पिंटी का साबुन

संजय खाती

पिंटी का साबुन

संजय खाती

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    हमारे गाँव में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। साबुन का नाम हमने और दूसरे लोगों ने सुना ज़रूर था, लेकिन दो-चार ही लोग ऐसे मिलेंगे जिन्होंने उसे सचमुच देखा हो। 'साबण' का नाम भी लोगों को मालूम था तो सिर्फ़ फ़ौजियों की बदौलत और थोड़ा इसलिए भी कि जब एक बार डिप्टी साहब की बिटिया पिंटी गाँव आई थी तो उसके पास कुछ औरतों ने यह चीज़ देखी थी। कहते हैं, पिंटी जहाँ खड़ी हो उससे एक कोस दूर तक फूलों की-सी बास महकती थी। दस-पंद्रह साल बाद भी लोगों को वह पिंटी याद रही तो इसी वजह से। लोग साबुन का ज़िक्र इत्र और फुलेल के बाद करते थे।

    पिंटी तो ख़ैर जैसे दूसरी दुनिया से आई जीव थी। गाँव के किसी आदमी के पास कभी साबुन नहीं देखा गया। सच्चे अर्थों में गाँव में पहले साबुन आया मेरे पास और वह भी अचानक, अप्रत्याशित रूप से।

    उस दिन पंद्रह अगस्त या ऐसा ही कुछ ख़ास दिन रहा होगा, क्योंकि स्कूल बंद था। मैं और काका आलू बेचने के लिए कई कोस चलकर क़स्बे में आए थे। काका मुझसे पाँच-सात साल ही बड़ा होगा। हम दोनों लगभग दोस्त जैसे ही थे। हालाँकि कभी-कभी वह बड़प्पन जताने को उत्सुक हो जाता था, लेकिन उसका कोई दबादबा मुझ पर नहीं बन पाया।

    तो, क़स्बे की रौनक़ से हम लोग लेमनचूस चाटते भटक रहे थे कि एक भीड़ भरे मैदान में जा पहुँचे, जहाँ बिलकुल मेला-सा लगा था। ख़ूब शोर हो रहा था। सीटियाँ बज रही थीं। एक भोंपे से किसी आदमी की ज़ोरदार आवाज़ रही थी, जैसे डाँट रहा हो।

    हम अचकचाए-से और बिलकुल बेध्यानी में उस भीड़ में घुसे जा रहे थे कि अचानक मैंने पाया, मैं अपने जैसे लड़कों की एक क़तार में खड़ा हूँ। किसी ने बाँह पकड़कर जल्दी से मुझे वहाँ खड़ा कर दिया था। एक आदमी सबको सफ़ेद लाइन पर खड़ा कर रहा था। मेरे दोनों ओर लड़के चिल्ला रहे थे, झपटने की मुद्रा में बार-बार एक टाँग पर झुके जा रहे थे। लगा, जैसे कोई दौड़ होने जा रही हो।

    पहले तो मैं घबरा गया। इधर-उधर देखा तो काका का कहीं पता ही नहीं। लाठी वालों ने बाक़ी भीड़ के साथ उसे भी धकिया दिया होगा। अब भोंपू पर गिनती गिनी जा रही थी, एक...दो...

    और तीन! भूखे जानवरों की तरह सब भागे। साथ में मैं भी। पहले तो सूझा ही नहीं, पर जब देखा कि बग़ल वाला छोकरा अपनी सीकियाँ टाँगें पटकता आगे निकला जा रहा है तो मैं भी भाग लिया दम तोड़कर। ऐसा कि मैदान के दूसरे छोर पर बँधी रस्सी में उलझकर गिर पड़ा। घुटने में लगी सो अलग। झाड़कर खड़ा हुआ तो तालियाँ। चमचमाती डिबिया थमा दी।

    भीड़ में जाने कहाँ से काका हँसता हुआ प्रकट हो गया। अब हम दोनों साथ-साथ हँसे जा रहे थे। मेरा मन हो रहा था कि अभी ख़ूब दौडूँ, दौड़ता ही जाऊँ, आगे-आगे कुलाँचें भरता मैं भागा तो काका भी हाँफता हुआ आया पीछे-पीछे। क़स्बा पीछे छूट गया। मैं गाँव की ओर सरपट भागा जा रहा था। काका आवाज़ देने लगा। आख़िर में नदी के पास मैं रुका तो उसने मुझे पकड़ लिया।

    काका ने कहा, “क्या है रे?

