इकाई-4 (शब्द-शक्ति, अलंकार, छंद)
ikai 4 (shabd shakti, alankar, chhand)
नरोत्तमदास स्वामी
Narotamdas swami
इकाई-4 (शब्द-शक्ति, अलंकार, छंद)
ikai 4 (shabd shakti, alankar, chhand)
Narotamdas swami
नरोत्तमदास स्वामी
और अधिकनरोत्तमदास स्वामी
शब्द-शक्ति
शब्दशक्ति की परिभाषा : जिस शक्ति या व्यापार द्वारा शब्द के अर्थ का बोध होता हो, वह शब्दशक्ति कहलाती है।
'शब्दशक्ति' में दो शब्द हैं— 'शब्द' + 'शक्ति' शब्द की शक्ति उसकी अर्थवत्ता ही होती है, अतः शब्दशक्ति द्वारा शब्द के अर्थ को प्राप्त या उपलब्ध किया जाता है। 'शब्द' में दो बातें होती हैं :-
1. वह अक्षरों (वर्णों) का समूह होता है। जैसे—'कमल' शब्द क + म + ल का समूल है। 2. उसमें कोई अर्थ निहित होता है। जैसे— 'कमल' का अर्थ सरोवर में पैदा होने वाला कमनीय फूल।
'शब्द' की सार्थकता के कारण उसकी महत्ता महान होती है और शब्द से वाक्य बनता है और वाक्य ही 'भाषा' का मूलाधार होता है और यह 'भाषा' काव्य का आधार बनती है। इस प्रकार काव्य के लिए 'शब्द' अत्यंत महत्वपूर्ण है और उसकी शक्ति का बोध कराने वाली शब्द शक्ति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
शब्द के प्रकार : शब्द के तीन प्रकार होते हैं :-
1. वाचक-जो वाच्यार्थ को प्रकट करे।
2. लक्षण-जो लक्ष्यार्थ को प्रकट करे।
3. व्यंजक-जो व्यंग्यार्थ को प्रकट करे।
अर्थ के प्रकार : शब्द में अर्थ निहित होता है, अतः अर्थ के प्रकार समझना आवश्यक होता है। अर्थ के तीन प्रकार होते हैं :-
1. वाच्यार्थ : शब्द का लोक-प्रसिद्ध अर्थ वाच्यार्थ कहलाता है। इसे अभिधेयाथ और मुख्याथ भी कहते हैं। उदाहरणार्थ—'कमल खिल गया है।'
यहाँ तालाब में खिलने वाले विशेष पुष्प 'कमल' का अर्थ लिया जाएगा।
2. लक्ष्यार्थ : जब प्रसंग में वाच्यार्थ नहीं लगता तब उससे संबंध राखने वाला एक दूसरा अर्थ लगाया जाता है। इस दूसरे अर्थ को लक्ष्यार्थ कहते हैं।
जैसे—'सीता कमलमुखी हैं।'
यहाँ 'कमल' का केवल 'पुष्प' वाला अर्थ अभीष्ट नहीं वरन् 'कमल' के समान सुंदर मुख अर्थ लिया जाएगा। 'कमल' और 'मुख में सुंदरता का गुण समान है—'सुंदर' लक्ष्यार्थ होगा।
3. व्यंग्यार्थ : कभी-कभी वाच्यार्थ (या लक्ष्यार्थ) के लग जाने पर भी एक दूसरा अर्थ सूचित होता है। यह अर्थ व्यंग्यार्थ कहा जाता है। इसको ध्वनि भी कहते हैं।
जैसे—
(दो विद्यार्थी प्रतिदिन संध्या होते ही घूमने जाया करते हैं। उनमें से एक अपने साथी से कहता है—)
'संध्या हो गई।'
इस वाक्य का मुख्यार्थ है—सूर्यास्त होने का समय हो गया। यहाँ यह अर्थ तो है ही पर एक अर्थ और निकलता है कि घूमने को चलने का समय हो गया, घूमने चलो। यह दूसरा अर्थ व्यंग्यार्थ होगा।
शब्दशक्ति के भेद (प्रकार)
शब्द का अर्थ प्रकट करने की शक्ति को शब्द-शक्ति कहते हैं। इसके तीन भेद (प्रकार) हैं। ये भेद (प्रकार) निम्नवत् हैं :
(1) अभिधा - शब्द की वह शक्ति जिसमें वाच्यार्थ प्रकट होता है।
(2) लक्षणा - शब्द की वह शक्ति जिससे लक्ष्यार्थ प्रकट होता है।
(3) व्यंजना - शब्द की वह शक्ति जिससे व्यंग्यार्थ प्रकट होता है।
(1) अभिधा
शब्द का वाच्यार्थ का बोध कराने वाली अभिधा कहलाती है।
वाचक शब्द के प्रकार
1. रूढ़ : वह शब्द जिसकी व्युत्पत्ति नहीं होती, और यदि होती है तो शब्द का अर्थ व्युत्पत्ति जन्य अर्थ से भिन्न होता है। जैसे— घोड़ा, घड़ा, मुँह, ठंडा, गाय, जल, मंडप आदि।
2. यौगिक : वह शब्द जिसकी व्युत्पत्ति होती है और जिसका अर्थ व्युत्पत्ति जन्य अर्थ से भिन्न नहीं होता। जैसे— भलाई, पानी-घर, दो-मुँहा, शारीरिक सुंदरता, बुढ़ापा, अन्न-जल।
3. योगरूढ़ : वह शब्द जिसकी व्युत्पत्ति होती है पर जिसका अर्थ व्युत्पत्ति-जन्य अनेक अर्थों में से केवल एक तक ही सीमित हो जाता है। जैसे—पंकज का अर्थ एक कीचड़) से 'ज' (जन्मा, उत्पन्न) 'कमल'। ध्यान देने योग्य बात यह है कि कीचड़ से तो सिंघाड़ा, घोंघे भी उत्पन्न होते हैं किंतु मात्र 'कमल' के लिए ही यह पंकज रूढ़ हो गया है। इसी प्रकार 'नीरज' (कमल), 'नीरद' (मेघ), 'गिरिधर' (कृष्ण), 'महेश' (शंकर) आदि शब्द योगरूढ़ के उदाहरण हैं।
'पंकज' का व्युत्पत्ति-जन्य अर्थ है—पंक से उत्पन्न होने वाला, पर पंक से उत्पन्न लेने वाले प्रत्येक पदार्थ 'सिंघाड़ा' आदि को पंकज नहीं कहते, केवल कमल को पंकज कहते हैं। इस प्रकार पंकज शब्द कमल के अर्थ में रूढ़ हो गया है।
वाच्यार्थ के भेद : वाच्यार्थ के दो भेद हैं :
1. अवयवार्थ - वह अर्थ जो शब्द के अवयवों का अर्थ हो अर्थात् जी व्युत्पत्ति पर निर्भर रहता हो।
2. समुदायार्थ - वह अर्थ जो शब्द के अवयवों का अर्थ न हो, सामूहिक रूप से सारे शब्द का अर्थ हो।
रूढ़ शब्द का केवल समुदायार्थ होता है, यौगिक का केवल अवयवार्थ होता है और योगरूढ़ शब्द में अवयवार्थ और समुदायार्थ दोनों होते हैं।
(2) लक्षणा
मुख्यार्थ (वाच्यार्थ) में बाधा आने पर जब शब्द से गुण, क्रिया आदि के आधार पर अन्य अर्थ ग्रहण किया जाए, तब लक्षणा होती है।
लक्षणा के भेद
लक्षणा के मुख्यतः दो प्रकार होते हैं—1. उपादान-लक्षणा, 2. लक्षण-लक्षणा।
1. उपादान-लक्षणा
जब लक्ष्यार्थ में वाच्यार्थ सम्मिलित रहता है अर्थात् जब वाच्यार्थ सर्वथा परित्यक्त नहीं होता। इसे अजहत्स्वार्था (अपने वाच्यार्थ को न छोड़ने वाली) लक्षणा भी कहते हैं। जैसे—
(1) हाथ-पैर बचाते हुए काम करो।
यहाँ हाथ-पैर का अर्थ 'शरीर के अंग' होगा। शरीर के अंगों में हाथ-पैर भी सम्मिलित हैं।
(2) दो बंदूक़ों ने सारे गाँव को लूट लिया।
यहाँ बंदूक़ों का अर्थ बंदूक़ धारी मनुष्यों से है। बंदूक़ धारी मनुष्यों में बंदूक़ें भी सम्मिलित हैं।
2. लक्षण— लक्षणा
जब लक्ष्यार्थ में वाच्यार्थ सम्मिलित नहीं होता अर्थात् जब वाच्यार्थ सर्वया परित्यक्त हो जाता है। इसे जहत्स्वार्धा (अपने वाव्यार्थ को छोड़ देने वाली) लक्षणा भी कहते हैं। जैसे—
(1) यह बालक सिंह है।
यहाँ सिंह का अर्थ 'वीर' होगा।
(2) राजस्थान जाग उठा।
यहाँ राजस्थान का अर्थ 'राजस्थान के निवासी' होगा।
(3) दोनों घरों में लड़ाई है।
यहाँ घरों का अर्थ 'घरवालों' होगा।
(4) मानस पढ़ो।
यहाँ मानस का अर्थ 'मन या सरोवर' नहीं होगा किंतु राम के चरित्र का वर्णन करने वाला 'ग्रंथ' होगा।
(5) 'कोकिल कंठी' गा रही है।
यहाँ 'कोकिल कंठी' का अर्थ 'कोयल के समान मीठे स्वर वाली बालिका' है।
लक्षणा के अन्य उदाहरण
1. पंजाब वीर है। (पंजाब की जनता)
2. सुरेश गधा है। (गधे के समान मूर्ख)
3. सारा गाँव भूखों पर रहा है। (सारे ग्रामवासी)
4. मेरा घर गंगा नदी पर है। (गंगा नदी के तट पर)
5. दूध जीवन है। (जीवन देने वाला)
6. राममूर्ति इस युग के भीम हैं। (भीम के समान बलवान)
7. रे! दो दिन का यौवन। (थोड़े दिनों का, क्षणस्थायी)
8. चारु चंद्र की चंचल किरणें खेल रही हैं जल-थल में। (कांति फैला रहीं)
9. इस खंडहर में बिजली सी उन्मत्त जवानी दौड़ी होगी। (खंडहर = बूढ़ा शरीर)
10. हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में। (वीरता में अति श्रेष्ठ)
11. खुले पलक, फैली सुवर्ण-छवि
जगी सुरभि, डोले मधु-बाल। (सुंदर रंगों के पुष्प, व्याप्त हुई)
(3) व्यंजना
अब वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थ से भी शब्द के अर्थ का बोध न हो, तब उसका गोध कराने वाली तीसरी शक्ति व्यंजना कहलाती है।
'व्यंजना' का अर्थ है—छिपे हुए अर्थ का बोध कराने वाली शक्ति। काव्य में निहित या छिपे हुए अर्थ को व्यंजना शक्ति के द्वारा ही जाना जा सकता है। जिस प्रकार के हुए आम की पीताभा (पीले रंग की चमक) उसमें छिपी मिठास को व्यजित कर देती है, उसी प्रकार काव्य में प्रयुक्त शब्द का व्यायार्थ सहदयों को स्पष्ट हो जाता है।
व्यंजना के भेद (प्रकार) : व्यंजना के मुख्यतः दो भेद (प्रकार) हैं :
1. शाब्दी व्यंजना
2. आर्थी व्यंजना
1. शाब्दी व्यंजना
जब व्यंजना शब्द में हो। व्यंजना शब्द में है यह तब कहा जाता है जब उस शब्द को बदल देने से व्यंग्यार्थ नष्ट हो जाए। उदाहरण से स्पष्ट हो जाएगा :
'चिरजीवो जोरी जुरै, क्यों न सनेह गँभीर।
को घटि? ए वृषभानुजा, वे हलधर के बीर॥'
राधा-कृष्ण की यह जोड़ी चिरंजीवी हो। परस्पर गहरा प्रेम क्यों नहीं जुड़े? दोनों में कौन घटकर है? ये वृषभानुजा हैं तो वे हलधर के भाई।
यह वाच्यार्थ है पर 'वृषभानुजा' और 'हलधर' शब्दों के अनेकार्थक होने के कारण एक दूसरा अर्थ भी ध्वनित होता है—
