीयतार्थ प्रतिपादक शब्द काव्य है। उन्होंने काव्य लक्षण निरूपण इस प्रकार किया—'रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम्।' पाश्चात्य काव्यशास्त्र में काव्य लक्षण।
हिंदी के विद्वानों द्वारा दिए गए काव्य-लक्षण
साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है।—बालकृष्ण भट्ट
ज्ञान-राशि के संचित कोष का नाम साहित्य है।—महावीरप्रसाद द्विवेदी
अंतःकरण की वृत्तियों के चित्र का नाम कविता है।—महावीरप्रसाद द्विवेदी
जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं। इस साधना को हम भावयोग कहते हैं और कर्मयोग और ज्ञानयोग के समकक्ष मानते हैं।—रामचंद्र शुक्ल
कविता ही मनुष्य के हृदय को स्वार्थ-संबंधों के संकुचित मंडल से ऊपर उठाकर लोक-सामान्य भाव-भूमि पर ले जाती है, जहाँ जगत की नाना गतियों के मार्मिक स्वरूप का साक्षात्कार और शुद्ध अनुभूतियों का संचार होता है।—रामचंद्र शुक्ल
काव्य संसार के प्रति कवि की भावप्रधान, किंतु वैयक्तिक संबंधों से मुक्त मानसिक प्रतिक्रियाओं, कल्पना के साँचे में ढली हुई, श्रेय की प्रेयरूपा प्रभावोत्पादक अभिव्यक्ति है।—डॉ. गुलाबराय
काव्य आत्मा की संकल्पनात्मक अनुभूति है जिसका संबंध विश्लेषण या विज्ञान से नहीं है।—जयशंकर प्रसाद
कविता हमारे परिपूर्ण क्षणों की वाणी है।—सुमित्रानंदन पंत
कविता कवि विशेष की भावनाओं का चित्रण है और वह चित्रण इतना ठीक है कि उसके जैसी ही भावनाएँ दूसरे के हृदय में आविर्भूत हो जाती हैं।—महादेवी वर्मा
काव्य तो प्रकृत मानव अनुभूतियों का नैसर्गिक कल्पना के सहारे ऐसा सौंदर्यमय चित्रण है, जो मनुष्य मात्र में स्वभावतः अपने अनुरूप भायोच्छवास और सौंदर्य-संवेदन उत्पन्न करता है। इसी सौंदर्य-संवेदन को भारतीय पारिभाषिक शब्दावली में 'रस' कहते हैं।—नंददुलारे वाजपेयी
काव्य हेतु
'हेतु' का शाब्दिक अर्थ है कारण, अतः 'काव्य हेतु' का अर्थ हुआ काव्य की उत्पत्ति का कारण। किसी व्यक्ति में काव्य रचना की सामर्थ्य उत्पन्न कर देने वाले कारण काव्य हेतु कहलाते हैं। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि काव्य 'कार्य' है और 'हेतु' कारण है। बाबू गुलाबराय ने काव्य हेतु पर विचार करते हुए लिखा है—हेतु का अभिप्राय उन साधनों से है, जो कवि की काव्य रचना में सहायक होते हैं।
काव्य के निमित्त कारण को काव्य हेतु कहा जाता है। काव्य रचना कर सकने की सामर्थ्य हर व्यक्ति में नहीं होती। जो व्यक्ति अपनी अनुभूतियों को सुंदर, विलक्षण, व्यंजनात्मक रूप में अभिव्यक्त कर लेते हैं वे ही कवि हैं, क्योंकि उनकी अभिव्यक्ति साधारणजन से भिन्न होती है।
भारतीय काव्यशास्त्र में काव्य हेतुओं पर पर्याप्त विचार किया गया है और तीन काव्य हेतु माने गए हैं :-
1. प्रतिभा
2. व्युत्पत्ति
3. अभ्यास
इनमें से प्रतिभा सर्वप्रमुख काव्य हेतु है जिसे काव्यत्व का बीज माना गया है। 'प्रतिभा' के अभाव में कोई व्यक्ति काव्य रचना नहीं कर सकता।
काव्य हेतुओं पर सर्वप्रथम 'अग्निपुराण' में विचार किया गया और प्रतिभा, वेदज्ञान तथा लोकव्यवहार को काव्य हेतु के रूप में स्वीकार किया गया—
नरत्वं दुर्लभं लोके विद्या तत्र सुदुर्लभा।
कवित्वं दुर्लभं तत्र, शक्तिस्तत्र सुदुर्लभा॥ —अग्निपुराण
अर्थात् लोक में नरत्व दुर्लभ है और उसमें विद्यावान नर होना दुर्लभ है। कवित्व परम दुर्लभ है और कविता करने की शक्ति (प्रतिभा) तो और भी दुर्लभ है।
संस्कृत काव्यशास्त्र में आचार्यों ने 'काव्य हेतु' पर पर्याप्त विचार-विमर्श किया है।