    तब जाकर मुझे ख़याल आया कि वह लाल चमकती डिबिया मेरे हाथ में है। काका ने झट से उसे छीन लिया और उलट-पलटकर देखने लगा। उसी को सबसे पहले सूझा कि ये तो साबण है। उसका चेहरा उत्तेजना से चमकने लगा। वह बार-बार उसे सूँघता। माँगने पर भी नहीं देता। चिढ़कर बोलता, “खा नहीं रहा हूँ।” उसकी नीयत में खोट लगता था।

    मैं भड़क गया, आख़िर वह मेरी चीज़ थी। मैंने काका से उसे छीनने की कोशिश की। उसे गिराने के लिए संघर्ष किया, लेकिन लंबे खडूस से जीतना मेरे लिए नामुम्किन ही था। अब तक उसने बाहर की चमकीली पन्नी भी खोल दी थी और अंदर की गुलाबी नाज़ुक टिकिया निकाल ली थी।

    अंतिम हथियार के तौर पर मैं धप से नदी के पत्थरों पर गिर गया और धाड़ मारकर सचमुच रोने लगा, “मैं इजा से कह दूँगा, हाँ!

    हमेशा की तरह इस बार भी मेरी चाल कामयाब हुई। काका कुछ देर मुझे लाल आँखों से घूरता रहा, फिर “जा मर” कहकर टिकिया फेक दी। मैंने उसे लपक लिया। “पन्नी भी दे।” काका ने पन्नी भी फेंक दी। मैंने नाज़ुक टिकिया को फिर पन्नी में जतन से लपेटा और उसे सूँघता, हँसता हुआ घर की ओर चला।

    काका से पहली बार गहरी दुश्मनी की यह शुरूआत थी। उस वक़्त तो मैं साबुन की उस भीनी ख़ुश्बू में इतना मगन था कि काका की ओर ध्यान देने का वक़्त नहीं था मेरे पास, लेकिन आगे चलकर हम दोनों की दुश्मनी स्थायी बात हो गई।

    बहरहाल, उस शाम काका पीछे-पीछे, पत्थरों को ठोकर मारता हुआ चला। घर पहुँचते ही मुँह टेढ़ा कर उसने ऐलानिया अंदाज़ में कहा, “गोपिए को एक साबण क्या मिल गया, नीचे ही नहीं देख रहा आज।”

    इजा गोबर समेट रही थी, खड़ी होकर बोली, “साबण! कहाँ से लाया रे? कैसा है? दिखा तो।”

    “मेरा है।” मैंने तुनककर कहा।

    इजा हाथ ख़ूब साफ़ से धोकर आई। “दिखा तो, मैं भी देखू कैसा साबण है।”

    मुझे अब तक किसी पर एतिबार नहीं रह गया था। बहुत नख़रे के साथ उँगलियाँ खोलीं। इजा ने बड़े शौक़ के साथ साबुन लिया। ढिबरी के पास जाकर ग़ौर से देखा। दो-तीन बार सूँघा, बोली, “मैं नहाऊँगी इससे।

    मैं चील की तरह झपटा। साबुन झपटकर अंदर की जेब में ढूँसा। भागकर खड़ा हुआ बीस क़दम दूर। इजा देखती रह गई। “मर तू! आग लगे तेरे साबण को!” उसने चिचियाकर कहा और आँखें तरेरती हुई वहाँ से चली गई।