ये वृषभ की अनुजा (बैल की छोटी बहिन) हैं तो वे हलधर (बैल) के भाई हैं। यह विनोदात्मक दूसरा अर्थ व्यंग्यार्थ है।
यहाँ शाब्दी व्यंजना है क्योंकि 'वृषभानुजा' और 'हलधर' के स्थान पर 'वृषभानु-सुता' और 'बलराम' शब्द रख दिए जाएँ तो उक्त व्यंग्यार्थ नष्ट हो जाएगा। शाब्दी व्यंजना में शब्द दो अर्थो वाला होता है—एक अर्थ वाच्यार्थ होता है, दूसरा व्यंग्यार्थ।
2. आर्थी व्यंजना
जब व्यंजना अर्थ में हो अर्थात् जब शब्द के बदल देने पर भी व्यंग्यार्थ निकलता रहे। जैसे—
(1) संध्या हो गई।
यहाँ वाच्यार्थ है— सूर्यास्त का समय हो गया किंतु यहाँ पर।
व्यंग्यार्थ होगा— घूमने को चलने का समय हो गया या घर चलने का समय हो गया।
(2) अध्यापक ने ऐसा पढ़ाया कि लड़का 'सर्वथा सुधर' गया।
यहाँ वाच्यार्थ होगा— लड़का सर्वथा सुधर गया।
लक्ष्यार्थ होगा— लड़का सर्वथा बिगड़ गया।
व्यंग्यार्थ होगा— अध्यापक सर्वथा अयोग्य है।
(3) रजनीगंधा खिल गई।
यहाँ वाच्यार्थ होगा— रजनीगंधा के पौधे में फूल खिल गए।
व्यंग्यार्थ होगा— आधी रात हो गई (क्योंकि रजनीगंधा आधी रात को पूर्ण खिलती है।)
दूसरा व्यंग्यार्थ होगा— भाग निकलने का समय हो गया।
नोट— व्यंग्यार्थ का ज्ञान प्रसंग से ही होता है। प्रथम उदाहरण के प्रसंगानुसार अनेक अर्थ हो सकते हैं। जैसे—
घूमने को जाने का समय हो गया।
संध्या वंदन करने का समय हो गया।
घर चलने का समय हो गया।
पाठ बंद करने का समय हो गया।
सिनेमा चलने का समय हो गया। इत्यादि
लक्ष्यार्थ और व्यंग्यार्थ में अंतर
मुख्यार्थ (वाच्यार्थ) के न लग पाने पर जो दूसरा अर्थ लगाया जाता है, वह लक्ष्यार्थ होता है।
वाच्यार्थ के लग जाने पर, और यदि वाच्यार्थ न लगे तो लक्ष्यार्थ के लग जाने पर (अर्थात् वाच्यार्थ या लक्ष्यार्थ में से एक के लग जाने पर), जो दूसरा अर्थ निकलता है वह व्यंग्यार्थ होता है।
लक्षणा और व्यंजना में अंतर
मुख्यार्थ (वाच्यार्थ) के न लगने पर शब्द की जिस शक्ति से दूसरा अर्थ लगाया जाता है, वह लक्षणा शक्ति होती है।
वाच्यार्थ या लक्ष्यार्थ लग जाने के बाद जिस शक्ति द्वारा एक और अर्थ निकलता है, वह व्यंजना होती है।
अलंकार
अलंकार का अर्थ : 'अलंकार' शब्द का वाच्यार्थ है—'आभूषण' और 'आभूषण' का अर्थ है—भूषित करने वाले या शोभा बढ़ाने वाले। सामान्य बोलबाल की भाषा में आभूषण को गहने भी कहा जाता है। आभूषण या गहने पहनने से तन (शरीर) की शोभा में वृद्धि होती है, अतः 'अलंकार' या 'आभूषण' शोभाकारक उपादान ही कहलाएँगे। कह सकते हैं, जिस प्रकार आभूषण धारण करने से तन की शोभा बढ़ती है, उसी प्रकार काव्य में अलंकारों के प्रयोग से उसमें शोभा की वृद्धि होती है।
अलंकार की परिभाषा : 'अलंकार' की विद्वानों ने अनेकशः परिभाषाएँ दी है। यथा
अलंकरोति इति अलंकार :।
अर्थात् आभूषित करने वाले (शोभा बढ़ाने वाले) उपादान हो अलंकार कहलाते
वक्राभिधेवशब्दोक्तिरिष्टावाचामलकृतिः। —भामह
अर्थात्, शब्द और अर्थ की विचित्रता (वैशिष्ट्य) ही अलंकार है।
काव्यशोभाकरान् धर्मानलंकारान् प्रचक्षते। —दण्डी
अर्थात, काव्य को शोभा प्रदान करने वाले धर्म (तत्व) ही अलंकार हैं।
अभिधानप्रकार विशेषा एवं चालंकाराः। —रुद्रट
अर्थात्, कथन (अभिव्यक्ति) के विशिष्ट प्रकार ही अलंकार हैं।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अलंकार की परिभाषा इस प्रकार दी है—अलंकार हैं क्या? वर्णन करने की अनेक प्रकार की चमत्कारपूर्ण शैलियाँ।
आगे अपनी बात को स्पष्ट करते हुए आचार्य शुक्ल का कहना है—वस्तु या व्यापार की भावना चटकीली करने और भाव को अधिक उत्कर्ष पर पहुँचाने के लिए कभी किसी वस्तु का आकार या गुण बहुत बढ़ाकर दिखाना पड़ता है। कभी उसके रूप-रंग या गुण की भावना को उसी प्रकार के और रंग-रूप मिलाकर तीव्र करने के लिए समान रूप और धर्म वाली अन्य वस्तुओं को रखना पड़ता है। कभी-कभी बात को घुमा-फिराकार कहना पड़ता है। इस तरह के भिन्न-भिन्न विधान और कथन के ढंग अलंकार कहलाते हैं। स्पष्ट है, अलंकार कथन या अभिव्यक्ति की विशिष्ट विधि या प्रणाली है। मोटे तौर पर हम इसे ये भी समझ सकते हैं कि किसी भी कथन को चारूता प्रदान करने वाले, या उसे आकर्षक अथवा विशिष्ट बनाने वाले उपादान ही अलंकार कहलाते हैं। प्रो. विश्वम्भर 'अरुण' के शब्दों में अलंकार की परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है—
अलंकार कथन की वह विशिष्ट प्रणाली है जो कथन को अन्य सामान्य कथन से पृथक कर ऐसी चारूता और आकर्षण प्रदान करता है कि वह काव्य की संज्ञा से अभिहित हो जाता है।
अलंकार के लक्षण
1. काव्य में शोभा लाने वाले या उसे सौंदर्य प्रदान करने वाले तत्व अलंकार कहलाते हैं।
2. काव्य को अधिक आकर्षक और प्रभावशाली बनाने वाले साधनों को अलंकार कहते हैं।
3. कथन या अभिव्यक्ति को अधिक विशिष्ट बनाने वाले साधनों को अलंकार कहते हैं।
4. अभिव्यक्ति में असाधारणता लाने वाले प्रकारों को अलंकार कहते हैं।
5. उक्ति (कथन) वैचित्र्य लाने वाले विधान को अलंकार कहते हैं।
काव्य में अलंकार का स्थान
अलंकार काव्य के लिए अत्यंत उपादेय हैं। अलंकारों की सहायता से ही सामान्य कथन भी काव्य की संज्ञा प्राप्त कर पाने में समर्थ हो पाता है। अलंकार काव्य रूपी तन के वस्त्राभूषण हैं, अर्थात् जिस प्रकार मानव शरीर की शोभा और सार्थकता उसके द्वारा वस्त्राभूषण धारण करने से ही होती है, उसी प्रकार अलंकारों के प्रयोग के बाद ही कोई कथन काव्यत्व के महत्व को पाने में समर्थ हो पाता है।
अलंकारों के प्रयोग से काव्य में आकर्षण और चारूता आती है।
अलंकारों के प्रयोग से काव्य अधिक प्रभावपूर्ण होता है।
अलंकारों के प्रयोग से अभिव्यक्ति में अधिक स्पष्टता और सुबोधता आती है।
अलंकार जहाँ एक ओर शब्द की शक्ति को सामर्थ्य प्रदान करते हैं, वहीं दूसरी ओर उसकी अर्थवत्ता को अधिक ऊर्जावन बनाकर काव्य के प्रभाव में वृद्धि करते हैं।
अलंकारों के प्रयोग से भाषा में शाब्दिक प्रयोग में चमत्कार और चारूत्व का समावेश होता है।
अलंकार के भेद (प्रकार)
काव्य के पठन-पाठन या श्रवण से जो आनंद प्राप्त होता है, उसमें भाषा का बड़ा महत्व होता है। भाषा शब्दमय स्वरूप का ही दूसरा नाम है। शब्द के दो रूप होते हैं—एक, उसका अक्षरात्मक रूप; और दूसरा, उसका अर्थमय रूप।
अक्षरात्मक शब्द के रूप के आधार पर अलंकार का पहला प्रकार (भेद) होता है—शब्दालंकार
और, शब्द में निहित अर्थ का आधार बनाकार उसका दूसरा भेद (प्रकार) होता है—अर्थालंकार
शब्द और अर्थ के मिले-जुले आधार को लेकार कतिपय अचार्य अलंकारों के तीसरे भेद उभयालंकार को भी मानते हैं। किंतु प्रमुखतः शब्दालंकार और अर्थालंकार—ये दो भेद ही होते हैं।
(1) शब्दालंकार—जब शब्दों के प्रयोग में कवि ऐसे कौशल का प्रयोग करे जिससे चारूता या चमत्कार आए, तब शब्दालंकार माना जाता है।
अन्य उदाहरण-
1. भगवान! भक्तों की भयंकर भूरि भीति भगाइए।
यहाँ 'भ' वर्ण (अक्षर) का प्रयोग कई बार होने से एक चमत्कार की सृष्टि हुई है, और यह चमत्कार शब्दगत होने से शब्दालंकार का उदाहण है।
2. कनक कनक ते सौगुनी, मादकता अधिकाय।
यहाँ 'कनक' शब्द दो बार (अलग-अलग अर्थों में) प्रयुक्त होने से 'यमक' शब्दालंकार है।
3. नवजीवन दो घनश्याम! हमें।
यहाँ 'जीवन' के दो अर्थ 'जल' और 'ज़िंदगी' तथा 'घनश्याम' के भी दो अर्थ—'मेघ और 'भगवान कृष्ण' होने से 'श्लेष' नामक शब्दालंकार है।
टिप्पणी—ऊपर दिए गए उदाहरणों में जिन शब्दों में अलंकार है, उनको निकालकर यदि उसी अर्थ के दूसरे शब्द रख दें तो अलंकार नहीं रह जाएगा अर्थात् जो चमत्कार मालूम होता है वह नष्ट हो जाएगा। जैसे :
उदाहण (3) में हम 'जीवन' की जगह 'ज़िंदगी' रख दें तो श्लेष अलंकार मिट जाएगा क्योकि 'ज़िंदगी' के दो अर्थ नहीं होते जो 'जीवन' के होते हैं।
इसी प्रकार पहले उदाहरण को यदि हम यों कर दें—
जगदीश? भक्तों का सुदारूण डर अपार मिटाइए।
तो अर्थ वही रहने पर भी 'भ' का अनुप्रास नहीं रहेगा क्योंकि 'भ' कई बार नहीं आया।
(2) अर्थालंकार—जब चमत्कार या चारूत शब्दों के अर्थ में होता है और एक शब्द के स्थान पर उसका दूसरा पर्यायवाची शब्द रखने पर उसका चमत्कार या सौंदर्य नष्ट नहीं होता, तब अर्थालंकार होता है।
उदाहरण—
1. मुख मयंक सम मंजु मनोहर।
