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इकाई-3 (रस, रसनिष्पत्ति, साधारणीकरण)

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हिन्दवी डेस्क

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इकाई-3 (रस, रसनिष्पत्ति, साधारणीकरण)

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    रस : स्वरूप, अवयव और भेद

     

    रस का स्वरूप

     

    रस संबंधी प्रारंभिक अवधारणा का बीज वैदिक साहित्य में है, जहाँ इसे सारतत्व, आनंद तथा ब्रह्मतत्व का पर्याय माना जाता है। साहित्य के आस्वादन से प्राप्त आनंद ही रस है। इसे ब्रह्म के समकक्ष माना गया है। 'रसो वै सः' यानी रस ही ब्रह्म है। काव्यशास्त्रीय दृष्टिकोण के अंतर्गत काव्य से उत्पन्न आनंद (रस) के साथ ब्रह्मानंद सहोदरत्व की भावना जुड़ी हुई है। रस की निर्मिति स्थायी भाव के साथ विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग होने से होती है। रस के इन अंगों की चेतना सम्मिलित है, खंडित नहीं। इसलिए रस अपने स्वरूप में अखंड है और स्वप्रकाशित भी। साहित्य के रसास्वादन का अर्थ है साहित्य की विषयवस्तु के साथ तदाकारिता स्थापित कर लेना या उसमें निहित सौंदर्य का पूर्ण अवलोकन करना। इस प्रकार कहा जा सकता है कि रस अनुभूति का विषय है। रस निष्पत्ति संबंधी विभिन्न अवधारणाओं में रस के स्वरूप पर यथेष्ट प्रकाश डाला गया है। इसी क्रम में अभिनवगुप्त ने रस को पूर्णरूपेण अनुभूति का विषय मानते हुए कहा कि यह अलौकिक मानसिक व्यापार एवं द्रवता का अंग है। आचार्य विश्वनाथ 'वाक्यं रसात्मकं काव्यम्' कहते हुए अपने साहित्य दर्पण में रस को ब्रह्मानंद के समकक्ष मानते हैं। पंडितराज जगन्नाथ ने अपनी काव्य परिभाषा में प्रयुक्त रमणीयता का अर्थ स्पष्ट करते हुए उसे लोकोत्तर आह्लाद का जनक कहा है—'रमणीयता च लोकोत्ताराह्लादजनक ज्ञान गोचरता'। रस और उसकी अनुभूति अपने स्वरूप में निर्वैयक्तिक है। व्यक्तिगत राग-द्वेष से रहित एक अनिर्वचनीय आनंद की अलौकिक स्थिति जिसमें जीवन की दुःखद घटनाओं का चित्रण भी मन को राग-विराग से परे रखकर एक आनंद की अनुभूति कराता है। रस की यह अनुभूति सहृदय या सामाजिक करता है। भावक, पाठक, श्रोता, अध्येता और दर्शक ही सहृदय या सामाजिक की श्रेणी में आते हैं।

     

    रस के अवयव

     

    रस खाद्यान्न में रहता है। रस औषधि में भी होता है। रस आध्यात्म में होता है। रस साहित्य का भी अनन्य अंग है। इस साहित्यिक रस के चार अवयव होते हैं—स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव और संचारी भाव। रस के संदर्भ में अवयव का अर्थ सामग्री या अंग से भी लिया जाता है। भरत मुनि ने

     

    स्थायी भाव : मनुष्य के जन्मजात संस्कार या उसकी मूल प्रवृत्ति जो स्थायी रूप से उसके हृदय में निवास करती है; स्थायी भाव कहलाती है। हर रस का स्थायी भाव अलग होता है। उदाहरणः रति (शृंगार रस), क्रोध (रौद्र रस), उत्साह (बीर रस), जुगुप्सा या घृणा (वीभत्स रस), हास (हास्य रस), शोक (करुण रस), विस्मय (अद्भुत रस), भय (भयानक रस), निर्वेद (शांत रस) और वत्सल (वात्सल्य रस) इत्यादि।

     

    विभाव : विभाव उन कारक तत्वों को कहा जाता है जो स्थायी भावों में तीव्रता लाते हैं या उनको जागृत करते हैं। ये कारक तत्व बाह्य होते हैं। इन बाह्य कारक तत्वों को दो भागों में बाँटा गया है—आलंबन विभाव और उद्दीपन विभाव।

     

    आलंबन विभाव : जिन व्यक्ति, वस्तु या पात्रों के कारण आश्रय के चित्त में स्थायी भाव जागृत होकर रस बनता है, वे आलंबन विभाव कहलाते हैं। दूसरे शब्दों में जिस वस्तु, व्यक्ति या पात्रों को देखकर आश्रय का स्थायी भाव जागृत होता है वह आलंबन कहलाता है। जिसके चित्त में स्थायी भाव जागृत हुआ वह आश्रय है। जिसके प्रति आश्रय के चित्त में ये भाव जागृत हुए, वह विषय या आलंबन कहलाता है।

     

    उद्दीपन विभाव : स्थायी भाव में तीव्रता लाने वाले या उसका संवर्धन करनेवाले तत्वों को उद्दीपन विभाव कहते हैं। स्थायी भाव को उद्दीप्त करने में विषय की बाहरी चेष्टाओं के साथ बाह्य वातावरण का विशेष महत्व होता है।

     