प्रमुख संस्कृत आचार्यों के 'काव्य हेतु' से संबंधित मत कालक्रमानुसार
1. आचार्य भामह का मत-आचार्य भामह ने अपने ग्रंथ 'काव्यालंकार' में स्वीकार किया है कि गुरु के उपदेश से जड़ बुद्धि भी शास्त्र अध्ययन करने में समर्थ हो सकता है, किंतु काव्य तो किसी 'प्रतिभाशाली' द्वारा ही रचा जा सकता है।
गुरुदेशादध्येतुं शास्त्रंजड़धिममोऽप्यलम्।
काव्यं तु जायते जातु कस्यचित् प्रतिभावतः॥
निश्चय ही भामह 'प्रतिभा' को काव्य का प्रधान हेतु स्वीकार करते हैं, किंतु एक अन्य श्लोक में वे स्वीकार करते हैं कि शब्दशास्त्र को जानने वालों की सेवा और उपासना करके, शब्द का तथा शब्दार्थ का ज्ञान करके तथा अन्य कवियों के कृतित्व का अध्ययन करके ही काव्य रचना में प्रवृत्त होना चाहिए। स्पष्ट है कि भामह 'प्रतिभा' के साथ-साथ 'व्युत्पत्ति' (शास्त्र ज्ञान) एवं 'अभ्यास' को भी काव्य हेतुओं में स्थान देने के पक्षधर हैं।
2. आचार्य दंडी का मत-आचार्य दंडी ने अपने ग्रंथ 'काव्यादर्श' में प्रतिभा, आनंद अभियोग (अभ्यास) और लोकव्यवहार एवं शास्त्रज्ञान को काव्य हेतुओं के रूप में मान्यता दी है। उनके अनुसा—
नैसर्गिकी च प्रतिभा श्रुतं च बहु निर्मलम्।
आनन्दाश्चयाभियोगो अस्याः कारणं काव्य संपदा॥
अर्थात् नैसर्गिक प्रतिभा, निर्मल शास्त्र ज्ञान और बढ़ा-चढ़ा अभ्यास काव्य संपत्ति में कारण होते हैं। नैसर्गिक प्रतिभा से उनका तात्पर्य जन्मजात प्रतिभा से है, जो ईश्वर प्रदत्त होती है। इस प्रतिभा को अर्जित नहीं किया जा सकता। प्रतिभा के अभाव में निम्नकोटि की काव्य रचना निरंतर अभ्यास एवं शास्त्र ज्ञान से हो सकती है।
3. आचार्य वामन का मत—आचार्य वामन ने अपने ग्रंथ 'काव्यालंकार सूत्रवृत्ति' में प्रतिभा को जन्मजात गुण मानते हुए इसे प्रमुख काव्य हेतु स्वीकार किया है—
कवित्व बीजं प्रतिभानं कवित्वस्य बीजम्
वे लोक व्यवहार, शास्त्रज्ञान, शब्दकोश आदि की जानकारी को भी काव्य हेतुओं में स्थान देते हैं। एक अन्य स्थान पर वे काव्य हेतुओं में प्रतिभा को कवित्व का बीज स्वीकार करते हैं जो जन्म-जन्मांतर के संस्कार से शक्ति रूप में कवि में विद्यमान होती है। अभियोग, वृद्ध सेवा, अवेक्षण, अवधान आदि से ही उत्तम काव्य का निर्माण कर सकना संभव हो पाता है।
4. आचार्य रुद्रट का मत—आचार्य 'रुद्रट' ने अपने ग्रंथ 'काव्यालंकार' में प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास को काव्य हेतु स्वीकार किया है। प्रतिभा के वे दो भेद मानते हैं सहजा और उत्पाद्या। सहजा प्रतिभा कवि में जन्मजात होती है और यही काव्य निर्माण का मूल हेतु है जबकि उत्पाद्या प्रतिभा लोकशास्त्र एवं अभ्यास से व्युत्पन्न होती है। यह सहजा प्रतिभा को संस्कारित एवं परिष्कृत करती है।
5. आचार्य मम्मट का मत—आचार्य 'मम्मट' ने अपने ग्रंथ 'काव्यप्रकाश' में काव्य हेतुओं पर विचार करते हुए लिखा है—
शक्तिर्निपुणता लोकशास्त्र काव्यायवेक्षणात्।
काव्यज्ञशिक्षयाभ्यास इति हेतुस्तदुद्भवे॥
अर्थात् काव्य के तीन हेतु हैं—शक्ति, (प्रतिभा), लोकशास्त्र का अवेक्षण तथा अभ्यास। वे एक अन्य स्थान पर यह भी कहते हैं शक्तिः कवित्व बीजरूपः अर्थात् 'शक्ति' काव्य का बीज संस्कार है, जिसके अभाव में काव्य रचना संभव ही नहीं है। जिसे अन्य आचार्य 'प्रतिभा' कहते हैं, उसी को मम्मट ने 'शक्ति' कहा है।
6. केशव मिश्र—'प्रतिभा कारणं तस्य व्युत्पत्ति विभूषणं' अर्थात् प्रतिभा काव्य का कारण है तथा व्युत्पत्ति उसे विभूषित करती है।