यहाँ मुख को चंद्रमा के समान सुंदर कहा गया है अतः उपमा अलंकार हुआ। यहाँ 'मयंक' के स्थान पर 'शशि' या 'चंद्र' रखने पर भी अलंकार नष्ट नहीं होता।
2. हरि-मुख-कमल विलोकिय सुंदर।
यहाँ मुख को 'कमल' बताया गया है, अतः रूपक अलंकार है।
जैसा बताया, अर्थालंकार में वाक्य के शब्दों को बदलकर उनकी जगह उसी अर्थ के अन्य शब्द रख देने से अलंकार का चमत्कार नष्ट नहीं हो जाता किंतु बना रहता है। जैसे—
ऊपर के उदाहारण (2) को बदलकर यदि यों कर दें—
प्रभु-बदनांबुज मंजुल निरखिय।
तो भी मुख और 'कमल' का रूपक बना रहेगा।
शब्दालंकार और अर्थलंकार में अंतर
अर्थालंकार में वाक्य के शब्दों को बदलकर पर्याय शब्द रख देने से अलंकार नष्ट नहीं होता। शब्दालंकार में वाक्य के शब्दों को बदलकर पर्याय शब्द रख देने से, अर्थ न बदलने पर भी, अलंकार नष्ट हो जाता है।
नरोत्तमदास स्वामी कृत 'अलंकार पारिजात' में अलंकार के भेद कुछ इस प्रकार बताए गए हैं।
(क) शब्दालंकार
शब्दालंकार के भेद
शब्दालंकार के वैसे तो अनेक भेद (प्रकार) हैं किंतु नरोत्तमदास स्वामी द्वारा मुख्य भेद आठ हैं :-
1. अनुप्रास—जब वर्ण (अक्षर) की आवृत्ति एक या एक से अधिक बार हो।
2. लाटानुप्रास—जब शब्द की आवृत्ति हो और अर्थ हर बार अलग न हो किंतु अन्वय करने से अर्थ भिन्न हो।
3. पुनरुक्तिप्रकाश—जहाँ शब्द की आवृत्ति बिना आर्थ बदले हो और अन्वय करने पर भी अर्थ वही रहे।
4. यमक—जब शब्द की आवृत्ति एक से अधिक बार हो और अर्थ भी हर बार भिन्न हों।
5. श्लेष—काव्य में ऐसे शब्द या शब्दों का प्रयोग हो, जिनके एकाधिक अर्थ हों।
6. वक्रोक्ति—जब वाक्ता के कथन का श्रोता द्वारा अन्य अर्थ लगाया जाए।
7. पुनरुक्तवदाभास—जब अर्थ की पुनरूक्ति का आभास मात्र हो किंतु वास्तव में अर्थ भिन्न न हो।
8. वीप्सा—जब भावावेश में कहे गए शब्द या शब्दों में आवृत्ति हो।
अन्य विद्वानों ने शब्दालंकार के मुख्यतः छ भेद बताए हैं— अनुप्रास, यमक, श्लेष, वक्रोक्ति, पुनरुक्तिप्रकाश, वीप्सा।
शब्दालंकारों का सोदाहरण विवेचन
1. अनुप्रास
अनुप्रास में वर्ण या वर्ण-समूह अनेक (दो या अधिक) बार आता है।
उदाहरण-
भगवान! भागें दुःख, जनता देश की फूले-फले।
इसमें 'भ' और 'ग' (भ-ग) यह वर्ण-समूह दो बार आया है। इसी प्रकार अंत में 'फ' और 'ल' (फ-ल) यह वर्ण-समूह भी दो बार आया है। यह दो वर्षों का अनुप्रास है।
भरत-भारती मंजु मराली।
इसमें भ, र और त इन तीनों वर्षों का समूह दो बार आया है।
अनुप्रास के भेद
अनुप्रास के पाँच भेद होते हैं :-
(i) छेकानुप्रास-वर्ण या वर्ण-समूह का दो बार आना।
(ii) वत्त्यनुप्रास-वर्ण या वर्ण-समूह का तीन या अधिक बार आना।
(iii) लाटानुप्रास-जब शब्द की आवृत्ति हो और अर्थ हर बार अलग न हो किंतु अन्वय करने से अर्थ भिन्न हो।
(iv) श्रुत्यनुप्रास-एक स्थान से उच्चारण होने वाले बहुत-से वर्णों का प्रयोग होना।
(v) अन्त्यानुप्रास-शब्दों या चरणों के अंत में अंतिम दो स्वरों की, बीच के व्यंजन सहित, आवृति होना।
(i) छेकानुप्रास
इसमें एक वर्ण या वर्ण-समूह की एक बार आवृत्ति होती है, अर्थात् वर्ण या वर्ण-समूह दो बार आता है।
उदाहरण-
1. परम पनीत भरत-आचरनू।
2. सब और छटा थी छायी।
3. अति आनंद मगन महतारी।
4. कानन कठिन भयंकर भारी।
घोर घाम हिम बारि बयारी।
5. हरि-सा हीरा छाँड़ि कै करैं आन की आस।
6. चेत कर चलना कुमारग में कदम धरना नहीं।
बोध-वर्थक लेख लिखने में कमी करना नहीं॥
(ii) वृत्त्यनुप्रास
इसमें एक वर्ण-या वर्ण-समूह की अनेक (एक से अधिक) बार आवृत्ति होती है।
उदाहरण-
1. भव्य, भावों में भयानक भावना भरना नहीं।
यहाँ 'भ' वर्ण कई बार आया है।
2. निपट नीरव नंद-निकेत में।
यहाँ 'न' वर्ण कई बार आया है।
3. भटक भावनाओं के भम में भीतर ही था भूल रहा।
यहाँ 'भ' वर्ण कई बार आया है।
अन्य उदाहरण-
1. चारू चंद्र की चंचल किरणें खेल रही थीं जल-थल में।
2. निर्ममता निरीह पुरुषों में निस्संदेह निरखती हो।
3. काले कुत्सित कीट का कुसुम में कोई नहीं काम था।
4. गंधी गंध गुलाब को गंवई गाहक कौन?
5. कानन कूकि के कोकिल कूर करेजन की किरचें करती क्यों?
(iii) लाटानुप्रास
जब कोई शब्द अनेक (दो या दो से अधिक) बार आए, अर्थ प्रत्येक बार एक ही हो, परंतु अन्वय प्रत्येक बार भिन्न हो (अर्थात् या तो भिन्न शब्द के साथ हो, या यदि एक ही शब्द के साथ हो तो भिन्न प्रकार का हो)
उदाहरणर्थ
हे उत्तरा के धन! रहो तुम उत्तरा के पास में।
यहाँ उत्तरा के पद दो बार आया है। दोनों बार अर्थ वहीं है पर उसका अन्वय पहली बार धन के साथ और दूसरी बार पास के साथ होता है।
अन्य उदाहरण-
1. पूत सपूत तो क्यों धन संच?
पूत कापूत तो क्यों धन संच?
यहाँ कई शब्द दो बार आए हैं, यथा-पूत, तो, क्यों, धन, संचै। प्रथम बार सबका अन्वय सपूत के साथ है और दूसरी बार कपूत के साथ।
2. मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी।
यहाँ पहले दोनों तेज शब्दों का अन्वय मिला क्रिया के साथ है, पर पहला तेज कारण कारक में और दूसरा तेज कर्ताकारक में है, इस प्रकार अन्वय भिन्न हो गया है। तीसरे तेज का अन्वय अधिकारी शब्द के साथ है।
3. राम-भजन-जाके अहै, विपति सुमंगल ताही।
राम-भजन जाके नहीं, विपति सुमंगल ताहि।
पूर्वार्ध में 'विपति' कर्ता और 'सुमंगल' पूरक है, उत्तरार्ध में 'सुमंगल' कर्ता और 'विपति' पूरक है
4. राम-भजन जाके नहीं, जाति विपति ता पास।
राम-भजन जाके, नहीं जाति विपति ता पास।
पूर्वार्ध में 'नहीं' का अन्वय 'राम-भजन जाके' के साथ है और उत्तरार्ध में ‘नहीं’ का अन्वय जाति विपति ता पास’ के साथ है।
5. पराधीन जो नर नहीं, सुख-संपत्ति ता हेत।
पराधीन जो नर, नहीं सुख-संपत्ति ता हेत॥
(iv) श्रुत्यनुप्रास
जब श्रुति की आवृति हो, अर्थात् जब एक स्थान से उच्चारण होने वाले बहुत-से वर्षों का प्रयोग किया जाए।
उदाहरण—
1. दिनांत था, थे दिननाथ डूबते।
सधेनु आते गृह ग्वाल-बाल थे॥
इसमें ये दन्त्य अक्षर आए हैं—
द न त थ थ द न न थ त।
स ध न त ल ल थ॥
2. तुलसीदास सहित निसि-दिन देखते तुम्हारि निठुराई।
इसमें ये दन्त्य अक्षर आए हैं
त ल स द स स द त न स द न दत तन।
टिप्पणी—अक्षरों के उच्चारण के स्थान इस प्रकार हैं :
अ आ क ख ग घ ङ ह कण्ठ्य
इ ई च छ ज झ ञ य श तालुव्य
ऋ ऋ ट ठ ड ढ ण र ष मूर्धा
लृ त थ द ध न ल स दन्त्य
उ ऊ प फ व भ म ओष्ठ्य
ए ऐ कंठ-तालु
ओ औ कंठ-ओष्ठ्य
व दन्त्य-ओष्ठ्य
ङ ञ ण न म नासिका भी
(iv) अन्त्यानुप्रास
जब दो या अधिक शब्दों या वाक्यों, या छंदों के चरणों के अंत में अंतिम दो स्वरों की, बीच के व्यंजन-सहित (यदि हो तो), आवृत्ति हो।
उदाहरण—
1. नभ लाली, चाली निसा, चटकाली धुनि कीन।
यहाँ लाली, चाली और चटकाली इन शब्दों के अंत में बीच के व्यंजन ल् के सहित अंत के दो स्वरों (आ और ई) की आवृत्ति हुई है।
2. दुखी बना मंजु-मना ब्रजागना।
यहाँ बना, मना और ब्रजांगना शब्दों के अंत में बीच के व्यंजन न् के सहित अंत के दो स्वरों (अ, आ) की अवृत्ति हुई है।
3. जिसने हम सबको बनाया, बात-की-बात में वह कर दिखाया कि जिसका भेद किसी ने न पाया।
यहाँ बनाया, दिखाया और पाया शब्दों के अंत में बीच के व्यंजन य् के सहित अंत के दो स्वरों (आ, आ) की आवृत्ति हुई है।
यमक
जब कोई शब्द अनेक (दो या दो से अधिक) बार आए अर्थ प्रत्येक बार भिन्न हो। कभी-कभी पूरा शब्द दुबारा न आकर उस शब्द का कुछ अंश दुबारा आता है, उस अवस्था में भी यमक होता है।
उदाहरण—
मूरति मधुर मनोहर देखी।
भयेउ विदेह विदेह विसेखी।
यहाँ विदेह शब्द दो बार आया है। पहली बार अर्थ है राजा जनक और दूसरी बार अर्थ है देह-रहित या देह की सुधि भूला हुआ।
अन्य उदाहरण—
1. तीन बेर खातीं ते वे तीन बेर खाती हैं।
बेर = (1) बार, (2) बेर नाम का फल।
2. कदंब के पुष्प-कदंब की छटा।
कदंब = (1) एक पेड़ का नाम, (2) समूह।
3. यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी।
यह परद का यमक है। पहला परदे स्वतंत्र और सार्थक शब्द है और दूसरा परदे 'परदेशी' शब्द का अंश है।
4. कमोदिनी मानस-मोदिनी कहीं।
यहाँ मोदिनी का यमक है। पहला मोदिनी 'कुमोदिनी' शब्द का अंश है, एवं दूसरा स्वतंत्र शब्द है जिसका अर्थ है प्रसन्नता देने वाली।
5. आयो सखि! सावन विरह सरसावन,
लग्यौ है बरसावन सलिल चहुँ ओर तें।
6. अयि! नित कलपाता है मुझे कांत होके।
जिस बिन कल पता है नहीं प्राण मेरा।
7. बसन देहु, व्रज में हमें बसन देहु ब्रजराज!