    उदाहरण : शृंगार रस के अंतर्गत चाँदनी रात में नायक और नायिका के विहार का दृश्य ले लें। यहाँ नायक आश्रय है। उसके चित्त में रति स्थायी भाव के रूप में अवस्थित है। नायक के चित में यह स्थायी भाव नायिका के प्रति जागृत हुआ अतः नायिका यहाँ विषय है। स्थायी भाव को संवर्धित कौन कर रहा है? एक नायिका की बाहरी चेष्टाएँ और दूसरा बाहरी वातावरण—ये दोनों तत्व जो स्थायी भाव में तीव्रता लाने का कार्य कर रहे हैं उद्दीपन विभाव कहे जाएँगे।

     

    अनुभाव : आश्रय के चित्त में स्थायी भाव के बाद उत्पन्न होनेवाले भाव अनुभाव कहलाते हैं। अनुभाव का सामान्य अर्थ है आश्रय के मनोभावसूचक शारीरिक एवं मानसिक विकार। दूसरे शब्दों में भावोद्वेलन के बाद आश्रय के चित्त में जो भाव आते हैं उनसे आश्रय में शारीरिक एवं मानसिक परिवर्तन दिखलाई पड़ता है। इन परिवर्तनों के सूचक चिह्न अनुभाव कहलाते हैं। इन अनुभावों की संख्या आठ मानी गई है जो इस प्रकार हैं : रोमांच, अश्रु, प्रलाप, स्वेद, कंप, स्वरभंग, स्तंभ और विवर्णता। इन्हें सात्विक भाव भी कहा जाता है। इसी के माध्यम से स्थायी भाव अभिव्यक्त होता है।

     

    संचारी भाव : संचारी भाव उन भावों को कहा जाता है जो स्थायी भावों के साथ आते-जाते रहते हैं तथा उन्हें पुष्ट करते हैं। इन्हें व्यभिचारी भाव भी कहा जाता है। इनकी संख्या नाट्यशास्त्र में 33 बताई गई है। जहाँ अनुकूल संचारी भाव स्थायी भाव के विकास में सहयोगी सिद्ध होते हैं वहीं प्रतिकूल संचारी भाव स्थायी भाव के विकास में बाधक भी सिद्ध होते हैं। एक ही स्थायी भाव के बीच-बीच में परिस्थितिवश अनेक भावों का संचार होता रहता है। उदाहरण के लिए प्रेम (स्थायी भाव) के क्षेत्र में प्रिय के मिलन पर 'हर्ष', उसके वियोग पर 'दुःख', उसकी उपेक्षा पर 'क्षोभ', अहित की आशंका पर 'चिंता' आदि भावों की अनुभूति होती है इन्हें संचारी कहा जाता है। (गणपतिचंद्र गुप्त)। स्थायी भावों के साथ उनके अनुकूल संचारी भावों की तालिका नीचे दी जा रही है, इसका अवलोकन करें।

     

    स्थायी भाव             संचारी भाव

    ● रति                 स्मृति, मोह, चिंता, हर्ष, असूया

    ● क्रोध                स्मृति, उग्रता, शंका

    ● उत्साह              आवेग, हर्ष, गर्व

    ● जुगुप्सा              दीनता, निर्वेद, ग्लानि         

    ● हास                 हर्ष, निद्रा, आलस्य, चपलता

    ● शोक                ग्लानि, चिंता, दीनता, मोह, श

    ● विस्मय              स्मृति, हर्ष, आवेग, शंका

    ● भय                  शंका, चिंता, त्रास, ग्लानि

    ● निर्वेद                स्मृति, धृति, हर्ष

    ● वात्सल्य              स्मृति, चिंता, शंका, हर्ष, धृति

     

    रस निष्पत्ति

     

    रस निष्पत्ति की अवधारणा पर भरत मुनि ने अपने रस सिद्धांत में कहा है—विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः

     

    अर्थात विभाव, अनुभाव, संचारी भाव के साथ स्थायी भाव का संयोग होने पर ही रस की निष्पत्ति होती है। रस सूत्र के व्याख्याकारों ने निष्पत्ति और संयोग शब्द के विभिन्न अर्थों को लेकर अपनी-अपनी रस निष्पत्ति की अवधारणाओं को सामने रखा है। इन्हीं अवधारणाओं का अध्ययन आप यहाँ करने जा रहे हैं।

     

    उत्पत्तिवाद

     

    उत्पत्तिवाद या आरोपवाद के जनक भट्टलोल्लट हैं। भरत मुनि के रस सिद्धांत से इन्होंने दो शब्दों को लिया। वे दो शब्द हैं संयोग और निष्पत्ति। यहाँ 'संयोग' का अर्थ है 'मिलना'। 'निष्पत्ति' का व्यवहार इन्होंने तीन अर्थों में किया है। निष्पत्ति के वे तीन अर्थ इस प्रकार हैं—उत्पत्ति, पुष्टि और अभिव्यक्ति। निष्पत्ति के इन तीन आयामों की सफलता में क्रमशः विभाव, संचारी भाव एवं अनुभाव का सहयोग रहता है। रस का संबंध यहाँ विभाव, संचारी भाव और अनुभाव तीनों से है। इस संबंध की व्याख्या करते हुए गणपतिचंद्र गुप्त दही से लस्सी बनाए जाने की प्रक्रिया को सामने रखते हैं। दही, पानी, बर्फ़ और चीनी के मेल से लस्सी बनता है। यहाँ दही विभाव है एवं अन्य तीन संचारी भाव हैं। इस पूरी प्रक्रिया में जो झाग उत्पन्न हुआ वह अनुभाव है। इनसे रस रूप में लस्सी की निष्पत्ति होती है। इनके मध्य पारस्परिक संबंध निम्नवत है—

     

    रस सामग्री और विभाव का संबंध       उत्पाद्य-उत्पादक     लस्सी (रस)

    रस सामग्री और संचारी भाव का संबंध   पोष्य-पोषक        लस्सी (रस)