7. हेमचंद्र इन्होंने अपने ग्रंथ 'शब्दानुशासन' में लिखा है प्रतिभाऽस्य हेतुः प्रतिभा नवन्वोन्मेषशालिनी प्रज्ञा अर्थात् प्रतिभा काव्य का हेतु है, तथा नवनवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा को प्रतिभा कहते हैं।
8. राजशेखर प्रतिभा व्युत्पत्ति मिश्रः समवेते श्रेयस्यौ इति अर्थात् प्रतिभा और व्युत्पत्ति दोनों समवेत रूप में काव्य के श्रेयस्कर हेतु हैं।
वे प्रतिभा के दो भेद स्वीकारते है :-
(1) कारयित्री, (ii) भावयित्री।
कारयित्री प्रतिभा जन्मजात होती है तथा इसका संबंध कवि से है। भावयित्री प्रतिभा का संबंध सहृदय पाठक या आलोचक से है।
9. पंडितराज जगन्नाथ इन्होंने अपने ग्रंथ 'इस गंगाधर' में 'प्रतिभा' को ही प्रमुख काव्य हेतु स्वीकार किया है—
तस्य च कारणं कविगता केवलं प्रतिभा
उक्त विवेचन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि काव्य के तीन प्रमुख हेतु हैं :-
1. प्रतिभा
2. व्युत्पत्ति
3. अभ्यास
काव्य हेतुओं का स्वरूप
(1) प्रतिभा : प्रतिभा वह शक्ति है जो किसी व्यक्ति को काव्य रचना में समर्थ बनाती हैं। राजशेखर ने प्रतिभा के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए कहा है—सा शक्तिः केवल काव्य हेतुः। आचार्य भट्टतीति के अनुसार प्रतिभा उस प्रज्ञा का नाम है जो नित नवीन रसानुकूल विचार उत्पन्न करती है।
'प्रज्ञा नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिमा मताः'
आचार्य वामन का मत है कि प्रतिभा जन्म से प्राप्त संस्कार—है जिसके बिना काव्य रचना संभव नहीं है।
आचार्य अभिनव गुप्त ने प्रतिभा की परिभाषा करते हुए लिखा है—'प्रतिभा अपूर्व वस्तु निर्माण क्षमा प्रज्ञा' अर्थात् प्रतिभा प्रज्ञा का वह रूप है जिसमें अपूर्व की सृष्टि करने की क्षमता होती है। कवि इसी के बल पर काव्य-सर्जना में समर्थ होता है।
वक्रोक्ति संप्रदाय के प्रवर्तक आचार्य कुंतक ने प्रतिभा उस शक्ति को माना है जो शब्द और अर्थ में अपूर्व सौंदर्य श्री सृष्टि करती है, नाना प्रकार के अलंकारों, उक्ति वैचित्र्य आदि का विधान करती है।
प्रतिभा प्रथमोद्भेद समये यत्र वक्रता।
शब्दाभिभेय योरन्तः स्फुरतीव विभाव्यते॥
महिम भट्ट 'प्रतिभा' को कवि का तृतीय नेत्र मानते हैं जिससे समस्त भावों का साक्षात्कार होता है। प्रतिभा नवीन सृजन में सहायक होने वाली शक्ति है। प्रतिभा के अभाव में काव्य सृजन करने वाला कवि उपहास का पात्र बनता है।
आचार्य मम्मट ने प्रतिभा को एक नया नाम दिया। वे इसे 'शक्ति' कहते हैं और काव्य का बीज स्वीकार करते हैं जिसके बिना काव्य की रचना असंभव है।
'शक्तिः कवित्व बीज रूपः संस्कार विशेषः' अर्थात् शक्ति (प्रतिभा) कवित्व का बीजरूप संस्कार विशेष है। जिसके बिना काव्य सृजन नहीं हो सकता।
आचार्यों ने प्रतिभा का जो स्वरूप यहाँ स्पष्ट किया है उससे हम निम्न निष्कर्ष निकाल सकते हैं :-
(1) प्रतिभा काव्य का मूल हेतु है।
(2) यह ईश्वर प्रदत्त शक्ति है।
(3) प्रतिभा नवनवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा है।
(4) प्रतिभा के बल पर ही कवि अपूर्व शब्दों, अपूर्व भावों, अलंकारों, उक्ति वैचित्र्य आदि का विधान करता है।
(5) प्रतिभा दो प्रकार की होती है कारयित्री प्रतिभा और भावयित्री प्रतिभा।
कारयित्री प्रतिभा वह होती है जिसके बल पर कवि कविता लिखता है और भावयित्री प्रतिभा वह होती है जिसके बल पर कोई पाठक कविता को समझता है।