(बसन = 1. वस्त्र; 2. बसने, रहने)
8. लाल दुपट्टा मलमल का,
कि दिल मेरा मल-मल गया।
9. सारँग ले सारँग चली, सारंग पूगो आय।
सारँग ले सारँग धर्यौ, सारंग सारँग माँय।
(सारँग = 1. घड़ा 2. सुंदरी; 3. मेघ (वर्षा); 4. वस्त्र; 5. घड़ा; 6 सुंदरी; 7. सरोवर)।
श्लेष
जब वाक्य में एक से अधिक अर्थ वाले शब्द या शब्दों का प्रयोग किया जाए और इस प्रकार एक से अधिक अर्थों का बोध कराया जाए।
उदाहरण—
बलिहारी नृप-कूप की गुण बिन बूँद न देहिं।
(अर्थ—राजा और कूप गुण विनरा कुछ भी नहीं देते।)
यहाँ गुण के दो अर्थ हैं—एक राजा के साथ लगता है और दूसरा कूप के साथ। राजा के साथ अर्थ है सद्गुण, और कूप के साथ रस्सी।
अन्य उदाहरण—
1. पानी गए न ऊबरै मोती मानुष चून।
(अर्थ—पानी नाश हो जाने से मोती, मनुष्य और आटा किसी काम के नहीं रहते।)
यहाँ पानी के तीन अर्थ हैं—मोती के साथ आब या कांति; मनुष्य के साथ इज़्ज़त या प्रतिष्ठा; आटे के साथ जल।
पानी के एक से अधिक अर्थ होने के कारण यहाँ श्लेष अलंकार हुआ।
2. जहाँ गाँठ तहाँ रस नहीं, यह जानत सब कोइ।
ईख के साथ-गाँठ = ईख की पोर; रस मीठा जलीय अंश। मनुष्य के साथ-गाँठ = कपट, मनोमालिन्य; रस = प्रेम, आनंद।
3. नवजीवन दो घनश्याम! हमें।
मेघ पक्ष में-जीवन = पानी। घनश्यम = काला मेघ। कृष्ण पक्ष में-जीवन = जीन। घनश्याम = कृष्ण।
4. सुबरन को ढूँढ़त फिरें कवि, कामी अरू चोर।
सुबरन (सुवर्ण) = (1) सुंदर अक्षर; (2) सुंदर रूप; (3) सोना।
5. विमलांबरा रजनी-वधू अभिसारिका-सी जा रही।
अंबर = (1) आकाश; (2) वस्त्र।
टिप्पणी—श्लेष अर्थालंकार भी होता है। अर्थश्लेष में शब्दों के अनेक अर्थ नहीं होते, परंतु वे ऐसे होते हैं कि अनेक पक्षों में लग सकते हैं। अर्थालंकार श्लेष में शब्दों को पर्याप्त-शब्दों से बदल देने पर भी चमत्कार बना रहता है।
उदाहरणार्थ—
1. नर की अरू नल-नीर की गति एकै करि जोय।
जेतो नीचो है चलै, तेतो ऊँचो होय॥
नीचो = (1) गहरा; (2) नम्र; विनयशील।
ऊँचो = (1) ऊपर उठा हुआ; (2) उन्नत, बड़ा।
2. सत्यासक्त दयाल द्विजप्रिय अघहर सुखकंद।
जन हित कमला-तजन जय शिव, नृप कवि हीरचंद॥
इस पद्य का अर्थ शिव, राजा हरिश्चंद्र और कवि हरिश्चंद्र इन तीनों पक्षों में लगता है। सत्यासक्त और द्विज शब्दों में शब्दश्लेष और शेष शब्दों में अर्थश्लेष अलंकार है।
सत्यास्क्त (1) सती में आसक्त; (2) सत्य में आसक्त; (3) सत्य में आसक्त।
दयाल-(1-2-3) कृपालु।
द्विजप्रिय-(1) चंद्रमा है प्रिय जिसको; (2-3) ब्राह्मण हैं प्रिय जिसको।
अघहर-(1-2-3) पाप-नाशक।
सुखकंद-(1-2-3) सुख के मूल।
कमला-तजन-(1-2-3) लक्ष्मी का त्याग करने वाले।
वक्रोक्ति
जब किसी व्यक्ति के एक अर्थ में कहे गए शब्द या वाक्य का कोई दूसरा व्यक्ति जानबूझकर दूसरा अर्थ कल्पित करे।
इस दूसरे अर्थ की कल्पना श्लेष के कारण संभव हो पाती है।
उदाहरणार्थ—
भिक्षुक गो कित को गिरिये।
सो तो मागमन को बलिद्वार गयो री।
लक्ष्मी पर्वती से विनोद में पूछती है—हे गिरिजा तुम्हारा वह भिखारी (=शिव) कहाँ गया? पार्वती लक्ष्मी के अर्थ को समझ लेती है पर विनोद का उत्तर विनोद में देने के लिए जानबूझकर भिखारी का दूसरा अर्थ (=विष्णु) कल्पित करती है (लगाती है) और उत्तर देती है—भिखारी कहाँ जाएगा? माँगने को गया है (राजा बलि के द्वार पर माँगने को विष्णु गए थे)।
अन्य उदाहरण—
1. है पशुपाल कहाँ सजनी। जमुना-तट धेनु चराय रहो री।
लक्ष्मी कहती है—वह पशुपाल (= पशुपति = शिव का नाम) कहाँ है? पर्वती पशुपाल का, दूसरा अर्थ पशुओं का पालक कल्पित करके उत्तर देती है—यमुना तट के किनारे गायें चरा रहा होगा (विष्णु कृष्णावतार में यमुना-तट पर गायें चराते थे।)
2. खरी होहु नेकु बारी। कहा हमें खोटी देखी?
सुनो बैन नेकु, सो तो आन ठी बजाइये।
दीजे हमें दान सो तो आज न परब कछू,
गो-रस दे, सो रस हमारे कहाँ पाइये?
मही देहु हमें, सो तो मही-पति दैहै कोऊ,
दही हेहु, दही है तो सीरो कछु खाइये।
'सूरत' कहत ऐसे सुनि-सुनि रीझे लाल,
दीन्हीं उर-माल, सोभा कहाँ लगि गाइएये।
खरी = (1) खड़ी; (2) खरी, सच्ची, जो खोटी न हो। बैनु = (1) वचन; (2) वेणु, वंशी। दान = (1) राज्य कर; (2) दान । गो-रस = (1) दूध; (2) गया हुआ रस। मही = (1) छाछ, (2) पृथ्वी। दही देहु = (1) दही दो; (2) देह जल गई है।
बारी = हे बाला। नैकु-जरा। आन ठाँ = अन्य स्थान पर। परब = पुण्य-दिन। सीरो = ठंडा।
3. कौन द्वार पर? हरि मैं राधे!
क्या वानर का काम यहाँ?
राधा भीतर से पूछती है—बाहर तुम कौन हो? कृष्ण उत्तर देते हैं—राधे!
मैं हरि हूँ। राधा हरि का अर्थ कृष्ण न लगाकर वानर लगाती है और कहती है कि इस नगर में वानर का क्या काम?
कृष्ण द्वारा एक अर्थ में कहे गए 'हरि' शब्द का राधा दूसरा अर्थ वानर कल्पित करती है।
4. हरि ! अंबर देहु हमें कर में गहिये किन जो कर में नभ आवै।
अंबर-(1) गोपी का अर्थ वस्त्र; (2) कृष्ण द्वारा कल्पित अर्थ = आकाश, नभ।
वक्रोक्ति अलंकार शब्दालंकार भी होता है और अर्थालंकार भी। प्रथम दो उदाहरणों में वह आर्थालंकार है क्योंकि 'भिक्षुक' और 'पशुपाल' शब्दों को बदला जा सकता है।
काकु-वक्रोक्ति
कुछ विद्धान विक्रोक्ति का एक और भेद मानते हैं जिसे काकु-वक्रोक्ति नाम दिया गया है (यह वस्तुतः गुणी भूत व्यंग्य ध्वनि का एक प्रकार है।) उसमें वक्ता द्वारा एक अर्थ में कहे हुए वाक्य का, श्रेता काकु द्वारा दूसरा अर्थ सूचित करता है।
उदाहरणार्थ—
आये हू मधुमास के प्रियतम ऐहैं नाहिं।
आये हू मधुमास के प्रियतम ऐहैं नाहिं।
कोई विरहिणी कहती है कि वसंत आने पर भी प्रियतम नहीं आएँगे। रखी उन्हीं शब्दों का काकु से दूसरा अर्थ कल्पिता करती है—वसंत आने पर भी (क्या) प्रियतम नहीं आएँगे? अर्थात् अवश्य आएँगे।
अन्य उदाहरण—
उक कह्यो वर देत सिव, भाव चाहिए मीत।
सुनि कह कोउ, भोले भवहि भाव चाहिए मीत?