    इस तरह माँ मेरी दूसरी दुश्मन बनी। असल में साबुन की इस महत्ता को मैं पहले समझ ही नहीं पाया। शायद समझने की उम्र थी भी नहीं, लेकिन जल्द ही मुझे लगने लगा मानो मैं चारों ओर से दुश्मनों से घिर गया हूँ। मुझे मालूम था, काका मेरी हर चीज़ को उलट-पलटकर देखता है घर में जितने भी कनस्तर-डिब्बे हैं, सबको उसने टटोला है, यहाँ तक कि गोशाला की घास-पुआल को भी वह छान आया है, लेकिन साबुन कहाँ है, यह मेरे अलावा कोई नहीं जान सका था।

    हारकर काका ने मेरी चापलूसी करने की भी कोशिश की, लेकिन अब मैं उतना भोला नहीं रह गया था।

    बापू को तो साबुन देखना नसीब ही नहीं हुआ। इजा और काका ने हर वक़्त साबुन का ज़िक्र करके उनको इतना उकसा दिया था कि वे मारपीट पर उतर आए। पर अब तक मैंने जान लिया था कि जो भी साबुन देख लेगा, उसकी नीयत में खोट जाएगी। सो मैं भी टस से मस नहीं हुआ। हारकर बापू ने यह कहते हुए कि बहुत इतर-फुलेल का शौक़ चढ़ा है, भेज दो साले को गाय चराने, मुझे कसकर दो लातें मारीं।

    मैं रोया नहीं और इस अपमान को पी लिया। लेकिन इस घड़ी से मुझे संदेह होने लगा कि मैं उनका असली बेटा हूँ भी या नहीं।

    कुंती को अलबत्ता एक दिन मेरी सख़्त पहरेदारी में साबुन को छू-सूँघकर देखने का मौक़ा मिला। कुंती तब से आँखें बड़ी-बड़ी किए पीछे-पीछे डोलती रहती है। उसे भगाने के लिए झापड़ों के अलावा कोई रास्ता नहीं होता।

    इतने लोगों के बीच साबुन को बार-बार देख पाना मेरे लिए भी मुश्किल हो रहा था। मेरी बेचैनी लगातार बढ़ रही थी। हर दिन पहाड़-सा लगता। आख़िरकार इतवार को जी कड़ा कर मैंने साबुन निकाल ही लिया और गर्म पानी लेकर नहाने बैठा।

    यह साबुन से मेरा पहला स्नान होने जा रहा था। मैंने बड़े प्यार से पन्नी अलग की। एहतियात से धूप में रखे साबुन को नरमी से दाएँ हाथ में पकड़ा और भीगे बालों को हौले-हौले छुआ।

    गुलाबी टिकिया पर उभरे हुए अक्षर बने थे। मुझे अंग्रेज़ी पढ़नी नहीं आती थी, लेकिन यह जो कुछ भी लिखा था, इससे साबुन की ख़ूबसूरती बढ़ रही थी। वे मिटें नहीं, इसका ख़याल रखना था।

    काका कहने को तो चाख में बैठा पढ़ाई कर रहा था, लेकिन बार-बार उसका सिर खिड़की से दिखाई दे जाता। फिर ज़ोर-ज़ोर से किताब पढ़ने की आवाज़ आती। इजा घास को जाती बीच आँगन में रुक गई। कुछ देर देखती रही। फिर मुँह बिचकाकर चली गई। कुंती दो क़दम दूर आकर खड़ी हो गई और मेरे बालों पर फिसलते साबुन को, उससे बनते सफ़ेद झाग को और धूप में चमकते कई रंगों के बुलबुलों को एकटक देखती रही। “भाग, भाग!” मैं चिल्लाया।

    कुंती चिरौरी करने लगी, “दादा, मुझे भी दे दे थोड़ा-सा।”

    कुंती को मैं अच्छी तरह जानता था। बिल्ली की तरह धूर्त। उसे भगाने में ही भलाई थी। पहले तो मैंने उस पर पानी फेंका। नहीं हटी तो भीगे हाथ से दिया एक झापड़। इधर चिल्लाती हुई कुंती भागी, उधर सीढ़ियों पर धड़धड़ाता हुआ आया काका। “उस पर हाथ चलाया तूने? आज तो तेरी ख़ैर नहीं!” पर मुँडेर से आगे नहीं बढ़ा। वहीं रुककर घूरने लगा। मैं बहुत दूर था। मज़े से हँसता झाग उठाता रहा। काका गालियाँ देता रहा, लेकिन वहाँ से हटा भी नहीं।