सभी-आचार्यों ने प्रतिभा के महत्व को स्वीकार किया है और इसे काव्य का मूल हेतु माना है।
डॉ. नगेंद्र ने प्रतिभा को असाधारण कोटि की मेधा मानते हुए कहा है कि प्रतिभा को नीरस और साधारण वातावरण अच्छे नहीं लगते वह असाधारणता में खुलकर खेलती है।
(2) व्युत्पत्ति : व्युत्पत्ति का शाब्दिक अर्थ है निपुणता, पांडित्य या विद्वत्ता। ज्ञान की उपलब्धि को भी व्युत्पत्ति कहा गया है। यह ज्ञानोपलब्धि शास्त्रों के अध्ययन और लोक व्यवहार के अवेक्षण से होती है।
विद्वानों का मत है कि साहित्य के गहन चिंतन-मनन से कवि की उक्ति में सौंदर्य का समावेश हो जाता है और उसकी रचना सुव्यवस्थित हो जाती है।
• रुद्रट ने यह बताया है कि छंद, व्याकरण, कला, पद और पदार्थ के उचित अनुचित का सम्यक् ज्ञान ही व्युत्पत्ति कहा जाता है।
आचार्य मम्मट ने व्युत्पत्ति को एक नया नाम दिया है—निपुणता। यह निपुणत्ता चराचर जगत के निरीक्षण और काव्य आदि के अध्ययन से प्राप्त होती है।
राजशेखर के अनुसार उचितानुचित विवेकौ व्युत्पत्तिः। अर्थात् उचित अनुचित का विवेक ही व्युत्पत्ति है।
संस्कृत आचार्यों ने व्युत्पत्ति को काव्य हेतुओं में दूसरा स्थान दिया है। व्युत्पत्ति के बल पर ही कोई व्यक्ति यह निर्णय कर पाता है कि किस स्थान पर किस शब्द का प्रयोग उचित होगा। सच तो यह है कि प्रतिभा और व्युत्पत्ति समवेत रूप में ही काव्य रचना के हेतु हैं जैसे लावण्य के बिना रूप फीका लगता है वैसे ही रूप के बिना लावण्य भी आकर्षक नहीं लगता।
व्युत्पत्ति दो प्रकार की होती है :-
(1) शास्त्रीय
शास्त्रीय व्युत्पत्ति शास्त्रों के अध्ययन से तथा लौकिक व्युत्पत्ति लोक के निरीक्षण से उत्पन्न होती है। प्रथम प्रकार की व्युत्पत्ति से जहाँ काव्य में सौंदर्य एवं व्यवस्था का समावेश होता है वहीं लौकिक व्युत्पत्ति से विषय की सम्यक् प्रस्तुति संभव होती है। कवि की अभिव्यक्ति दोषरहित, मार्मिक एवं प्रभावकारी तभी होती है जब वह लोक एवं शास्त्र की व्युत्पत्ति से युक्त हो।
(2) लौकिक
लोक और शास्त्र का अध्ययन कवि को त्रुटियों से बचाता है। वर्ण्य विषय का ज्ञान, ऋतु ज्ञान, देश ज्ञान, भौगोलिक जानकारी आदि से कविता में त्रुटि आने की संभावना नहीं रहती अन्यथा मूर्ख कवि रेगिस्तान में धान की खेती का वर्णन कर सकता है। शब्द शिल्प और भाषा पर अधिकार बहुज्ञता से ही होता है अतः कवि को निरंतर सजग रहने की आवश्यकता होती है तभी वह उत्तम काव्य की रचना करने में समर्थ हो पाता है।
(3) अभ्यास
काव्य निर्माण का तीसरा हेतु अभ्यास है। भामह ने लिखा है कि शब्दार्थ के स्वरूप का ज्ञान करके सतत अभ्यास द्वारा उसकी उपासना करनी चाहिए, साथ ही अन्य कवियों के कृतित्व का अध्ययन भी करना चाहिए। जिससे अभ्यास नित्यप्रति दृढ़ होता जाए। आचार्य वामन ने भी अभ्यास को महत्व देते हुए लिखा है—'अभ्यासोहि कर्मसु कौशलं भावहिति।' अर्थात् अभ्यास के द्वारा ही कवि कर्म में कुशलता प्राप्त की जा सकती है।
आचार्य दंडी ने तो अभ्यास को ही काव्य का प्रमुख हेतु माना है। वे तो यहाँ तक कहते हैं कि प्रतिभा और व्युत्पत्ति के अभाव में केवल अभ्यास से ही काव्य रचना में कोई कुशल हो सकता है। सरस्वती की साधना से और शास्त्रों के श्रवण से कोई भी व्यक्ति सफल कवि बन सकता है। दंडी की यह धारणा अन्य आचार्यों ने स्वीकार नहीं की। प्रतिभा के अभाव में काव्य रचना संभव ही नहीं है। फिर कोरा अभ्यास व्यक्ति को कैसे कवि बना सकता है, किंतु अभ्यास के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। प्रारंभ में प्रतिभा संपन्न कवि भी अच्छी कविता नहीं लिख पाते। निरंतर अभ्यास से ही उनकी कविता निखरती है। जो कवि कीर्ति चाहते हैं उन्हें आलस्य को त्यागकर सरस्वती की उपासना करनी चाहिए और निरंतर कवि कर्म का अभ्यास करते रहना चाहिए।