एक ने कहा कि शिव वर देते हैं पर मन में भाव होना चाहिए। सुनकर दूसरे ने कहा—भोले शिव को भी क्या भाव चाहिए? अर्थात् नहीं चाहिए क्योंकि वे इतने भोले हैं कि बिना भाव के ही वर दे डालते हैं। यहाँ 'भाव चाहिए' वाक्य का 'भाव नहीं चाहिए' यह दूसरा अर्थ कल्पित किया गया है।
शब्दालंकारों में परस्पर अंतर
(1) अनुप्रास और लाटानुप्रास का अंतर
(क) दोनों में आवृत्ति होती है।
(ख) अनुप्रास में वर्ण की आवृत्ति होती है।
लाटानुप्रास में शब्द की आवृत्ति होती है।
अनुप्रास-मुख मयंक सम मजु मनोहर।
लाटानुप्रास-अपना कुछ भी न रहा अपना।
(2) लाटानुप्रास और यमक का अंतर
(क) दोनों में शब्द की आवृत्ति होती है।
(ख) लाटानुप्रास में शब्द की आवृत्ति होती है और अर्थ प्रत्येक बार अभिन्न होता है। यमक में शब्द की आवृत्ति होती है पर अर्थ प्रत्येक बार भिन्न होता है।
लाटानुप्रास - अब जीवन मैं नहिं जीवन है।
यमक - धन! जीवन दो बरसाकर जीवन।
जीवन = (1) जीवन; (2) पानी।
लाटानुप्रास - आया वर्षा-काल का सखि! यह रसमय काल।
यमक - आया वर्षा-काल यह विरहि-जनों का काल॥
काल = (1) समय, ऋतु; (2) मरण।
(3) यमक और श्लेष का अंतर
(क) दोनों में एक शब्द के अनेक अर्थ होते हैं।
(ख) यमक में शब्द अनेक बार आता है और प्रत्येक बार भिन्न अर्थ होता है; इस प्रकार उसके अनेक बार में अनेक अर्थ होते हैं। श्लेष में शब्द एक ही बार आता है और एक ही बार में उसके अनेक अर्थ होते हैं।
यमक - धन! जीवन दो बरसाकर जीवन।
जीवन (1) जीवन; (2) पानी।
श्लेष - नवजीवन दो धनश्याम! हमें।
जीवन (1) पानी; (2) जीवन।
(4) श्लेष और वक्रोक्ति का अंतर
(क) दोनों में किसी शब्द के अनेक अर्थ होते हैं।
(ख) श्लेष में केवल इतना ही होता है कि शब्द के अनेक अर्थ हों, उसमें शब्द की अनेकार्थता ही प्रधान बात होती है। वक्रोक्ति में एक व्यक्ति द्वारा एक अर्थ में कही गई बात का दूसरे व्यक्ति द्वारा दूसरा अर्थ कल्पित किया जाता है। दूसरे व्यक्ति द्वारा दूसरा अर्थ कल्पित किया जाना, यही वक्रोक्ति का प्रधान तत्व होता है। वक्रोक्ति के लिए केवल किसी शब्द के दो अर्थ होना ही पर्याप्त नहीं होता, दूसरे व्यक्ति द्वारा अर्थ कल्पित किया जाना चाहिए।
श्लेष - नवजीवन दो घनश्याम! हमें।
वक्रोक्ति - मैं हूँ घनश्याम! जाके बरसो गगन में।
घनश्याम = (1) कृष्ण; (2) काला बादल।
(ख) अर्थालंकार
अर्थालंकार के भेद :
अर्थालंकार के अनेक भेद (प्रकार) हैं :-
(1) सादृश्य-मूलक या साधर्म्य-मूलक - इनका आधार सादृश्य या साधर्म्य होता है, अर्थात् इनके मूल के किसी न किसी प्रकार की समानता रहती है।
उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, रूपकातिशयोक्ति, प्रतीप, भ्राँति, संदेह, स्मरण, अपह्नुति, व्यतिरेक, दृष्टांत, निदर्शना, समासोक्ति अन्योक्ति आदि प्रमुख साधर्म्य-मूलक अर्थालंकार हैं।
(2) विरोध-मूलक - इनका आधार विरोध होता है, अर्थात् इनके मूल में किसी न किसी प्रकार का विरोध रहता है। विरोध कई प्रकार का हो सकता है, जैसे वस्तु और वस्तु का विरोध, गुण और गुण का विरोध, क्रिया और क्रिया का विरोध, वस्तु और गुण का विरोध, वस्तु और क्रिया का विरोध, गुण और क्रिया का विरोध, कारण और कार्य का विरोध, उद्देश्य और कार्य का विरोध, इत्यादि।
विरोधाभास, असंगति, विभावना, विशेषोक्ति, विषम, व्याघात, अल्प, अधिक आदि प्रमुख विरोध-मूलक अलंकार हैं।
(3) शृंखला-मूलक - एकावली, कारणमाला, मालादीपक, सार।
(4) तर्कन्याय-मूलक - काव्यलिंग, अनुमान।
(5) काव्यन्याय-मूलक - परिसंख्या, यथासंख्या, समुच्चय आदि।
(6) लोकन्याय-मूलक - तद्गुण, अतद्गुण, मीलित, उन्मीलित, सामान्य, विशेषक आदि।
(7) गूढ़ार्थप्रतीति-मूलक - सूक्ष्म, व्याजोक्ति, आदि।
उक्त सात भेदों में प्रमुख प्रथम दो भेद-सादृश्यमूलक और विरोधमूलक ही प्रमुख माने जाते हैं।
प्रमुख अर्थालंकारों का सोदाहरण विवेचन
उपमा
'उपमा' को अर्थालंकारों का मूलाधार समझना चाहिए। उपमा को समझ लेने से अन्य अलंकारों को समझने में बड़ी सुख-सुविधा होती है।
'उपमा' का सामान्य अर्थ है—'समानता' या 'तुलना'। अर्थात् उपमा में किसी एक वस्तु को दूसरी वस्तु के समान बताया जाता है, या दूसरे शब्दों में कहें तो एक वस्तु की तुलना किसी दूसरी वस्तु से की जाती है। जैसे, 'मुख कमल के समान सुंदर है' कथन में 'मुख' (एक वस्तु) की समानता (तुलना) दूसरी वस्तु 'कमल' से की गई है, अतः यहाँ उपमा मानी जाएगी।
परिभाषा—जहाँ किसी वर्णित (प्रस्तुत) वस्तु की उसके किसी विशेष गुण, क्रिया, स्वभाव आदि की समानता के आधार पर किसी अन्य (अप्रस्तुत) वस्तु से समानता स्थापित की जाए, वहाँ उपमा अलंकार होता है।
दोनों वस्तुओं में कोई साधारण-धर्म, अर्थात ऐसा गुण होता है जो दोनों में पाया जाता है। उस साधारण-धर्म के कारण दोनों में समानता बताई जाती है।
उपमा के चार अंग - उपमा के चार अंग होते हैं—
1. उपमेय - जो वर्णन का विषय हो और जिसको किसी अन्य के समान बताया जाए, अर्थात् जिसकी समानता किसी के साथ बताई जाए इसे प्रस्तुत भी कहते हैं।
2. उपमान - कोई प्रसिद्ध वस्तु जिसके समान उपमेय को बताया जाए, इसे अप्रस्तुत भी कहते हैं।
3. वाचक शब्द - वह शब्द जिसके द्वारा उपमेय और उपमान में समानता बताई जाए।
4. साधारण-धर्म - वह गुण या क्रिया जो उपमेय और उपमान दोनों में हो और जिसके कारण दोनों में समानता बताई जाए।
ये चारों कभी शब्दों द्वारा उल्लिखित होते है और कभी नहीं होते अर्थात् छिपे रहते हैं। तब इनका अध्याहार करना पड़ता है।
उदारणार्थ—
1. 'मुख कमल के समान सुंदर है।'
इस उदाहरण में
1. 'मुख' उपमेय (प्रस्तुत) है।
2. 'कमल' उपमान (अप्रस्तुत) है।
3. 'समान' वाचक शब्द है।
4. 'सुंदर' साधारण-धर्म है।
2. मुख कमल-सा खिल गया।
इस उदाहरण में
1 'मुख' उपमेय (प्रस्तुत) है।
2. 'कमल' उपमान (अप्रस्तुत) है।
3. 'सा' वाचक-शब्द है।
4. 'खिल गया' साधारण-धर्म है।
अन्य उदाहरण
'सुनि सुरसरि सम पावन वानी।'
तुलसी की इस अर्द्धाली में भी उपमा के चारों अंग विराजमान हैं—
1. 'वानी' उपमेय (प्रस्तुत) है।
2. 'सुरसरि' (गंगा) उपमान (अप्रस्तुत) है।
3. 'पावन' (पवित्र) साधारण-धर्म है। और
4. 'सम' (समान) वाचक शब्द है।
उपमा के भेद (प्रकार)
उपमा के तीन भेद होते हैं—
(क) पूर्णोपमा, (ख) लुप्तोपमा, और (ग) मालोपमा (इसका विवेचन आगे किया जाएगा)।
(क) पूर्णोपमा
जब उपमा में उपमेय, उपमान, वाचक-शब्द और साधारण-धर्म इन चारों का शब्दों में उल्लेख हो तब पूर्णोपमा होती है। जैसे—
उदाहरणार्थ
'मुख कमल जैसा सुंदर है'।
इस उदाहरण में हम देखते हैं कि उपमा के चारों अंग विराजमान हैं। अर्थात् इसमें उपमेय 'मुख', उपमान 'कमल', वाचक शब्द 'जैसा' और साधारण धर्म 'सुंदर' है। चारों अंगों से पूर्ण होने के कारण यहाँ 'पूर्णोपमा' है।
अन्य उदाहरण
कोमल कुसुम समान देह हा! हुई तप्त-अंगारमयी।
इस उदाहरण में भी पूर्णोपमा है, क्योंकि इसमें -
'देह' उपमेय है, 'कुसुम' उपमान है,
'समान' वाचक-शब्द, और 'कोमल' साधारण-धर्म है।
(ख) लुप्तोपमा
जब उपमा में उपमेय, उपमान, वाचक शब्द और साधारण-धर्म इन चारों में से कोई एक या दो या तीन लुप्त हो अर्थात् उनका शब्द द्वारा उल्लेख न किया गया हो।
उदाहरणार्थ
'मुख कमल जैसा है।'
यहाँ साधारण-धर्म 'सुंदर' का शब्द द्वारा उल्लेख नहीं किया है, अतः साधारण धर्म नामक एक अंग के लुप्त होने से लुप्तोपमा हुई।
अन्य उदाहरण
1. उन पर जिसके है सोहती मुक्तमाला।
वह नव-नलिनी-से नेत्रवाला कहाँ है?