    बड़ी देर लगाकर पानी डाला बदन पर। साबुन को सुखाया। नामालूम-सा घिसा था। पन्नी में सँभालकर रखा। इतराता हुआ काका के बग़ल से निकला। काका ने हवा को सूँघा।

    कैसी तो ताज़गी गई थी बदन में! कैसे ख़ुश्बू! और बाल कैसे नर्म! ख़ुश्बू कहीं उड़ जाए यह सोचकर फटाफट कपड़े पहने।

    अपने आँगन की मुँडेर से मैं छलाँग लगाता और कई बार ऐसा होता कि मैं उड़ने लगता। ऊँचे और ऊँचे पहाड़ों के ऊपर मैं कबूतरों की तरह तैरता जाता। दूर-दूर तक जाने कितने देश, कितने गाँव एक साथ मेरे नीचे सरकते जाते। बदन में सनसनी सी होने लगती। नीचे देखता तो अपना घर छोटा-सा दिखाई देता—खिलौने जैसा। और इजा, बापू, काका, कुंती, सारे लोग कैसे दिखाई देते? जैसे चींटी जितने को गए हों। मैं सारी दुनिया के ऊपर तैरता। सब कुछ मेरे नीचे। कोई मुझ तक नहीं पहुँच सकता था।

    यह सपनों की बात थी। कहते हैं कि बढ़वार के दिनों में बच्चों को उड़ने के सपने दिखाई देते हैं लेकिन, सपने सच नहीं होते, यह किसने कहा!

    साबुन से नहाकर उस दिन मुझे लगा था, किसी भी क्षण मैं उड़ने लगूँगा।

    स्कूल का दिन था। सुबह-सुबह ख़ूब झाग उठाकर ख़ुद को चमकाया। महकते बदन पर सबसे अच्छे कपड़े डाले। टेढ़ी करके माँग निकाली और रास्ते-भर कुहनी उठाकर सूँघता रहा कि कहीं ख़ुश्बू उड़ तो नहीं गई। नहीं, ख़ुश्बू उड़ती नहीं थी। घंटों बनी रहती। अगर धूप नहीं होती, पसीना नहीं होता, धूल नहीं उड़ती और हवा नहीं चलती तो शायद बदन हमेशा महकता रहता।

    क्लास में तो सनसनी ही फैल गई। थोड़ी ही देर में सब लड़के नाक उठाए बौराए-से हवा को सूँघ रहे थे। मैं कुछ देर मंद-मंद मुस्कुराता इसका आनंद लेता रहा फिर पास वाले लड़के के मुँह पर अपनी बाँह अड़ा दी।

    बबा हो! क्या लगा के आया है?” लड़का तो उछल ही पड़ा। क्लास में ऐसी रेलपेल मची कि तौबा! लड़के एक-दूसरे को धकियाते लपके और जहाँ-तहाँ नाक गड़ाकर लगा सूँघने। जो सूँघ चुके थे वे आँखें कपाल पर चढ़ाकर कहने लगे, “बता तो, बता तो!

    और जब मैंने मज़े ले-लेकर सारी कहानी सुनाई तो क्लास में शोर मच गया। सच? कैसा है? साथ में पन्नी भी है? एक दिन तो ख़त्म हो जाएगा, फिर? फिर क्या, और दौड़ेगा तो नया जीत लाएगा। एक साल तो चलेगा ही, दिखा यार, दिखा ना!