हिंदी के रीतिकालीन आचार्यों ने काव्य हेतुओं पर विचार तो किया है पर वे कोई नवीन उद्भावना नहीं कर सके।
भिखारीदास 'कविता' करने की 'शक्ति' जन्मजात मानते हैं—सक्ति कवित्त बनाइवे की जिन जन्म नछत्र में दीनी विधाता।
आचार्य श्रीपति ने अपने ग्रंथ 'काव्य सरोज' में काव्य हेतुओं का उल्लेख इस प्रकार किया है—
शक्ति, निपुणता, लोकमत वित्पति अरु अभ्यास।
अरु प्रतिभा ते होत है ताको ललित प्रकास॥
आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के अनुसार कवि के लिए जिस बात की सबसे अधिक ज़रूरत होती है, वह प्रतिभा है।
डॉ. नगेंद्र 'प्रतिभा' को चेतना मानते हैं जो अनुभूति, चिंतन, विचार, संकल्प तथा कल्पना, आदि क्रियाएँ संपादित करती है।
पाश्चात्य विचारकों ने भी अपने ढंग से काव्य हेतुओं पर विचार किया है।
यहाँ कुछ प्रमुख मत प्रस्तुत हैं :-
1. अरस्तू के अनुसार कवि की प्रतिभा जन्मजात होती है। कवि को वे A man of born talent मानते हैं।
2. होरेस इन्होंने प्रतिभा और अभ्यास को काव्य हेतु माना है—For my part I fail to see the use of study without wit or of wit without training.
3. क्रोचे (Croce) ने स्वयं प्रकाश ज्ञान (Intu-tion) और बाह्यभिव्यंजना (Expression) की महत्ता स्वीकारते हुए काव्य हेतुओं में वस्तुतः 'प्रतिभा' और 'अभ्यास' को ही महत्व दिया है।
4. टी. एस. ईलियट महान रचना तभी जन्म लेती जब प्रौढ़ सभ्यता, प्रौढ़ भाषा और प्रौढ़ कलाकार एक साथ जुड़े हों। प्रौढ़ता से उनका तात्पर्य 'अभ्यास' से हैं। 'प्रतिभा' की महत्ता भी उन्होंने स्वीकार की है।
उपर्युक्त विवेचन के आधार पर हम कह सकते हैं कि प्रतिभा व्युत्पत्ति और अभ्यास ही प्रमुख काव्य हेतु हैं, किंतु प्रतिभा सर्वप्रमुख है जिसे व्युत्पत्ति और अभ्यास से निरंतर निखारा जा सकता है। वस्तुतः ये तीनों समन्वित रूप में हो काव्य के हेतु हैं जिन्हें अलग-अलग नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार पानी को बार-बार छानने से वह निर्दोष हो जाता है और बर्तन को बार-बार माँजने से वह चमक उठता है उसी प्रकार व्युत्पत्ति और अभ्यास से प्रतिभा को निर्दोष और आकर्षक बनाया जा सकता है।
काव्य प्रयोजन
काव्य प्रयोजन का तात्पर्य है 'काव्य रचना का उद्देश्य'। काव्य किस उद्देश्य से लिखा जाता है और किस उद्देश्य से पढ़ा जाता है इसे दृष्टिगत रखकर काव्य प्रयोजनों पर कवि और पाठक की दृष्टि से विस्तृत विचार-विमर्श काव्यशास्त्र में किया गया है। काव्य प्रयोजन काव्य प्रेरणा से अलग है, क्योंकि काव्य प्रेरणा का अभिप्राय है काव्य की रचना के लिए प्रेरित करने वाले तत्व जबकि काव्य प्रयोजन का अभिप्राय है काव्य रचना के अनंतर (बाद में) प्राप्त होने वाले लाभ।
काल-क्रमानुसार विभिन्न आचार्यों द्वारा निर्दिष्ट काव्य प्रयोजन
(1) भरत मुनि 'नाट्य शास्त्र' के रचयिता भरत मुनि ने नाटक के प्रयोजनों पर विचार करते हुए लिखा है—
धर्म्यं यशस्यम् आयुष्यं हितं बुद्धि विवर्धनम्।
लोकोपदेशजननं नाट्यमेतद् भविष्यति॥