इस उदाहरण में भी साधारण धर्म 'सुंदर' लुप्त है।
2. कुलिस-कडोर सुनत कटु बानी।
बिलपत लखन, सीय, सब रानी॥
इस उदाहरण में हम देखते हैं कि
(1) 'कटु बानी' उपमेय;
(2) 'कुलिस' उपमान; और
(3) 'कठोर' साधारण-धर्म है, किंतु 'समान', 'तुल्य', 'सम' आदि वाचक शब्द लुप्त हैं अतः वाचक-लुप्तोपमा हुई।
3. कुलिश-वचन कह कभी किसी का भाई। जी न दुखाओ।
इसमें- (1) वचन उपमेय; और (2) कुलिश उपमान है।
वाचक-शब्द और साधारण-धर्म (कडोर) दोनों लुप्त हैं, अतः यहाँ वाचक-धर्म लुप्तोपमा हुई।
अतिरिक्त उदाहरण
पूर्णोपमा
1. हँसने लगे तब, हरि, अहा! पूर्णेंदु-सा मुख खिल गया।
2. सिंधु-सा विस्तृत और अथाह एक निर्वासित का उत्साह।
3. आकर अखिल विश्व के ऊपर प्रलय-घटा-सी छायी तू।
4. शोभा निकेत, अति उज्ज्वल, कांतिशाली।
था वारि-बिंदु जिसका नव मौक्तिकों-सा॥
लुप्तोपमा
1. पानी केरा बुदबुदा अस मानुस की जात।
2. मृत्यु का प्रस्तर-सा उर चीर प्रवाहित होता जीवन-नीर।
3. जो झरते फूलों पर देता निज चंदन-सी ममता बिखरा।
मालोपमा
जब उपमा में एक उपमेय के अनेक उपमान वर्णित हों तब वहाँ मालोपमा होता है।
विशेष-मालोपमा का प्रकार का उपमा अलंकार ही है; अंतर इतना ही है कि उपमा में उपमान एक ही होता है, मालोपमा में उपमान अनेक होते हैं।
उदाहरणार्थ
मुख चंद्र और कमल के समान है।
यहाँ 'मुख' उपमेय के 'चंद' और 'कमल' ये दो उपमान कहे गए हैं।
अन्य उदाहरण
1. 'मुख’ है सुंदर चंद्र-सो, कोमल कमल समान।
2. कान्ह जिमि कंस पर, तेज तम-अंस पर,
तिमि अरि-वंस पर, सेर सिवराज है।
3. नील सरोरूह, नील मनि, नील नीरधर स्याम।
उपमेयोपमा
जब उपमेय और उपमान को एक-दूसरे से उपमा दी जाए, अर्थात् जब उपमेय को उपमान के समान बताकर फिर उपमान को उपमेय के समान बताया जाए, तब वहाँ उपमेयोपमा होती है।
उदाहरणार्थ
'तो मुख सोहत है ससि-सो, अरू
सोहत है ससि तो मुख जैसो।
यहाँ 'मुख' (उपमेय) को पहले ससि (उपमान) जैसा बताया गया, तदोपरांत 'ससी' को उपमेय 'मुख' जैसा वर्णित किया गया है।
अन्य उदाहरण
1. कमल-से नैन, अरू नैन-से कमल हैं।
2. वे तुम सम, तुम उन सम स्वमी।
3. अंबर-गंग-सी है सरजू,
सरजू सम गंगछटा नभ साजै।
4. औधपुरी अमरावति-सी,
अमरावति औधपुरी-सी विराजै।
5. राम के समान संभु, संभु सम राम हैं।
6. साह के सपूत दानी सिवसाह! तेरो कर
सुर-तरू सो है, सुर-तरू तेरे कर-सो।
अनन्वय
जब उपमेय का उपमान न मिल सकने के कारण उपमेय को ही उपमान बना दिया जाए, अर्थात् जब उपमेय की उपमा उपमेय से ही दी जाए।
उदाहरणार्थ
अब यद्यपि दुर्बल आरत है।
पर भारत के सम भारत है
यहाँ भारत उपमेय है और उपमान भी वही है, अर्थात् भारत देश इतना महान है कि इसकी तुलना में कोई अन्य उपमान मिलता ही नहीं, अतः भारत (उपमेय) की तुलना भी उपमान रूप भारत से ही कर दी गई है।
अन्य उदाहरण
1. सुंदर नंकिशोर-से सुंदर नंदकिशोर।
सुंदर नंदकिशोर के समान सुंदर नंदकिशोर ही हैं। उपमान न होने के कारण नंदकिशोर उपमेय को ही उपमान बना दिया है।
2. हरि को मुख सखि! हरि-मुख जैसो।
3. निरवधि जनु निरूपम पुरुष,
भरत भरत सम जान।
4. मुकति की दाता माता! तो-सी तू ही जंग में।
5. करम वचन-मानस विमल तुम समान तुम तात।
6. उपमा न कोउ, कह दास तुलसी, कतहुँ कवि-कोविद लहैं।
बल, विनय, विद्या, शील, शोभा सिंधु इन सम येइ अहैं।
रूपक
जब एक वस्तु पर दूसरी वस्तु का आरोप किया जाए, अर्थात् जब एक वस्तु को दूसरी वस्तु का रूप दिया जाए तो रूपक अलंकार होता है।
उदाहरणर्थ
'मुख कमल है।'
इस उदाहरण में मुख पर कमल का आरोप किया गया है, अर्थात मुख को कमल का रूप दिया गया है, या यों कहिए कि मुख को कमल बना दिया गया है।
एक और उदाहरण देखिए
'चरन सरोज पखारन लागा।'
यहाँ 'चरणों' (उपमेय) में 'सरोज' (उपमान) का आरोप होने से रूपक अलंकार है।
रूपक के भेद
रूपक के मुख्य तीन भेद होते है :
(i) सांग रूपक
(ii) निरंग रूपक
(iii) परंपरित रूपक
(i) सांग रूपक—जब उपमेय पर उपमान का आरोप किया जाए और भाव ही उपमान के अंगो का भी उपमेय अंगों पर आरोप किया जाए, आर्थात् जब उपमेय को उपमान बनाया जाए और उपमान के अंग भी उपमेय के साथ बताए जाए।
उदाहरणार्थ
ऊधो! मेरा हृदयतल था एक उद्यान न्यारा।
शोभा देती अमित उसमें कल्पना-क्यारियाँ थीं।
न्यारे-न्यारे कुसुम कितने भाव के थे अनेकों।
उत्साहों के विपुल विटपी मुग्धकारी महा थे॥
यहाँ यशोदा के 'हृदय' (उपमय) को 'उद्यान' 'उपमान' के रूप में कथित किया गया है। साथ ही विशेष बात यह है कि 'हृदयतल' को 'उद्यान' का रूपक बनाते समय कवि ने 'हृदय' के उपमेय पक्ष पर 'उद्यान' के (उपमान पक्ष के) अनेक अंगों का आरोप कर दिया है। दोनों पक्षों का विवरण इस प्रकार है—
उपमेय पक्ष 'हृदय तल' उपमान पक्ष (उद्यान)
कल्पना क्यारियाँ
भाव कुसुम
उत्साहों विटपी (वृक्ष)
तुलसीदास का प्रसिद्ध दोहा भी सांगरूपक का श्रेष्ठ-सार्थक उदाहरण है
उदित उदयगिरि-मंच पर, रघुवर बाल-पतंग।
विकसे संत-सरोज सब, हरषे लोचन-भृंग॥
जनक सभा में रखे गए धनुष का वर्णन है, जिसे तोड़ने के लिए श्रीराम मंच पर चढ़ गए हैं—कवि ने उसी दृश्य को सांगरूपक के द्वारा निरूपित किया है।
उपमेय उपमान
मंच उदयाचल (पर्वत विशेष)
रघुवर (राम) बाल पतंग (सूर्य)
संत सरोज (कमल)
लोचन (नेत्र) भृंग (भ्रमर)
अन्य उदहरण
1. निर्वसित थे राम, राज्य था कानन में भी।
सच ही है श्रीमान भोगते सुख वन में भी॥
चंद्रातप था व्योम, तारक रत्न जड़े थे।
स्वच्छ दीप था सोम, प्रजा तरू-पुंज खड़े थे॥
शांत नदी का स्त्रोत बिछा था अति सुखकारी।
कमल-कली का नृत्य हो रहा था मन-हारी॥
यहाँ कानन का रूपक राज्य के साथ बाँधा गया है—
राज्य कानन
राजा श्रीराम
चंद्रातप (चंदोवा) व्योम
रत्न तारे
दीप सोम (चंद्रमा)
प्रजा तरू-पुंज
बिछावन शांत नदी का स्त्रोत
नर्तकी कमल-कली
2. बरखा-रितु रघुपति-भगति, तुलसी सालि सु-दास।
राम-नाम वर बरन जुग सावन-भादों मास॥
यहाँ रामभक्ति का रूपक वर्षा के साथ बाँधा गया है—
वर्षा रामभक्ति
धान तुलसी जैसे रामभक्त
सावन-भादों 'राम' ये दो अक्षर
(ii) निरंग रूपक
जब केवल उपमान का आरोप उपमेय पर किया जाए, अर्थात् उपमेय को उपमान बनाया जाए, पर उपमान के अंगों को उपमेय के साथ न बताया जाए।
उदाहरणार्थ
'चरन-कमल मृदु मंजु तुम्हारे।'
यहाँ चरणों को कमल बनाया गया है, पर कमल के अंगो को चरणों के साथ नहीं बताया गया है।
अन्य उदाहरण
हरि-मुख मृदुल मयंक
यहाँ मुख को चंद्रमा बनाया गया है।
(iii) परंपरित रूपक
परंपरित में दो रूपक होते है और एक रूपक का कारण अथवा आधार दूसरा रूपक होता है। अर्थात् एक रूपक दूसरे से परंपराबद्ध होता है।
उदाहरणार्थ
'आशा मेरे हृदय-मरू की मंजु मंदाकिनी है।'
यहाँ दो परंपराबद्ध रूपक हैं—एक हृदय और मरू का तथा दूसरा आशा और मंदाकिनी का। आशा को मंदाकिनी इसीलिए बनाया है कि पहले हृदय को मरू बना चुके हैं। इस प्रकार इस रूपक का करण एक दूसरा रूपक (हृदय और मरू का) है।
अन्य उदाहरण
रविकुल-कैरव-विधु रघुनायक।
यह भी दो रूपक परस्पर जुड़े हैं। रविकुल को कैरव और रघुनायक को विद्यु बनाया गया है, पर रघुनायक को विधु इसलिए बनाया है कि पहले रविकुल को कैरव बना चुके थे। रघुनायक और विधु का रूपक रविकुल और कैरव रूपक पर आश्रित है।
एक अन्य उदाहरण
उदयो ब्रज-नभ आइ यह हरि-मुख मधुर मयंक।
यहाँ पहले ब्रज को नभ बनाया। फिर हरि-मुख को मयंक बनाया। दूसरे रूपक से पहला रूपक जुड़ा हुआ है।
रूपक के भेदों के अतिरिक्त उदाहरण
निरंग रूपक
1. उर अंकुरित गर्व-तरू भारी
2. मयंक है श्याम बिना कलंक का।
3. वे स्वार्थ-वश हो मोह की मदिरा कभी पीते न थे
सांग रूपक
1. अंबर-पनघट में डुबो रही तारा-घट ऊषा-नागरी।
2. जितने कष्ट-कंटकों में है जिनका जीवन-सुमन खिला।
गौरव-गंथ उन्हें उतना ही अत्र तत्र सर्वत्र मिला॥
3. जीवन की चंचल सरिता में फेंकी मैंने मन की जाली।
फँस गईं मनहर भावों की मछलियाँ सुघर भोली-भाली॥
4. मृत्यु एक सरिता है, जिसमें श्रम से कातर जीव नहाकर।
फिर नूतन धारण करते हैं, काया-रूपी वस्त्र बहाकर॥
परंपरित रूपक
1. प्रेम-अतिथि है खड़ा द्वार हृदय कपाट खोल दो तुम।
2. काल-कीट जीवन-प्रसून को क्रमशः कर्तन करता है।
3. यह छोटा-सा शिशु है मेरा, जीवन-निशि का शुभ्र सवेरा।
रूपक के अन्यान्य भेद
रूपक के दो भेद और किए जाते हैं :- (1) अभेद, और (2) तद्रूप।
(1) अभेद रूपक
जब उपमेय को उपमान का रूप दिया जाए और दोनों में कोई भेद न रखा जाए।
उदाहरणार्थ
'मुख चंद्रमा है'
यहाँ पर मुख को चंद्रमा का रूप दिया और दोनों में कोई भेद नहीं किया गया।
(2) तद्रूप रूपक
जब उपमेय को उपमान का रूप दिया जाए पर दोनों में कुछ भेद रखा जाए। यह भेद दूसरा, और, अपर, अन्य, दूजा आदि किसी अन्यार्थ-वाचक शब्द (ऐसा शब्द जिसका अर्थ अन्य या दूसरा हो) द्वारा प्रकट किया जाता है। (तद्रूप = उसके रूपवाला पर वह नहीं)