    रस सामग्री और अनुभाव का संबंध      गम्य-गमक          लस्सी (रस)

     

    इस सिद्धांत का नामकरण उत्पत्तिवाद एकांगी और भ्रमात्मक है क्योंकि यह निष्पत्ति के केवल एक अर्थ (उत्पत्ति) का द्योतक है। जबकि भट्ट लोल्लट के अनुसार निष्पत्ति में उत्पत्ति के साथ पुष्टि और अभिव्यक्ति की भी महत्ता है। मूल भाव और नट (अभिनेता) के बीच रस निष्पत्ति का समीकरण बिठाते हुए भट्टलोल्लट ने कुछ प्रश्न उठाए जो निम्नवत हैं—

     

    निष्कर्षतः इनके अनुसार मूल (स्थायी) भाव मूल पात्रों में ही रहता है। दर्शक अपनी कल्पना शक्ति द्वारा नट के अभिनय में मूल पात्र का आरोपण करके रस की अनुभूति प्राप्त करता है तथा उसका अनुकरण करता है।

     

    अतः रस की अनुभूति के संदर्भ में यह आक्षेप भी ग़लत है कि 'मिथ्या आरोप से रस की निष्पत्ति नहीं होती।' यह तथ्य स्पष्ट है कि मिथ्या आरोप से रस की निष्पत्ति होती है। वास्तविक रूप में घटित अप्रिय घटनाओं से मनुष्य दुःख और क्षोभ से भर जाता है पर वही घटनाएँ जब किसी रंगमंच पर मंचित होती हैं तो मनुष्य आनंद की अनुभूति करता है। रस संप्रदाय को आगे बढ़ाने में भट्टलोल्लट के मौलिक अवदान को विद्वानों ने महत्वपूर्ण बताया है। इनके मौलिक अवदान निम्नवत हैं—

     

    ● सर्वप्रथम इन्होंने रस निष्पत्ति संबंधी विवाद का आरंभ किया।

     

    ● रस के अवयवों में से 'विभाव, अनुभाव और संचारी भाव' का; उनके महत्व के आधार पर क्रम निश्चित किया। रस निष्पत्ति की प्रक्रिया में इनके योगदान को स्पष्ट किया। रस निष्पत्ति की अवधारणा को तीन आयामों (उत्पत्ति, पुष्टि और अभिव्यक्ति) में बाँटकर उसे सरल बनाने की कोशिश की।

     

    ● इन्होंने मूल पात्र, नट और सामाजिक की अनुभूति के सूक्ष्म अंतर को भी रेखांकित किया। रस संप्रदाय के अंतर्गत इनके मत को पूर्ण नहीं माना गया है परंतु इनके अवदानों की महत्ता सराहनीय है।

     

    अनुमितिवाद

     

    भट्ट लोल्लट के उत्पत्तिवाद या आरोपवाद का खंडन करते हुए आचार्य शंकुक (9वीं शताब्दी) ने अनुमितिवाद की स्थापना की। इन्होंने भी भरत मुनि के रस सूत्र से 'निष्पत्ति' और 'संयोग'—इन दो शब्दों को लिया। यहाँ शंकुक ने निष्पत्ति का अर्थ 'अनुमिति' किया तथा संयोग का अर्थ उन्होंने 'अनुमान' माना। इनके सिद्धांत अनुमितिवाद के अनुसार रस के अवयवों के आधार पर रस का अनुमान मात्र ही पाठक, भावक या दर्शक के द्वारा किया जा सकता है। यहाँ स्पष्ट है कि रस का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं किया जा सकता है। रस का अनुमान किया जाता है जिससे रस की अनुमिति होती है, उसकी निष्पत्ति नहीं होती। यहाँ प्रयुक्त 'अनुमान' शब्द का संबंध केवल हिंदी साहित्य से नहीं है। यह शब्द न्यायशास्त्र से लिया गया है। न्यायशास्त्र में ज्ञान प्राप्ति के एक आधार के रूप में अनुमान मान्य है। इसके तीन भेद हैं—पूर्ववत अनुमान, शेषवत अनुमान, सामान्यतोदृष्ट अनुमान। गणपतिचंद्र गुप्त ने अनुमान शब्द के इस व्यापक स्वरूप को स्पष्ट करते हुए लिखा है, जहाँ प्रत्यक्ष कारण को देखकर अप्रत्यक्ष कार्य की कल्पना की जाती है, वह पूर्ववत अनुमान कहा जाता है; जैसे बादलों को देखकर वर्षा का ज्ञान। जब प्रत्यक्ष कार्य को देखकर अप्रत्यक्ष कारण का अनुमान किया जाता है तो इसे शेषवत कहते हैं। जहाँ सामान्य अनुभव के आधार पर अप्रत्यक्ष कारण या कार्य का अनुमान किया जाता है उसे 'सामान्यतोदृष्ट' कहते हैं; जैसे प्रतिवर्ष सावन में वर्षा होती है, अतः सावन के महीने में वर्षा का अनुमान करना। न्यायशास्त्र के अनुसार विभाव पूर्ववत अनुमान है, अनुभाव शेषवत अनुमान है और संचारी सामान्यतोदृष्ट अनुमान है। न्यायशास्त्र के अंतर्गत ज्ञान का अर्थ 'अनुभूति' है और अनुमान का अर्थ 'अनुभव' है। साहित्यशास्त्र में विद्वानों की सम्मति के अनुसार शंकुक की अनुमिति का अर्थ 'अनुभूति' ही लिया गया है। अपने अनुमितिवाद के अंतर्गत शंकुक ने कोई मौलिक स्थापना नहीं दी है। भट्ट लोल्लट की स्थापनाओं को ही न्यायशास्त्र के पारिभाषिक शब्दजाल के आवरण में लपेटकर पुनः प्रस्तुत किया है। शंकुक ने रस की अनुमिति मानी है। रस निष्पत्ति की अपनी व्याख्या को उन्होंने न्यायशास्त्र का आधार प्रदान किया। अभिनेता और दर्शक के संबंध के स्पष्टीकरण के लिए उन्होंने चित्र-तुरंग न्याय का उदाहरण दिया। जिस प्रकार घोड़े का चित्र देखकर उसकी अनुभूति होती है उसी प्रकार नट या अभिनेता के अभिनय से मूल ऐतिहासिक पात्रों की अनुभूति होती है। भट्ट लोल्लट के अनुसार ही शंकुक ने भी माना है कि मूल भाव मूल पात्रों में ही रहते हैं। सामाजिक की रसानुभूति और मूल पात्रों की अनुभूति में अंतर को दोनों ने माना है। शंकुक की देन को रस संप्रदाय में बहुत महत्वपूर्ण नहीं माना गया है।