    मास्साब आए तो हंगामा थमा, लेकिन किसी का ध्यान पढ़ाई की ओर नहीं था। सब कनखियों से मुझे देख रहे थे। मैं तो आकाश में ख़ूब ऊँचा उड़ रहा था। उस पल अगर मैं कह देता कि आज से मानीटर मैं हुआ तो वे सब कहते—हाँ, हुआ। उन्होंने अपने बाप-दादों से इतना कुछ सुना था पिंटी के बारे में, उसके साबुन के बारे में। आज वे सब सपने जैसी कथाएँ सच होती देख वे लगभग पागल-से हो उठे थे।

    हाफ़ टाइम की घंटी बजी। हमेशा की तरह भाग पड़ने को लड़के उठे। अचानक सबके सब ठिठक गए। मैं वहीं बैठा जो था अपनी जगह। “चल रे, चला” आज सब मेरे क़रीब आना चाहते थे। वे भी जो मेरे दुश्मन थे और दुबले-पतलेपन की वजह से मुझे पीटा करते थे।

    मैं उठा तो, लेकिन एक अनजानी झिझक ने मुझे घेर लिया। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। पहले तो सबसे पहले भाग छूटने वालों में मैं अव्वल रहता था, लेकिन पहले कभी सारे लड़कों ने मुझे घेरकर ऐसे 'चल, चल' भी नहीं कहा था।

    “तू हमारी तरफ़ हुआ।”—नहीं, हमारी तरफ़ कबड्डी में मैं किस टीम के साथ खेलूँ, इसे लेकर भारी झगड़ा चल पड़ा था।

    मैं तो संकोच से मरा जा रहा था। कबड्डी में रगेदे जाने का, मिट्टी में लिपटने का डर मुझ पर हावी हो गया। “नहीं, मेरा मन नहीं है खेलने का।” मैंने कहा।

    “क्यों? क्यों?” हर तरफ़ से पुकार मच गई। फिर अपने आप जैसे सब लड़के समझ गए। “अच्छा तू रेफरी हुआ। तू बैठकर देख।” वे एक-एक कर खिसकने लगे, खिसियाए हुए।

    हर कोई साबुन देखने को बेकल था। सारे गाँव में जंगल की आग की तरह यह बात फैल गई थी। लोग मुझे रोक लेते, कोई बहाना खोजकर घर चले आते। वे चाहते कि मैं उनको साबुन दिखा दूँ। जब मैं इनकार कर देता तो वे नाराज़ हो जाते। डाँट-डपट करते। अलबत्ता वे मुझे सूँघ ज़रूर लेते। साबुन दिखाने की मेरी इस ज़िद से घरवालों को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता होगा। बाद में मुझे वे अपनी गालियों का निशाना बनाते। काका जब भी सामने आता धमकी भरे इशारे करता। दो-एक बार तो उसके अकेले में मेरा गला भी दबाया। कुंती हमेशा मुँह फुलाए रहती। उससे मेरी झड़प हो जाए तो बापू मुझे अपने ढाई किलो के हाथ से झापड़ मारने में ज़रा देर नहीं करते। इजा मुझसे हमेशा चिड़चिड़ाते हुए बात करती।

    सारी दुनिया गिद्धों की तरह मेरे उस छोटे-से सुख को नोचने के लिए बेताब थी। मैंने देखा कि पहले तो लोग मेरी इज़्ज़त करने लगते, लेकिन जब मैं उनको साबुन नहीं दिखाता तो वे फ़ौरन मेरे ख़िलाफ़ लामबंदी कर लेते। लगभग सभी मेरे दुश्मन हो चुके थे।

    लोगों ने मेरा नाम ही पिंटी रख दिया था। यह सिर्फ़ मज़ाक़ नहीं था। इस तरह वे अपनी नफ़रत जता रहे होते। लड़के मुझे 'पिंटी-पिंटी' कहकर पुकारते। और हैरानी की बात तो यह कि इस बात से मुझे तकलीफ़ होने के बावजूद मैं अकसर उस पिंटी के बारे में सोचने लगा था। मैं सोचता कि वह कैसी और कहाँ होगी। मैंने मन में उसका एक ख़ाका भी खींच लिया था, जिस पर मैं अपनी ख़ाली वक़्त में रंग भरा करता था। मेरे ख़याल से वह हमारे कैलेंडर की लक्ष्मी जैसी थी। वह इतनी गोरी थी और उसके कपड़े इतने चमकीले थे कि रात में भी उसके आसपास उजाला रहता था। उस पर धूल का एक कण भी नहीं बैठ सकता था। वह इतनी हल्की थी मानो उसे सफ़ेद कोरे काग़ज़ से बनाया गया हो।