उदाहरणार्थ
'मुख दूसरा चंद्रमा है।'
यहाँ मुख को चंद्रमा बनाया गया है, पर दूसरा चंद्रमा है (वही चंद्रमा नहीं) यह कहकर कुछ भेद रखा गया है।
'यह राजा दूसरा इंद्र है।'
यहाँ राजा को इंद्र बनाया है पर दूसरा इंद्र है यह कहकर कुछ भेद कर दिया गया है।
अन्य उदाहरण
1. अवधपुरी अमरावति दूजी,
दशरथ दूजो इंद्र मही पर।
2. बल-विभव में कुरुराज सचमुच दूसरा सुरराज है।
यहाँ कुरुराज (दुर्योधन) को सुरराज (इंद्र) बनाया पर दूसरा इंद्र है यह कहकर भेद कहा गया है।
अभेद रूपक के सम, न्यून और अधिक—ये तीन भेद होते हैं। न्यून रूपक में उपमेय में उपमान की अपेक्षा कोई बात कम होती है। और अधिक रूपक में उपमेय में उपमान की अपेक्षा कोई बात अधिक होती है।
उदाहरण
1. सम अभेद रूपक—मुख चंद्रमा है।
2. न्यून अभेद रूपक— (1) मयंक है श्याम बिना कलंक का।
(2) दुइ भुज के हरि रघुबर सुंदर भेस।
प्रथम उदाहरण में श्याम को मयंक (चंद्रमा) बताया पर श्याम में चंद्रमा की अपेक्षा कुछ न्यूनता बताई कि चंद्रमा में कलंक है, श्याम में कलंक नहीं है। द्वितीय उदाहरण में रघुबर (राम) को हरि (विष्णु) बताया पर राम में विष्णु की अपेक्षा कुछ न्यूनता बताई कि विष्णु के चार भुजाएँ हैं पर राम के दो ही भुजाएँ हैं।
3. अधिक अभेद रूपक—
1. सुवर्ण है श्याम सुगंध से भरा।
यहाँ श्याम को स्वर्ण बनाया पर श्याम में स्वर्ण की अपेक्षा यह बात अधिक बताई कि श्याम में सुगंधि है जबकि स्वर्ण में सुगंधि नहीं होती।
2. ये हाथी सजीव पहाड़ हैं।
यहाँ हाथियों को पहाड़ बनाया पर उनमें पहाड़ों की तुलना में यह बात अधिक बताई कि वे जीवन-सहित हैं जबकि पहाड़ जीवन से रहित होते हैं।
अधिक अभेद रूपक वस्तुतः व्यतिरेक अलंकार ही है।
उत्प्रेक्षा
जब एक वस्तु में दूसरी वस्तु की संभावना की जाए, अर्थात् एक वस्तु को दूसरी वस्तु मान लिया जाए।
टिप्पणी—दोनों वस्तुओं में कोई समान धर्म होने के कारण ऐसी संभावना की जाती है। संभावना करने के लिए कुछ शब्दों का प्रयोग किया जाता है जो उत्प्रेक्षा वाचक शब्द कहे जाते हैं। यथा—मानो, मनो, मनु, मनहुँ, जानो, जनु, सा इत्यादि।
उदाहरणार्थ
'नेत्र मानो कमल है।'
नेत्र वास्तव में कमल नहीं हैं परंतु मान लिया है (संभावना कर ली गई है) कि वे कमल हैं।
अन्य उदाहरण
1. अंबर में हारे मानो मोती अनगन हैं।
यहाँ पर तारों में मोतियों की संभावना की गई है, अर्थात् तारों को मोती माना गया है।
2. नाना-रंगी जलद, नभ में दीखते हैं अनूठे।
योधा मानो विविध रंग के वस्त्र धारे हुए हैं॥
यहाँ अनेक रंग के मेघों में अनेक रंग के वस्त्र पहने हुए योद्धाओं की कल्पना की गई है।
3. कहती हुई यों उत्तरा के नेत्र जल से भर गए।
हिम के कों से पूर्ण मानो हो गए पंकज नए॥
यहाँ आँसुओं से भरे हुए उत्तरा के नेत्र में ओस कण-युक्त पंकंजों की संभावना की गई है।
4. अति कटु बचन कहति कैकेई।
मानहु लोन जरे पर देई॥
यहाँ कटु वचन के कथन में जले पर नमक लगाने की संभावना की गई है; कटु वचन कहने को जले पर नमक लगाना भाना गया है।
उत्प्रेक्षा के भेद (प्रकार)
उत्प्रेक्षा के तीन भेद माने गए हैं :-
(i) वस्तुत्प्रेक्षा; (ii) हेतूत्प्रेक्षा, और (iii) फलोत्प्रेक्षा।
(i) वस्तूत्प्रेक्षा
वस्तूत्प्रेक्षा में एक वस्तु में दूसरी वस्तु की संभावना की जाती है, अर्थात् एक वस्तु को दूसरी मान लिया जाता है।
उदाहरणार्थ
'लसत मंजु मुनि-मंडली मध्य सीय-रघुचंद।
ज्ञान-सभा जनु तनु धरे, भगति-सच्चिदानंद॥'
यहाँ मुनि-मंडली में ज्ञान-सभा की और सीताराम में भक्ति एवं सच्चिदानंद की संभावना की गई है।
अन्य उदाहरण
1. हरखि हृदय दशरथ-पुर आयी।
जनु ग्रह-दशा दुसह दुखदायी॥
यही सरस्वती को अयोध्या की दुस्सह ग्रह-दशा माना है।
2. हरि-मुख मानो मधुर मयंक।
3. सरद-ससी बरसत मन घन घनसार अमंद।
(ii) हेतुत्प्रेक्षा
हेतुत्प्रेक्षा में अहेतु में हेतु की संभावना की जाती है, अर्थात् जो हेतु नहीं है उसे हेतु मान लिया जाता है।
उदाहरणार्थ
'अरूण भये कोमल चरण भुवि चलिवे तें मानु।'
कोमल चरण मानो पृथ्वी पर चलने से रक्तवर्ण हो गए। यहाँ चरणों के लाल होने का हेतु पृथ्वी पर चलामा माना गया है यद्यपि यहाँ हेतु नहीं है क्योंकि चरण पृथ्वी पर चलने से लाल नहीं हुए, वे स्वभावतः ही लाल थे।
अन्य उदाहरण
1. मुख सम नहिं यातें मनों बन्दहि छाया छाय।
चंद्रमा मुख के समान नहीं है मानो इसलिए उसको कालिमा छाई रहती है। कालिमा चंद्रमा को इसलिए नहीं छाए रहती कि वह मुख के समान नहीं है, किंतु यह एक प्राकृतिक बात है। फिर भी कालिमा के छाए रहने का कारण यह बताया गया है कि बह मुख के समान नहीं है। इस प्रकार यहाँ अहेतु को हेतु मान लिया है।
2. मुख सम नहिं यातें कमल मनु जल रह्यो छिपाइ।
कमल जल में जाकर छिप गया। इसका कारण यह नहीं है कि वह मुख के समान नहीं होने के कारण लज्जित हो रहा था। फिर भी इसको कारण माना गया है। इस प्रकार यहाँ अहेतु में हेतु की संभावना की गई है।
3. सोवत सीता-नाथ के, भृगु मुनि दीनी लात।
भृगुकुल-पति की गति हरी, मनो सुमिरि वह बात॥
राम ने परशुराम की गति का हरण कर लिया, पर इसका हेतु यह नहीं था कि परशुराम के पूर्वज भृगु मुनि ने विष्णु को लात मारी थी और यह बात राम को याद आ गई थी।
4. देख विकलता मेरी विधु भी पीला पड़ा सखी! तू देख।
5. वह मुख देख पांडु सा पड़कर
गया चंद्र पश्चिम की ओर।
(iii) फलोप्प्रेक्षा
फलोप्प्रेक्षा में अफल में फल (उद्देश्य) की संभावना की जाती है, अर्थात् जो फल नहीं होता उसको फल (या उद्देश्य) मान लिया जाता है।
उदाहरणार्थ
'तब मुख समता लहन को जल शेवत जलतात।'
मानो तुम्हारे सुख की समता प्राप्त करने को कमल जल में खड़ा होकर तपस्या कर रहा है।
कमल जल में एक पैर अर्थात कमल-नाल पर खड़ा रहता है, पर इस उद्देश्य से नहीं कि मुख की समता प्राप्त करे। मुख की समता प्राप्त करना उसका उद्देश्य नहीं हैं, वह इस फल को ध्यान में रखकर इस प्रकार खड़ा होने का कार्य नहीं करता। ऐसी आकांक्षा न होने पर भी इसकी संभावना की गई है। अतः फलोत्प्रेक्षा है।
अन्य उदाहरण
1. रोज अन्हात है छीरधि में ससि
तो मुख की समता लहिबे को।
चंद्रमा सदा क्षीर-सागर में मग्न होता है और उसका उद्देश्य यह नहीं होता कि मुख की समता प्राप्त करे। इस फल की कामना वह नहीं करता। पर माना गया है कि बह इसी फल की कामना करके ऐसा करता है। इस प्रकार यहाँ अफल को फल माना है जिससे फलोत्प्रेक्षा हुई।
2. तव पद-समता को कमल जल सेवत इक पाँय।
3. मधुप निकारन के लिए मानो रूके निहारि।
दिनकर निज कर देत है सतदल-दलनि उघारि॥
4. बढ़ता ताड़ का पेड़ यह मनु चूमन आकास।
(ताड़ के वृक्ष के ऊँचे होने में आकाश को चूमने का उद्देश्य कल्पित किया गया है।)
अतिशयोक्ति
जहाँ किसी वस्तु या बात का वर्णन इतना बढ़ा-चढ़ा कर किया जाए कि लोकसीमा का उल्लंघन सा प्रतीत हो, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।
'अतिशयोक्ति' शब्द ही अतिशय उतना है जिसका अर्थ ही है उक्ति को अतिशयता (बढ़ाया कर) से प्रस्तुत करना।
अतिशयोक्ति का उदाहरण
चलो धनुष से वाण, साथ ही शत्रु सैन्य के प्राण चले।'
धनुष से बाणों के चलने के साथ ही शत्रु-सैन्य के प्राणों का शरीर से चलना साथ हो—यह बढ़ा-चढ़ा कर वर्णन हो माना जाएगा।
अतिशयोक्ति के भेद (प्रकार)
अतिशयोक्ति के सात भेद बताए गए हैं :-
1. संबंधातिशयोक्ति
2. असंबंधातिशयोक्ति
3. चपलातिशयोक्ति
4. अक्रमातिशयोक्ति
5. अत्यंतातिशयोक्ति
6. भेदकातिशयोक्ति
7. रूपकातिशयोक्ति
1. संबंधातिशयोक्ति
जब दो वस्तुओं में संबंध न होने पर भी संबंध बताया जाए।
फबि 1फहरहिं अति उच्च निसाना2।
जिन महँ अटकहिं बिबुध3 बिमाना॥
यहाँ झंडे और विमानों में अटकने का संबंध न होने पर भी दोनों में अटकने का संबंध बताया गया है (कि झंडे विमानों में अटकते हैं)।
पँखुरी लगे गुलाब की परिहै गात खरोट।
यहाँ पंखुरी और गात में खरोंच लगने का संबंध न होने पर भी (गुलाब की पंखुरी से खरोंच नहीं लगती) यह संबंध बताया गया है।
2. असंबंधातिशयोक्ति
जब संबंध होने पर भी संबंध न बताया जाए।
जेहि वर वाजि4 राम असवारा।
तेहि सारदा न बरनै पारा5॥
शारदा और घोड़े में वर्णन कर सकने का संबंध है, शारदा वर्णन कर सकती है, फिर भी इस संबंध का अभाव बताया गया है।
अति सुंदर लखि सिय! मुख तेरो।
आदर हम न करहिं ससि केरो6॥
चंद्रमा में मुख की समानता करने की योग्यता है पर उसको अस्वीकार किया है।
3. चपलातिशयोक्ति
जब कारण के होते ही तुरंत कार्य हो जाए।
तब सिव तीसर नैन उधारा।
चितवत काम भयउ जरि छारा॥
शिव-नयन का खुलना-कारण। जलना-कार्य। कारण के होते ही तुरंत कार्य हो गया।
छूटत ही खर सरन के छूटि गए अरि-प्रान।
4. अक्रमातिशयोक्ति