     

    यहाँ स्पष्ट है कि उत्पत्तिवाद और अनुमितिवाद में क्रमशः रस निष्पत्ति और रस की अनुमिति की व्याख्या अभिनेता की दृष्टि से की गई तथा अभिनेता में भावानुभूति का निषेध माना गया। इन दोनों सिद्धांतों की साम्यता की चर्चा की जा चुकी है। इनकी कमियों की ओर ध्यान खींचते हुए गणपतिचंद्र गुप्त ने उल्लेख किया है कि इन दोनों ही विद्वानों ने इस बात का कोई उत्तर नहीं दिया कि मूल पात्रों के स्थायी भाव की अभिव्यक्ति या अनुमिति से सामाजिक को आनंद की अनुभूति क्यों होती है?

     

    भोगवाद

     

    भरत मुनि के रस सूत्र के प्रथम व्याख्याकार भट्ट लोल्लट एवं द्वितीय व्याख्याकार शंकुक थे। इनके बाद तृतीय व्याख्याकार हुए आचार्य भट्टनायक (10वीं शताब्दी)। इन्होंने रस निष्पत्ति की व्याख्या सामान्य काव्य दृष्टि से की; तभी साधारणीकरण के जन्मदाता होने का गौरव इन्हें प्राप्त हुआ। रस निष्पत्ति संबंधी इनकी अवधारणा को 'भोगवाद' नाम से जाना जाता है। इन्होंने भी भरत मुनि के रस सूत्र से उन्हीं दो शब्दों को लिया संयोग और निष्पत्ति। भोगवाद के अंतर्गत संयोग का अर्थ भोज्य-भोजक संबंध या भावना माना गया तथा निष्पत्ति का अर्थ हुआ 'भक्ति या भोग'। अपनी सामान्य काव्य दृष्टि के आधार पर उन्होंने शब्दात्मक काव्य की तीन क्रियाओं को माना है जो इस प्रकार हैं—अभिधा, भावकत्व (भावना) और भोजकत्व (भोग)। अभिधा से आप सपरिचित हैं। इसका अर्थ है किसी शब्द या वाक्य या वस्तुस्थिति का सामान्य अर्थ ग्रहण करना। इस सामान्य अर्थ ग्रहण की प्रक्रिया एक बौद्धिक प्रक्रिया है जिससे केवल मस्तिष्क प्रभावित होता है। भावकत्व वह भाषिक प्रक्रिया है जिसके तहत कविता साकार हो उठती है, उसकी बिंबात्मकता से उपस्थित शब्द-चित्र सहज ही भावक के हृदय को प्रभावित कर उसकी कल्पना शक्ति को जगा देते हैं। इस भावकत्व का ही दूसरा नाम साधारणीकरण है। सामान्य भाषा में काव्य के विषय को अनुभूत कर लेना ही साधारणीकरण है। 'इसमें भावकत्व की दोहरी प्रक्रिया होती है। वह विषय वस्तु को 'पर' से मुक्त करती है तथा वह पाठक के स्व को विगलित करती है।' पाठक के हृदय और काव्यवस्तु के एकाकार हो जाने की अवस्था ही साधारणीकरण है। यही काव्य से प्राप्त आनंद का स्रोत है। यही रसानुभूति है जिसे आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हृदय की मुक्तावस्था कहा है।

     

    पाठक के हृदय एवं काव्यवस्तु के एकाकार होने से रसानुभूति या आनंद की अनुभूति होती है। इस स्थिति के पीछे तर्क देने के लिए आचार्य भट्टनायक ने भारतीय दर्शन का सहारा लिया या कहें उसे आधारवत ग्रहण किया। भारतीय दर्शन में तीन गुण प्रधान माने गए हैं। वे तीन गुण हैं—सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण। मनुष्य के हृदय में आनंद का वास तभी होता है जब उसमें सत्वगुण का उद्रेक हो। रजोगुण की प्रधानता से मनुष्य अपने-पराए के द्वैत में उलझकर दुःख और उलझनों से घिरा रहता है। काव्य का अध्ययन-मनन या मंचित रूप में उसका दर्शन; मनुष्य मात्र में सत्व गुण की वृद्धि करता है। रजोगुण के मोह-पाश वाली द्वैत बुद्धि से उसे मुक्त करता है। इस मुक्ति से हृदय की संकुचित वृत्ति का नाश होता है। हृदय का विस्तार होता है। विचार का विस्तार होता है। इस मुक्ति की अनुभूति में स्वतः आनंद का उद्रेक हो जाता है। भेद रहित हृदय में ही आनंद का विस्तार होता है। यानी हृदय की मुक्तावस्था ही वास्तविक रसदशा है।