    और खेलना तो मैंने छोड़ ही दिया था। कुछ लड़के मेरे क़रीब होना चाहते, लेकिन जल्दी ही धमाचौकड़ी का आकर्षण उनको खींच ले जाता। जब लड़के हुड़दंग मचा रहे होते, तब मैं दीवार पर बैठा टाँगे हिलाता रहता। वे कबड्डी में एक-दूसरे को रगेदते, गीले खेतों में घुसकर ककड़ियाँ खोजते, चोरी से नीबू तोड़ लाते, नदी में नंगे होकर नहाते, पिरूल में फिसलते। वे हमेशा की तरह चीख़ते-चिल्लाते, गुत्थमगुत्था होते, कपड़े फाड़ लेते या बदन छिला लेते। मैं बैठे-बैठे उनको देखता और उँगलियाँ चटख़ाता।

    सच कहूँ तो कई बार मेरी इच्छा हुई कि मैं उनके बीच कूद पडू, जब भी ऐसा करने को हुआ, जाने किस बात ने मेरे शरीर को जड़ कर दिया। तब मैंने चाहा कि कोई लड़का मुझे जबरन घसीटकर कबड्डी के मैदान में धकेल दे, लेकिन शायद यह नहीं हो सकता था। वे तो अब मुझसे खेलने को कहते भी नहीं थे। उन्होंने मान लिया था कि पिंटी का काम बैठकर उनको देखते रहना है। वे मेरा अस्तित्व ही भूलने लगे थे।

    अब फिर काका बाज़ार जा रहा था। सामान लाने के लिए थैले-झोले समेट रहा था। मुझसे रहा नहीं गया, कहा, “मैं भी चलूँगा।

    काका एकदम भड़क गया, “तू नहीं जाएगा मेरे साथ।

    मैं जाऊँगा।

    “भाभी!” काका ने ऐलान किया, “इसी से मँगा ले अपना सामान, मैं नहीं जा रहा।”

    इजा बाघिन की तरह झपटती आई। मेरा कान पकड़कर पटक दिया ज़मीन पर। “आज करती हूँ मैं इसका इलाज। ज्यों-ज्यों बढ़ रहा है, त्यों-त्यों सड़ रहा है।” मेरी पीठ पर दो लातें मारी और घसीटती हुई ले चली बाहर।

    पीछे से काका उल्लास से चिल्लाया, “ज़रा अच्छी तरह से कर दो मरम्मत पिंटी की

    इजा मुझे मरे चूहे की तरह घसीटती मुंडेर पर ले गई और धकेल दिया बिच्छू के झाड़ पर।

    “ओऽइऽऽजाऽऽवेऽ!”

    मोह का एक पतला सा धागा भर बचा था। टूट गया वह उस क्षण। हाफ़ टाइम में दीवार पर बैठे मेरी आँखें बार-बार भर आतीं। कूदते फाँदते लड़के नज़र में काँपने लगते। बिच्छू के काँटों से बदन अभी भी चिलचिला रहा था। कोहनियाँ छिली हुई। बालों में धूल। नहाया था उस सुबह भी, लेकिन बदन में कोई ख़ुश्बू बाक़ी नहीं।

    मन खुलकर रो पड़ने को कर रहा था। जाऊँ, चला जाऊँ यहाँ से। हमेशा के लिए वहाँ, जहाँ पिंटी रहती है। वहाँ लोग ऐसे नहीं हैं। वहाँ नफ़रत नहीं है। बिना बात के ऐसा ज़ुल्म नहीं है।

    और मैंने फ़ैसला किया कि एक दिन मौक़ा मिलते ही बाज़ार भाग जाऊँगा। कहते हैं, वहाँ से दूर-दूर को बसें जाती हैं। किसी में बैठ जाऊँगा, फिर कभी नहीं लौटूँगा यहाँ। कभी नहीं।