भरत मुनि द्वारा निर्दिष्ट इन प्रयोजनों में भौतिक प्रयोजनों का व्यापक उल्लेख है, किंतु काव्य का प्रधान उद्देश्य आनंद प्राप्ति है जिसका उल्लेख यहाँ नहीं किया गया है। एक अन्य स्थान पर उन्होंने नाटक का उद्देश्य दुःखार्त व्यक्ति को सुख और शांति की प्राप्ति करना बताया है—
दुखार्तानां श्रमार्तानां शोकार्तानां तपस्विनाम्।
विश्रान्तिजननं काले नाट्यमेतद् भविष्यति॥
नाटक काव्य का ही एक रूप है अतः भरतमुनि द्वारा निर्दिष्ट इन प्रयोजनों को 'काव्य प्रयोजन' स्वीकार किया जा सकता है।
(2) भामह
आचार्य भामह ने अपने ग्रंथ काव्यालंकार में काव्य प्रयोजनों की चर्चा करते हुए लिखा है—
धर्मार्थ काम मोक्षेषु वैचक्षण्यं कलासु च।
करोति कीर्ति प्रीतिश्च साधुकाव्य निबन्धनम्॥
अर्थातु धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति कलाओं में निपुणता के साथ-साथ उत्तम काव्य से कीर्ति और प्रीति (आनंद) की भी प्राप्ति होती है। भामह के प्रयोजन व्यापक है तथा इनमें कवि और पाठक दोनों के काव्य प्रयोजनों की चर्चा है।
(3) आचार्य वामन के अनुसार—
काव्यं सद्द्रष्टा द्रष्टार्थ प्रीति-कीर्ति-हेतुत्वात्।
अर्थात् काव्य में दो प्रमुख प्रयोजन हैं :-
1. प्रीति अथवा आनंद साधना जो काव्य का दृष्ट प्रयोजन है।
2. कीर्ति अथवा यश प्राप्ति, जो काव्य का अदृष्ट प्रयोजन है।
(4) आचार्य कुंतक वक्रोक्ति संप्रदाय के प्रवर्तक आचार्य कुंतक ने अपने ग्रंथ 'वक्रोक्ति जीवितम' में काव्य-प्रयोजनों का उल्लेख करते हुए कहा है—
धर्मादि साधनोपायः सुकुमारक्रमोदितः।
काव्यबन्योऽभिजातानां हृदयाह्लादकारकः॥
अर्थात् काव्य धर्मादि सिद्धि का साधन होने के साथ-साथ आह्लाद उत्पन्न करने वाला होता है। इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए वे यह भी कहते हैं—
चतुर्वर्गफलास्वादमप्यातिक्रम्य तद्विदाम।
काव्यामृतरसेनान्तश्चमत्कारो वितन्यते॥
काव्य रूपी अमृत सहृदयों के अंतःकरण में चतुर्वर्ग फलस्वाद से भी बढ़कर आनंद उत्पन्न करने वाला होता है। वे व्यवहार ज्ञान, आनंदोपलब्धि एवं पुरुषार्थ चतुष्टय की सिद्धि को काव्य प्रयोजन मानते हैं।
(5) आचार्य मम्मट ने अपने ग्रंथ 'काव्यप्रकाश' में काव्य प्रयोजनों पर विस्तृत चर्चा की है। उनके अनुसार—
काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारयिदे शिवेतरक्षतये।
सद्यः परिनिर्वृत्तये कान्तासम्मित तयोपदेशयुजे॥
अर्थात् काव्य यश के लिए, अर्थ प्राप्ति के लिए, व्यवहार ज्ञान के लिए, अमंगल शांति के लिए, अलौकिक आनंद की प्राप्ति के लिए और कांता के समान मधुर उपदेश प्राप्ति के लिए प्रयोजनीय होते हैं।
मम्मट ने मूलतः छः काव्य प्रयोजन बताए हैं जो निम्नवत हैं :-
1.यश प्राप्ति, 2. अर्थ प्राप्ति, 3. लोक व्यवहार ज्ञान, 4. अनिष्ट का निवारण या लोकमंगल, 5. आत्मशांति या आनंदोपलब्धि, तथा 6. कांतासम्मित उपदेश। इनमें से काव्य की रचना करने वाले कवि के प्रयोजन हैं—यश प्राप्ति, अर्थ प्राप्ति, आत्मशांति तथा काव्य का अस्वादन करने वाले पाठक के काव्य प्रयोजन हैं—लोक व्यवहार ज्ञान, अमंगल की शांति, आनंदोपलब्धि और कांतासम्मित उपदेश। मम्मट के ये काव्य प्रयोजन अत्यंत व्यापक हैं।
1. यश प्राप्ति : यश प्राप्ति की इच्छा से कविगण काव्य रचना में प्रवृत्त होते रहे हैं। अतः यश प्राप्ति को मम्मट ने काव्य का प्रमुख प्रयोजन माना है। काव्य रचना करके अनेक महाकवियों ने अक्षय यश प्राप्त किया है।
रीतिकालीन कवि आचार्य कुलपति, दैव और भिखारीदास ने भी अपने काव्य प्रयोजनों में यश प्राप्ति को विशेष स्थान दिया है।