     

    अभिव्यक्तिवाद

     

    अभिनवगुप्त (10वीं-11वीं शताब्दी) ने भट्टनायक की कई मान्यताओं का खंडन करते हुए 'अभिव्यक्तिवाद' की स्थापना की। भट्टनायक ने किसी शास्त्रीय प्रमाण के आधार पर भावकत्व और भोजकत्व की प्रक्रिया को प्रमाणित नहीं किया था इसलिए परवर्ती आचार्य अभिनवगुप्त ने इसे अस्वीकार कर अपने मत की स्थापना की। भरत मुनि के रस सूत्र से 'संयोग' और 'निष्पत्ति' शब्दों को लेकर अभिनवगुप्त ने उनका अर्थ क्रमशः 'व्यंजना' और 'अभिव्यक्ति' रखा। सहृदय रस की अनुभूति तभी कर सकता है जबकि वह व्यंजना शक्ति से पूर्ण हो। अभिव्यक्तिवाद के अनुसार भाव मनुष्य के हृदय में पहले से ही विद्यमान रहते हैं। किसी काव्य को पढ़ने से मात्र उन भावों की अभिव्यक्ति होती है। अर्थात काव्य नए भावों की उत्पत्ति नहीं करता। यह अंतःकरण में अवस्थित भावों की मात्र अभिव्यक्ति करता है साथ ही उसमें उत्तेजना भरने की क्षमता रखता है। स्पष्ट है कि अभिनवगुप्त ने स्थायी भावों की ओर संकेत किया है जो वासना या संस्कार के रूप में मनुष्य के अंतःकरण में पहले से ही उपस्थित हैं। परिस्थिति के अनुकूल होने पर यही स्थायी भाव, विभाव आदि के साथ संयोग करके रस की अनुभूति कराते हैं। इनकी रसानुभूति की विशिष्टता यह है कि इन्होंने भावानुभूती को समष्टिगत माना। वैयक्तिक संसर्ग से ऊपर उठकर इन भावों की पहुँच सब तक है। इनका मत शैव दर्शन पर आधारित है।

     

    परवर्ती विद्वानों ने इनके मत को ही सर्वाधिक माना। अभिनवभारती एवं ध्वन्यालोकलोचन नामक इनकी टीकाएँ रस-संप्रदाय के महत्वपूर्ण ग्रंथों में से हैं। अभिनवभारती नाट्यशास्त्र पर लिखी गई टीका है।
     

     

    साधारणीकरण

     

    'साधारणीकरण' का शाब्दिक अर्थ होता है—संबंध—विशेष का त्याग, व्यक्ति का विलयन, निवैयक्तिकरण, असाधारण को साधारण रूप में प्रस्तुत कर देना। जो वस्तु असाधारण है, विशिष्ट है, उसे साधारण सर्वसामान्य या सार्वजनीक बनाने की प्रक्रिया को 'साधारणीकरण' कहते हैं।

     

    डॉ. शांतिस्वरूप गुप्त के अनुसार साधारणीकरण की प्रक्रिया में सहृदय अपने सामान्य मानवीय हृदय द्वारा काव्य या जीवन के विभावादि को सामान्यीकृत या मानवीय रूप में ग्रहण करता है। इस प्रक्रिया से सहृदय तथा काव्य या नाटक का मूलपात्र दोनों कालगत तथा स्थानगत विशिष्ट उपाधियों को छोड़कर सामान्य रूप धारण कर लेते हैं। साधारणीकरण का व्यापार विशिष्ट भावों की वैयक्तिक अनुभूति को रस-रूप में परिणत करके सामाजिकों को भी उसकी अनुभूति करा देता है। अर्थात् यह क्रिया पाठक, श्रोता, दर्शक, कवि सबके हृदय में घटित होती है।

     

    संस्कृताचार्यों द्वारा साधारणीकरण का स्वरूप

     

    'साधारणीकरण' सिद्धांत का सर्वप्रथम उल्लेख भट्ट नायक के द्वारा हुआ है। यूँ तो 'नाट्यशास्त्र' में भी इसके बीज खोजे जा सकते हैं। डॉ. नगेंद्र ने नाट्यशास्त्र के इस अंश में साधारणीकरण का संकेत इस प्रकार सिद्ध किया है—एभ्यश्च सामान्य गुणयोगेन रसा निष्पद्यन्ते अर्थात् इन भावों को सामान्य रूप से प्रस्तुत करने पर रस की निष्पत्ति होती है। संभव है कि भरत निरूपित सामान्य गुणयोगेन से ही भट्ट नायक ने प्रेरणा ली हो।

     

    इतना होते हुए भी साधारणीकरण के स्वरूप को सर्वप्रथम हमारे सामने प्रस्तुत करने का श्रेय भट्टनायक को ही है। उन्होंने कहा—तस्मात्विभावादि साधारणीकरणात्मना, अभिन्नातो द्वितीयेन अंशेन, भावकत्व व्यापारेण भाव्यमानो रसः अर्थात् 'काव्य और नाटक में अभिन्ना व्यापार के उपरांत भावकत्व व्यापार के द्वारा विभाव, अनुभाव और संचारी भाव का साधारणीकरण हो जाता है। फलतः सामाजिक के अपने समस्त मोह, संकट आदि से जन्य अज्ञान का निवारण हो जाता है, तथा इसके द्वारा रस अभिव्यक्त होता है।'

     

    उपर्युक्त परिभाषा से स्पष्ट होता है कि—

     

    ● विभावादि का साधारणीकरण होता है।

     