'जब कारण और कार्य एक साथ हो।' अर्थात् कारण के बाद ही कार्य घटित होता है किंतु जब कारण के साथ ही कार्य होना वर्णित हो तब यह अतिशयोक्ति होती है।
जैसे— 'बाणन के साथ छुटे प्राण दनुजन के।'
पहले बाण छूटेंगे, वे शरीर में लगेंगे तब प्राण छूटेंगे, पर यहाँ दोनों का साथ-साथ छूटना कहा गया है।
बाणों का छूटना कारण है जिससे प्राण छूटना कार्य होता है। पहले कारण होगा और फिर कार्य, पर यहाँ दोनों का एक साथ होना कहा गया है।
5. अत्यंतातिशयोक्ति
जब कारण के पहले कार्य हो जाए।
हनुमान की पूँछ में, लगन न पाई आग।
लंका सिगरी जर गई, गए निशाचर भाग॥
आग लगना-कारण। जलना-कार्य। कारण के पहले ही कार्य हो गया।
छूटि न पाए बान धनुख तें, छूटि गए अरि-प्रान।
6. भेदकातिशयोक्ति
जब और ही, निराला, न्यारा आदि शब्दों से किसी की अत्यंत प्रशंसा की जाए।
वह चितवन औरै कछू, जेहि बस होत सुजान।
यहाँ 'और ही है' इन शब्दों से चितवन की प्रशंसा की गई है।
न्यारी रीति भूतल निहारी सिवराज की।
यहाँ शिवाजी की नीति-रीति की प्रशंसा 'न्यारी' कहकर की गई है।
7. रूपकातिशयोक्ति
जब उपमेय का लोप करके केवल उपमान का कथन किया जाए और उसी में उपमेय का अर्थ लिया जाए।
कनक-लता पर चंद्रमा, धरे धनुष दो बान।
यह नायिका का वर्णन है— कनक-लता-सोने के से रंग का शरीर।
चंद्रमा-मुख। धनुष- भ्रकुटी। बाण- नेत्र, कटाक्ष।
यहाँ शरीर, मुख, भ्रकुटी, कटाक्ष इन उपमेयों का लोप करके केवल लता, चंद्र, धनुष, बाण इन उपमानों का कथन किया गया है। परंतु प्रसंग से नायिका का अर्थ ज्ञात हो जाता है।
गुरुदेव! देखो तो नया यह सिंह सोते से जगा।
यहाँ उपमेय अभिमन्यु का उल्लेख नहीं किया है, उपमान सिंह का ही उल्लेख है, पर उससे अर्थ अभिमन्यु का ही निकलता है।
छंद
मात्रा और वर्ण आदि के विचार से होने वाली वाक्य रचना को छंद कहते हैं। जैसे व्याकरण द्वारा गद्य का अनुशासन होता है, वैसे ही छंद द्वारा पद्य का। छंद का दूसरा नाम पिंगल भी है। इसका कारण यह है कि छंद शास्त्र के आदि प्रणेता पिंगल नाम के ऋषि थे। पिंगलाचार्य के छंदसूत्र में छंद का सुसंबद्ध वर्णन होने के कारण इसे छंद शास्त्र का आदि ग्रंथ माना जाता है। इसी आधार पर छंद शास्त्र को ‘पिंगलशास्त्र’ भी कहते हैं।
छंद को परिभाषा हम इस तरह कर सकते हैं कि तुक, मात्रा, लय, विराम, आदि के नियमों में आबद्ध पंक्तियाँ छंद कहलाती हैं।
छंद के अंग
1. वर्ण—वर्ण के दो प्रकार होते हैं—ह्रस्व वर्ण (अ, इ, उ, चंद्र बिंदु) और दीर्घ वर्ण (आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अनुस्वार और विसर्ग) ह्रस्व को लघु और दीर्घ को गुरु कहा जाता है। लघु वर्ण को एक मात्रा गिनी जाती है और गुरु वर्ण की दो मात्राएँ।
2. मात्रा—मात्रा केवल स्वर की होती है। लघु मात्रा का चिह्न (।) तथा दी मात्रा का चिह्न (ऽ), मात्रिक छंदों में मात्रा गिनकर ही छंदों की पहचान की जाती है।
3. यति—छंद को पढ़ते समय प्रत्येक चरण के अंत में ठहरना पड़ता है। इस ठहरने को 'यति' कहते हैं।
4. गति—कविता के कर्णमधुर प्रवाह को 'गति' कहते हैं। प्रत्येक छंद की अपनी एक लय होती है।
5. पद या चरण—प्रत्येक छंद में कम से कम चार चरण होते हैं। इनमें प्रत्येक पंक्ति अर्थात् छंद के चतुर्थांश को चरण कहते हैं। चरण को पद या पाद भी कहते हैं।
6. तुक—चरण के अंत में आने वाले समान वर्षों को 'तुक' कहते हैं। जैसे तासू-जासु। ताके-जाके आदि।
7. गण—तीन-तीन वर्षों के समूह को 'गण' कहा जाता है। 'यमाताराजभानसलगा’ सूत्र के आधार पर गणों की संख्या आठ है, वर्णिक छंदों की पहचान इसी के आधार पर होती है।
स्पष्टीकरण
छंदों के भेद
छंदो के मुख्यतया दो भेद होते हैं :-
(1) मात्रिक (2) वर्णिक
मात्रिक छंद—जिन छंदों की पहचान केवल मात्राओं के आधार पर की जाती है, मात्रिक छंद होते हैं। इनमें मात्राओं की समानता एवं संख्या पर विचार किया जाता हैं। इनमें वर्षों के क्रम का कोई ध्यान नहीं रखा जाता है। जैसे—दोहा, चौपाई सोरठा आदि।
वर्णिक छंद—जिन छंदों की पहचान के लिए वर्षों के क्रम का विचार किया आता है तथा उसी के आधार पर वर्षों की गणना की जाती है। इसमें वर्णों की संख्या, कम और स्थानादि नियम नियंत्रित रहते हैं। इन्हें वर्णिक छंद कहते हैं।
जैसे—इंद्रवज्रा, उपेंद्रवजा, हरिगीतिका, सवैया आदि।
मात्रिक और वर्णिक छंद के पुनः तीन भेद और किए जा सकते हैं।
(1) सम (2) अर्धसम (3) विषम।
(1) सम—जिसमें वर्णों या मात्राओं की संख्या चारों चरणों में समान हो।
(2) अर्धसम—जहाँ प्रथम और तृतीय चरणों में एवं द्वितीय और चतुर्थ चरणों में वर्णों या मात्राओं की समानता हो।
(3) विषम—जहाँ चारों चरणों में वर्णों की संख्या अथवा मात्राओं में असमानता हो।
आधुनिक हिंदी कविता के आधार पर एक तीसरे प्रकार के छंद को मान्यता मिलो जिसे 'मुक्त' छंद कहा गया। इस छंद के चरणों में वर्णों एवं मात्राओं में किसी का भी ध्यान नहीं रखा जाता तथा केवल लय का विधान होता है। जैसे—निराला और अज्ञेय आदि आधुनिक कवियों की कविताएँ।
छंदों का विवरण
छंदों की संख्या अनंत है। अधिक प्रचलित एवं साधारण छंदों का वर्णन निम्न प्रकार से है।
मात्रिक छंदों के भेद
1. सवैया—22 से 26 वर्णों तक के चार चरणों वाले छंद सवैया कहलाते हैं। इसके 48 भेद बताए गए हैं। उनमें मत्तगयंद, दुर्मिल, मदिरा आदि प्रमुख हैं। मत्तगयंद में 7 भगण और दो गुरु के क्रम में 23 वर्ण होते हैं; जैसे—(मत्तगयंद सवैया का उदाहरण)
ऽ । । ऽ । । ऽ । । ऽ । । ऽ । । ऽ । । ऽ। ऽ। ऽ = 23 वर्ण
केशव ये मिथिलाधिप हैं जग में जिन कीरति बेलि बई हैं,
दान कृपान विधानन सों सिगरी बसुधा जिन हाथ लई है।
अंग छः सातक आठक सों भव तीनहुँ लोक में सिद्धि भई है,
वेदमयी अरु राजसिरि परिपूरनता सुभ जोग भई है।
2. चौपाई—यह एक सम मात्रिक छंद है इसके प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ होती हैं तथा अंत में दो गुरु शुभ माने जाते हैं। जैसे—
ऽ।। ।। ।। । । । । ऽ ऽ । । । । ऽ । । । । । । ऽ ऽ
बंदउ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥
। । । ऽ । । । ऽ । । ऽ ऽ । । । । । । । । । । । । ऽ ऽ
अमिय मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥
3. हरिगीतिका—हरिगीतिका के प्रत्येक चरण में 16/12 के विराम से 28 मात्राएँ होती हैं। यह एक सम मात्रिक छंद है; यथा—
ऽ ऽ। । । । । ऽ। । । ऽ । । ऽ। ऽ ऽ। ऽ
अन्याय सहकर बैठ रहना, यह महा दुष्कर्म है,
न्यायार्थ अपने बंधु को भी, दंड देना धर्म है।
इस बात पर ही पांडवों का, कौरवों से रण हुआ,
जो भव्य भारतवर्ष के, कल्पांत का कारण हुआ।
4. बरवै—यह एक अर्द्धसम मात्रिक छंद है इसके पहले और तीसरे चरण में 12-12 तथा दूसरे और चौथे चरण में 7-7 मात्राएँ होती हैं; जैसे—
। । । । ऽ । । । । । ऽ । । ऽ । = 12+7
अवधि शिला का उस पर, था गरु भार। = 19 मात्राएँ
तिल तिल काट रही थी, दृग जल धार॥
5. सोरठा—यह अर्द्ध-सम मात्रिक छंद है, इसके पहले एवं तीसरे चरण में 11-11 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में 13-13 मात्राएं होती हैं, यह दोहे का उल्टा होता है, जैसे—
। । ऽ ।। ऽ ऽ । ऽ । । ऽ ऽ । । । ऽ
सुनि केवट के बैन, प्रेम लपेटे अटपटे
।। ऽ । । ऽ ऽ । । । । ऽ । ऽ । । । । ।
बिहसे करुणाएन, चितह जानकी लखन तन॥
6. कुंडलिया—दोहा और रोला छंद को मिलाने से कुंडलिया छंद बनता है प्रथम दो पंक्तियाँ दोहा छंद की तथा अंतिम चार पंक्तियाँ रोला छंद की होती है, इसमें चौथा चरण पाँचवें चरण में यथावत् आता है। इस प्रकार इसकी प्रत्येक पंक्ति 24-24 मात्राएँ होती हैं; जैसे—
। । । । । । । । ऽ । ऽ ऽ । । ऽ ऽ ऽ ।
कृतघन कबहुँ न मानही, कोटि करौ जो कोय।
सरबस आगे राखिए, तऊ न अपनी होय।
तऊ न अपनी होय, भले की भली न माने।
काम काड़ि चुप रहे, फेरि तिहि नहिं पहिचाने।
कह गिरधर कविराय, रहत नित ही निर्भय मन।
मित्र शत्रु न एक, दाम के लालच कृतघन।
7. छप्पय—यह छंद रोला एवं उल्लाला नामक दो छंदों को मिलकर बनता है। इसमें छः चरण होते हैं। पहले चार चरण रोला छंद के तथा अंतिम दो चरण उल्लाला छंद के होते हैं। यह एक विषम मात्रिक छंद है; जैसे—
ऽ ऽ । । । । । ऽ । । । । । । । । ऽ । । ऽ = 24 मात्राएँ (रोला)
नीलाम्बर परिधान, हरित पट पर सुन्दर है,
सूर्य चन्द्र युग मुकुट मेखला रत्नाकर है।
नदियाँ होम प्रवाह, फूल तारे मण्डन हैं,
बन्दीजन खगवृन्द, शेषफन सिंहासन है।
। । ऽ । । ऽ । । ऽ । ऽ । । ऽ ऽ । । ऽ । ऽ = 15+13= 28 मात्राएँ (उल्लाला)
करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेश की,
हे मातृभूमि! तू सत्य ही, सगुण मूर्ति सर्वेश की।
- पुस्तक : अलंकार पारिजात (पृष्ठ 113)
- रचनाकार : नरोत्तमदास स्वामी
- प्रकाशन : अरिहन्त प्रकाशन
- संस्करण : 2023
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