2. अर्थ प्राप्ति : काव्य रचना का एक प्रयोजन धन प्राप्ति भी रहा है। धनोपार्जन की इच्छा से रीतिकालीन कवियों ने राजदरबारों में आश्रय ग्रहण किया। कहते हैं कि बिहारी को प्रत्येक दोहे की रचना के लिए एक अशर्फ़ी प्राप्त होती थी। आधुनिक युग में कवि सम्मेलनों में अनेक कवि अपनी कविताओं को गाकर, सुनाकर अच्छा-ख़ासा धन पैदा कर रहे हैं। इस प्रकार कविता धनोपार्जन का माध्यम बन गई है। इसीलिए संभवतः मम्मट ने अर्थ प्राप्ति को काव्य प्रयोजनों में स्थान दिया है।
3. व्यवहार ज्ञान : आचार्य मम्मट ने व्यवहार ज्ञान को भी काव्य का प्रयोजन माना है। रामायण आदि महाकाव्यों के अनुशीलन से पाठकों को उचित व्यवहार की शिक्षा प्राप्त होती है। संस्कृत में बहुत-सा साहित्य इसी प्रयोजन को ध्यान मे रखकर लिखा गया था। पंचतंत्र, हितोपदेश, नीतिशतक जैसे ग्रंथ व्यवहार ज्ञान की शिक्षा देने के लिए लिखे गए। काव्य के अनुशीलन से यह ज्ञात होता है कि हम कैसा व्यवहार करें।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने चिंतामणि में यह स्वीकार किया है कि काव्य से व्यवहार ज्ञान होता है—यह धारणा कि काव्य व्यवहार का बाधक है, उसके अनुशीलन से अकर्मण्यता आती है, ठीक नहीं। कविता तो भाव प्रसार द्वारा कर्मण्य के लिए कर्मक्षेत्र का और विस्तार कर देती है।
4. शिवेतरक्षतये 'शिवेतर' का अर्थ है—अमंगल और 'क्षतये' का अर्थ है—विनाश। इसका तात्पर्य है कि काव्य अमंगल का विनाश करता है और कल्याण का विधान करता है। अपने युग और समाज को अनिष्ट से बचाने के लिए अनेक कवियों ने काव्य रचनाएँ लिखी हैं। कभी-कभी कवि व्यक्तिगत अमंगल को दूर करने के लिए भी काव्य रचना करता है।
5. आत्मशांति : काव्य पढ़ने के साथ ही तुरंत आनंद का अनुभव होता है और परम शांति की प्राप्ति होती है। काव्य का रसास्वादन करने से अलौकिक आनंद की अनुभूति होती है। वस्तुतः आनंदोपलब्धि ही काव्य का प्रमुख प्रयोजन है। काव्य का रसास्वादन करते समय पाठक को समाधिस्थ योगी के समान अलौकिक आनंद प्राप्त होता है। कुछ समय के लिए वह अपनी सत्ता को भूलकर काव्य के आनंद में लीन हो जाता है। इसीलिए काव्यानंद को 'ब्रह्मानंद सहोदर' कहा गया है। काव्य की रचना करके कवि को भी यही आनंद मिलता है और काव्य का रसास्वादन करके पाठक को भी ऐसे ही आनंद की अनुभूति होती है। इस प्रकार काव्य का प्रयोजन कवि और पाठक दोनों से संबंधित है। काव्य में डूबा हुआ मन साधारणीकरण की स्थिति में पहुँचकर रसमग्न हो जाता है और यही रसमग्नता आयु परमशांति अर्थात् आनंद प्रदान करती है। आचायों ने इसी कारण इस प्रयोजन को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रयोजन कहा है।
6. कांतासम्मित उपदेश काव्य प्रियतमा के समान मधुर उपदेश देने वाला है।
उपदेश तीन प्रकार के होते हैं :-
1. प्रभु सम्मित उपदेश, 2. मित्र सम्मित उपदेश, तथा 3. कांता सम्मित उपदेश।
वेदशास्त्रों का उपदेश प्रभु सम्मित (स्वामी के उपदेश) जैसा है। वह हितकर तो है पर रुचिकर नहीं। पुराणों इतिहास आदि का उपदेश मित्रतुल्य उपदेश है, जिसकी अवहेलना भी की जा सकती है, किंतु काव्य का उपदेश कांता सम्मित उपदेश है जो हितकर भी है, रुचिकर भी है और जिसकी अवहेलना भी नहीं की जा सकती।
जिस प्रकार कांता (प्रेयसी) मधुर हावभावों से पुरुष को मुग्ध करके उसे अपनी इच्छानुकूल नीति मार्ग पर ले जाती है। उसी प्रकार काव्य भी मधुर कथा के द्वारा उच्च आदशों की शिक्षा देता है; जिस प्रकार मिठाई के लोभ में बालक कटु औषधि खा लेता है, उसी प्रकार रस के मधुर आस्वाद से मिश्रित शिक्षा काव्य द्वारा सरलता से कराई जा सकती है।