    ● साधारणीकरण रस निष्पन्न होने के पूर्व की प्रक्रिया है।

     

    ● भावकत्व और साधारणीकरण क्रियाएँ हैं।

     

    साधारणीकरण क्या है और साधारणीकरण किसका होता है इन दोनों प्रश्नों पर भट्टनायक की स्थापनाएँ आधारित हैं, किंतु अन्य आचार्य इससे सहमत नहीं।

     

    आचार्य अभिनव गुप्त भट्ट नायक के मत को संशोधित करते हुए कहते हैं—

     

    साधारणीकरण द्वारा कवि निर्मित पात्र व्यक्ति-विशेष न रहकर सामान्य प्राणी मात्र बन जाते हैं, अर्थात् वे किसी देश एवं काल की सीमा में बद्ध न रहकर सार्वदेशिक एवं सार्वकालिक बन जाते हैं, और उनके इस स्थिति में उपस्थित हो जाने पर सहृदय भी अपने पूर्वग्रहों से विमुक्त हो जाता है।

     

    अभिनव गुप्त के बाद धनंजय के 'साधारणीकरण' पर विचार किया। उन्होंने साधारणीकरण शब्द का प्रयोग न करके 'परित्यक्त विशेष' शब्द का प्रयोग किया है। उन्होंने रसास्वादन तक पहुँचने के लिए दो सोपान स्वीकार किए।

     

    पहले सोपान पर काव्यगत नायक—राम, दुष्यंत आदि पात्र धीरोदत्त, धीर प्रशांत आदि नायकों की अवस्था के द्योतक होते हैं।

     

    दूसरे सोपान पर काव्यगत पात्र अपने विशेष व्यक्तित्व को—रामत्व, सीतात्व आदि को छोड़कर सामान्य पुरुष और स्त्री मात्र बन जाते हैं और तब सहृदय को रसास्वाद प्रदान करते हैं।

     

    उनके कथन का सार यही है कि काव्य-दर्शन के या पठन-पाठन के समय नायक के प्रति सहृदय का पूर्व-संस्कार-जन्य विशिष्ट भाव-पूज्य, बुद्धि, आदि भाव लुप्त हो जाता है। उसके सम्मुख ऐतिहासिक व्यक्ति के स्थान पर केवल कवि-निर्मित पात्र रह जाता है।

     

    कवि निर्मित पात्र के प्रति भी पूर्व-परिस्थिति के कारण पूजाति का भाव बना रहता है, इस ओर धनंजय ने नहीं सोचा।

     

    धनंजय के बाद साहित्य दर्पणकार विश्वनाथ ने साधारणीकरण पर विचार किया। उन्होंने साधारणीकरण की अपेक्षा तादात्मीकरण शब्द का प्रयोग किया है। उनके अनुसार विभावादि (विभाव, अनुभाव, संचारी भाव) के व्यापार का नाम साधारणीकरण है। काव्यगत आश्रय के साथ सहृदय सामाजिक का तादात्म्य हो जाता है, इसी से उसके विभावादि तथा भाव सहृदय की भी समान अनुभूति का विषय बन जाते हैं।

     

    विश्वनाथ के उपरांत पंडितराज जगन्नाथ भी आश्रय के साथ प्रमाता के तादात्म्य और सहानुभूति की बात कहते हैं। कवि की कल्पना से सामाजिक की सहदयता प्रबुद्ध हो जाती है और वह आश्रय के साथ तादात्म्य का अनुभव करता हुआ समानाभाव को अनुभूति करता है।

     

    इस प्रकार उपर्युक्त संस्कृताचायों की साधारणीकरण संबधी व्याख्याओं के निष्कर्ष से यह तथ्य प्राप्त होता है कि विभावादि पर आधारित किसी विशेष समय क्रिया कलाप का साधारण रूप ग्रहण कर लेना ही साधारणीकरण है।

     

    आधुनिक विद्वानों के मत

     

    हिंदी के आधुनिक विद्वानों ने भी साधारणीकरण सिद्धांत की व्याख्या प्रस्तुत की हैं जिनमें डॉ. श्यामसुंदरदास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल तथा डॉ. नगेंद्र का मत यहाँ उल्लेखनीय है।

     

    डॉ. श्यामसुंदरदास ने भावक या पाठक का साधारणीकरण माना है। उनके अनुसार साधारणीकरण की स्थिति योग की मधुमती भूमिका के समान होती है जिसमें हमारा मस्तिष्क तर्क-वितर्क से शून्य होकर आनंदानुभूति में लीन हो जाता है। उनके शब्दों में—मधुमती भूमिका चित्त की वह विशेष अवस्था है जिसमें वितर्क की सत्ता नहीं रह जाती। शब्द, अर्थ और ज्ञान इन तीनों की पृथक् प्रतीति वितर्क है। दूसरे शब्दों में वस्तु, वस्तु का संबंध और वस्तु के संबंधी इन तीनों का भेद अनुभव करना ही वितर्क है।

     

    वस्तुतः साधारणीकरण की अवस्था को मधुमती भूमिका के समान बताना जँचता नहीं।

     

    'साधारणीकरण' सिद्धांत की व्याख्या करने वालों में आचार्य शुक्ल एवं डॉ. नगेंद्र के नाम ही विशेषतः उल्लेखनीय हैं।

     

    आचार्य शुक्ल ने 'चिंतामणि' (भाग-1) के अंतर्गत साधारणीकरण का स्वरूप इस प्रकार प्रस्तुत किया है—

     

    ● 'साधारणीकरण' का अभिप्राय यह है कि पाठक या श्रोता के मन में जो व्यक्ति-विशेष या वस्तु-विशेष आती है वह जैसे काव्य में वर्णित 'आश्रय' के भाव का आलंबन होता है वैसे ही सब सहृदय पाठकों या श्रोताओं के भाव का आलंबन हो जाती है।

     

    ● रस की एक निजी अवस्था और है। श्रोता या दर्शक उसी भाव का अनुभव नहीं करता जिसकी व्यंजना पात्र (आश्रय) अपने आलंबन के प्रति करता है, बल्कि व्यंजना करने वाले उस पात्र (आश्रय) के प्रति किसी और ही भाव का अनुभव करता है। यह दशा भी एक प्रकार की रस दशा ही है—यद्यपि इसमें आश्रय के साथ तादात्म्य और उसके आलंबन का साधारणीकरण नहीं रहता। इस रसात्मकता को हम मध्यम कोटि की ही मानेंगे।

     

    ● जहाँ पाठक या दर्शक आश्रय के शील द्रष्टा के रूप में स्थित होता है, वहाँ उस पात्र का आलंबन पाठक या दर्शक का आलंबन नहीं होता, बल्कि वह पात्र (आश्रय) ही पाठक या दर्शक के किस भाव का आलंबन रहता है। इस दशा में भी एक प्रकार तादात्म्य और साधारणीकरण होता है। तादात्म्य कवि के उस अव्यक्त पाव के साथ होता है, जिसके अनुरूप वह पात्र का स्वरूप संघटित करता है।

     

    उपर्युक्त विवेचन के निष्कर्ष में दो मान्यताएँ स्पष्ट होती हैं—

     

    1. साधारणीकरण आलंबन या आलंबनत्व धर्म का होता है।

     

    2. सहृदय का आश्रय के साथ तादात्म्य होता है।

     

    और इन दोनों का नाम ही साधारणीकरण है। एक स्थिति ऐसी भी आती है, जब सहृदय का आश्रय के साथ तादात्म्य नहीं हो पाता है। और न ही आलंबन का साधारणीकरण हो पाता है।

     

    आलंबन धर्म के साधारणीकरण की बात तो शुक्ल जी ने स्पष्ट कहीं है, किंतु आश्रय धर्म के साधारणीकरण का स्पष्ट उल्लेख उन्होंने कहीं नहीं किया है। केवल आश्रय के साथ तादात्म्य की बात कही है।

     

    डॉ. नगेंद्र ने आचार्य शुक्ल द्वारा रसात्मकता की मध्यम कोटि स्वीकार करने का खंडन किया है। उनकी मान्यता है—साधारणीकरण न तो आश्रय का होता है न आलंबन का, अपितु कवि की अनुभूति का होता है। ऐसी स्थिति स्वीकार कर लेने पर हमारी रसानुभूति लेखक या कवि की अनुभूति से तादात्म्य स्थापित करती है।

     

    डॉ. नगेंद्र के शब्दों में—जिसे हम आलंबन कहते हैं वह वास्तव में कवि की अपनी अनुभूति का संवेद्य रूप है। उसके साधारणीकरण का अर्थ है कवि की अनुभूति का साधारणीकरण।

     

    साधारणीकरण के संबंध में उनकी यह व्याख्या भी ध्यानाकर्षि है—कवि वही होता है जो अपनी अनुभूति का साधारणीकरण कर सकता है। अपनी अनुभूति को व्यक्त कर लेना अलग बात है, इसका साधारणीकरण कर लेना अलग बात। सभी व्यक्ति उसे यत्किंचित् व्यक्त तो कर लेते हैं, परंतु इसका साधारणीकरण करने की शक्ति कवि में होती है।

     

    निष्कर्षतः साधारणीकरण कवि की अनुभूति का होता है। अपनी अनुभूति का साधारणीकरण कर सकने में समर्थ व्यक्ति ही कवि हैं।

     

    आचार्य शुक्ल एवं डॉ. नगेंद्र की मान्यताओं में वैषम्य इस प्रकार है—आचार्य शुक्ल जिस आलंबन का साधारणीकरण मानते हैं, डॉ. नगेंद्र के अनुसार वह वस्तुतः कवि की अनुभूति का संवेद्य रूप है। आ. शुक्ल ने सहृदय का आश्रय के साथ तादाम्य स्वीकार किया था जबकि डॉ. नगेंद्र ने रसात्मकता की मध्यम कोटि स्वीकार की थी, जबकि डॉ. नगेंद्र को यह कोटि स्वीकार नहीं है।

     

    डॉ. नगेंद्र के मतानुसार कवि की अनुभूतियों का ही साधारणीकरण होता है, किंतु साथ ही यह प्रश्न उठता है कि अनुभूतियाँ सभी सहृदयों की अनुभूतियाँ कैसे बन जाती हैं? कैसे सभी सामाजिकों के हृदय में समानानुभूति है? इसकी स्पष्टता के लिए आश्रय के साथ साधारणीकरण की बात कही जाती है। आश्रय का साधारणीकरण समस्त प्रक्रिया का अनिवार्य अंग है किंतु आश्रय के साथ साधारणीकरण और प्रभाता के साथ आश्रय के तादात्म्य में अंतर है। डॉ. नगेंद्र के शब्दों में आश्रय के साथ तादात्म्य की स्वतंत्र या प्रमुख स्थिति अग्राह्य है, साधारणीकरण की संपूर्ण प्रक्रिया के साथ अंग रूप में ही तादात्म्य मान्य हो सकता है।

     

    साधारणीकरण किसका होता है इस संबंध में केशवप्रसाद मिश्र तथा डॉ. कृष्णदेव झारी के मत ध्यातत्व हैं—

     