हिंदी आचार्यों द्वारा निर्दिष्ट काव्य प्रयोजन :
हिंदी आचार्यों ने काव्य प्रयोजन पर जो विचार व्यक्त किए हैं वे प्रायः संस्कृत आचार्यों जैसे हैं। यहाँ हम कुछ प्रमुख उद्धरण प्रस्तुत कर रहे हैं :-
गोस्वामी तुलसीदास के काव्य प्रयोजन-रामचरितमानस में तुलसीदास ने दो स्थानों पर काव्य प्रयोजनों की चर्चा की है :
(i) स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथगाथा
(ii) कीरति भनिति भूति भल सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होइ॥
वे काव्य के दो प्रयोजन मानते हैं :-
(a) स्वान्तः सुख, (b) लोक मंगल।
वही कविता श्रेष्ठ होती है जो गंगा के समान सबका हित करने वाली हो।
2. भिखारीदास द्वारा निर्दिष्ट काव्य प्रयोजन—
एक लहैं, तप पुंजन के फल, ज्यों तुलसी अरु सूर गुसाईं। एक लहैं बहु संपत्ति केशव, भूषण ज्यों बर बीर बड़ाई॥ एकन्ह को जस-ही सों प्रयोजन, है रसखानि रहीम की नाई। दास कवित्तन्ह की चरचा बुद्धिवंतन को सुख वै सब ठाई॥
यहाँ यश प्राप्ति, फल प्राप्ति, आनंद प्राप्ति आदि को काव्य प्रयोजन के रूप में स्वीकार किया गया है।
3. मैथिलीशरण गुप्त का मत—गुप्तजी काव्य का प्रयोजन केवल मनोरंजन नहीं अपितु उपदेश स्वीकार करते हुए लिखते हैं—केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए। उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मत—आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने काव्य प्रयोजनों पर विस्तार से विचार किया है। वे काव्य का प्रमुख प्रयोजन रसानुभूति मानते हैं।
कविता का अंतिम लक्ष्य जगत में मार्मिक पक्षों का प्रत्यक्षीकरण करके उसके साथ मनुष्य हृदय का सामंजस्य स्थापन है।
कविता से केवल मनोरंजन के उद्देश्य का विरोध करते हुए वे लिखते हैं—मन को अनुरंजित करना उसे सुख या आनंद पहुँचाना ही यदि कविता का अंतिम लक्ष्य माना जाए तो कविता भी विलास की एक सामग्री हुई।...काव्य का लक्ष्य है जगत और जीवन के मार्मिक पक्ष को गोचर रूप में लाकर सामने रखना।
प्रसिद्ध विद्वान आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी साहित्य का लक्ष्य मानव हित एवं लोकमंगल मानते हैं। उनके अनुसार—मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ। जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता, परमुखापेक्षिता से न बचा सके, जो उसकी आत्मा को तेजोद्दीप्त न कर सके, जो उसे पर-दुःखकातर और संवेदनशील न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता है।”
प्रेमचंद भी काव्य या साहित्य का उद्देश्य मनोरंजन नहीं मानते। उनके अनुसार साहित्य का लक्ष्य मानव विवेक को जाग्रत करना है—साहित्य का उद्देश्य हमारा मनोरंजन करना नहीं है। यह काम तो भाटों, मदारियों, विदूषकों और मसखरों का है। साहित्यकार का पद इनसे बहुत ऊँचा है। वह हमारे विवेक को जाग्रत करता है, हमारी आत्मा को तेजोद्दीप्त बनाता है।
पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र में काव्य प्रयोजन पर कला के संदर्भ में विचार किया गया है। इस संबंध में दो प्रमुख मत हैं।
कलावादियों के अनुसार कला का एकमात्र प्रयोजन सौंदर्य सृष्टि है और इसीलिए वे कला, कला के लिए सिद्धांत के समर्थक हैं, जबकि उपयोगितावादियों के अनुसार कला का उद्देश्य लोकहित का विधान करना है।
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