    केशवप्रसाद मिश्र ने सहृदय की चेतना का साधारणीकरण माना है। उनके अनुसार चित्र के एकतानता और साधारणीकृत हो जाने के बाद प्रमाता को सभी कुछ साधारण प्रतीत होने लगता है।

     

    यह मान्यता भी स्वीकृत नहीं, चूँकि चित्त की एकतानता ही तो रस है अतः वह साधारणीकरण का कारण नहीं हो सकती। वह तो कार्य या परिणति है, जबकि साधारणीकरण कार्य नहीं, कारण है।

     

    डॉ. कृष्णदेव झारी का कहना है कि आलंबन धर्म का साधारणीकरण या रस के समस्त अवयवों का साधारणीकरण अथवा कवि भावना का साधारणीकरण भिन्न बाते नहीं हैं। वस्तुतः किसी वस्तु या विषय को आलंबन या विभाव कहने से अभिप्राय है कि कवि द्वारा अनुभूति भाव का आलंबन या विभाव। उनके अनुसार कवि भावना या रस-सामग्री अलग होती हैं? डॉ. झारी आगे कहते हैं—जब रस के अवयव विभावादि भी अंतश्चेतना से ही उद्‌बुद्ध होते हैं और वे ही रसानुभूति या काव्यानुभूति या कवि-अनुभूति अथवा रस अभिव्यक्ति का माध्यम होते हैं, तो उनका साधारणीकरण और कवि अनुभूति का साधारणीकरण दो भिन्न बातें कैसे कही जा सकती हैं?

     

    अंततः हम कह सकते हैं कि साधारणीकरण के संबंध में विभिन्न विद्वानों के विभिन्न मत हैं। भट्ट नायक ने सर्वांग का साधारणीकरण माना है, अर्थात् सभी प्रसंग विशिष्ट देशकालबद्ध घटना न रहकर साधारणीकृत होते हैं। शुक्ल जी आलंबन या आलंबन धर्म का साधारणीकरण होता है, कहते हैं, जबकि डॉ. नगेंद्र काव्य की अनुभूति का साधारणीकरण मानते हैं।

     

    डॉ. नगेंद्र कवि की अनुभूति का साधारणीकरण मानते हुए कहते हैं—साधारणीकरण कवि की अपनी अनुभूति का होता है अर्थात् जब कोई व्यक्ति अपनी अनुभूति की इस प्रकार अभिव्यक्तित्व कर सकता है कि वह सभी के सहृदयों में समान अनुभूति जगा सके तो पारिभाषिक शब्दावली में हम कहते हैं कि उसमें साधारणीकरण की शक्ति वर्तमान है।

     

    निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि साधारणीकरण रसास्वाद में भूमिका का कार्य करता हैं इसके द्वारा सहृदय पूर्वग्रहों से मुक्त हो जाता है। असाधारण को साधारण रूप में प्रस्तुत करना साधारणीकरण है। साधारणीकरण विभावादि के सम्मिश्रित क्रिया-कलाप कर होता है।

     

    सहृदय की अवधारणा—आचार्य मम्मट के अनुसार काव्य की अनुभूति का विषय बड़ा ही जटिल होता है। रसास्वादन में रसत्व की भावना के कारण बाधा पड़ती है। काव्यगत अर्थों का सामान्यत्व से प्रतीति होना रसास्वादन के लिए आवश्यक है। काव्यास्वादन के समय पाठक के हृदय में वासना रूप संस्कार उद्बुद्ध होते हैं। ये संस्कार उसके हृदय में पहले से ही स्थिर होते हैं। काव्य-पाठन के समय वे उदित होते हैं तब स्वयं बद्ध अवस्था में ही उनके चैतन्य होने की संभावना रहती है और रसास्वादन के समय यह अपेक्षित है कि वे चैतन्य तो हो, पर स्वयं बद्ध न रहे।

     

    रस विवेचन के क्रम में एक बात ध्यान में रखनी चाहिए। विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी, स्थायी इत्यादि भावों का जो विवेचन किया जाता है वह सदैव अपोद्वार बुद्धि से किया जाता है वह सदैव अपोद्वार बुद्धि से किया जाता है। वस्तुतः रसास्वाद रसिक की अखंड घन प्रतीति है—यह प्रतीति खंडशः नहीं होती। 'ये विभाव, ये अनुभाव, ये संचारी...इस प्रकार अनुभूति खंडशः न होकर अखंड अनुभूति होती है। विभावादि की रस निरपेक्ष रूप में सत्ता नहीं होती।

     

    रसिक में नाट्य गत अर्थों का सामान्यत्व से ग्रहण, प्रतीति विश्रंरति, अनुमानपटुता इत्यादि विषयों का होना अनिवार्य है। नाट्यगत अर्थों का रसिक यदि सामान्यत्व से ग्रहण न कर सका तो नाट्य में व्यक्ति विशिष्ट के संबंधों की प्रतीति की संभावना उत्पन्न होती है इसे रस विघ्न होता है। काव्य में कवि द्वारा जो प्रतीति अभिव्यक्ति की जा रही है उसमें रसिक हृदय की विश्रांति होनी चाहिए। अनुमान पटुता के अभाव में पाठक को अर्थ का कौंध जाना नहीं होगा। रस के भाव के लिए उसका असंलक्ष्य क्रम होना आवश्यक है। रसिक को होने वाला यह अर्थ का कौंध जाना उतना ही सजीव होता है जितना कि स्वयं रसिक। इसलिए सहृदय की अवधारणा स्पष्ट करते हुए अभिनव गुप्त ने कहा—'अधिकारी चात्र विमल प्रतिभाशाली सहृदय।'

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