    उस वक़्त से यह इरादा मेरे मन में हर पल पक्का होता गया। मैंने कपड़े चुन लिए जो साथ ले जाने थे। एक झोला भी उनके लिए छिपा लिया। कुछ अखरोट भी रख लिए और देख लिया कि रुपये कहाँ से निकाले जा सकते हैं। मुझे बस मौक़े का इंतिज़ार था।

    और ऐसे में वह काँड हो गया।

    मैं नहा रहा था। कैसी भी ठंड हो, मैं नहाए बिना नहीं रहता। मुझे मालूम नहीं था कि काका घात में हैं। मैंने साबुन अलग रखा कि वह बिल्ली की तरह झपटा। मैं सकते में। काका का हाथ साबुन पर पड़ा। उठा भी लेता कि साबुन फिसलकर दूर जा गिरा और तब तक मैंने आँखें भींचकर पीतल का भारी लोटा दे मारा।

    काका 'हाय' कहता चकराकर बैठक गया और सिर पकड़े वैसे ही रह गया।

    तब तक मैंने साबुन उठा लिया और लोटा पकड़कर फिर से तैयार हो गया। पर काका तो उठा ही नहीं। तब मेरी टाँगें काँपने लगीं। काका को हिलाकर पुकारा, “काका, काका!

    कराहकर काका ने सिर उठाया तो देखा, माथे से एकदम लाल-लाल ख़ून बह रहा था। “मार दी साले!” काका जाने क्या-क्या बड़बड़ाने लगा। फिर हाथों से माथा दबाए लड़खड़ाता हुआ बाहर चला। देहरी के पास रुककर मुड़ा। रुआँसा चेहरा। गालों पर ख़ून और आँसूओं के धारे। सिसकता हुआ बोला, “साले, एक दिन तो ख़त्म हो जाएगा तेरा साबण।

    काका चला गया। मैं सन्न खड़ा रहा। हथेली खोलकर देखा। गुलाबी ख़ूबसूरत टिकिया। पर अब कितनी पतली लग रही थी। और ख़ुश्बू भी तो शायद उड़ गई थी।

    मेरा मन डूब गया।

    रोने का वक़्त नहीं था। फटाफट कपड़े पहन भागता हुआ गया ऊपर। झोला निकाला, कुछ कपड़े ठूँसे। अखरोट रखने का वक़्त नहीं। बस्ता? नहीं, बस्ते का क्या काम? पैसे?

    तभी सुना, बाहर काका घबराई हुई इजा को बता रहा था कि कैसे वह गोठ में गोबर पर फिसल गया और कैसे उसका सिर देहरी से टकराया।

    मुझे फिर खड़ा नहीं रहा गया। औंधे मुँह चारपाई पर गिर पड़ा। बड़ी देर बाद इस क़ाबिल हुआ कि जाकर साबुन को उसकी जगह छिपा आऊँ। लौटकर एक अँधेरे कोने में सो रहा। शाम हो गई। तो भी नहीं उठा। कहा कि पेट में दर्द है।

    सुबह उठा तो देखा, अजीब-सा उजाला सब ओर फैला है। रातोंरात बर्फ़ गिर गई थी। पता ही नहीं चला। आशंका से मेरा दिल बैठ गया।

    ताज़ी बर्फ़ पर नंगे पाँव भागता गया। ठंड की परवाह किसे थी! पुआल के ढेर पर चार-चार अंगुल बर्फ़ जमी थी। यहीं कहीं थी वह सेंधा हाथों से बर्फ़ खोदी तो नीचे कीचड़ ही कीचड़। हाथ सन गए। यहाँ नहीं, यहाँ नहीं! यहाँ भी नहीं!

    कोई लिसलिसी-सी चीज़ उँगलियों में आई। गुलाबी कीचड़ का एक लोंदा, ख़ुश्बूदार। उस लोंगे को हथेली में भरे मैं वहीं बर्फ़ पर धप से बैठ गया। शीत से काँपता हुआ।

    “गोपिया!” यह इजा थी। दूध लगाने आई थी। मैंने सिर उठाकर देखा। उसी उपहास के लिए सिकड़ते हुए उसके होंठ। मेरे हाथ में लोंदा गिर गया। माँ के होंठों से एक सिसकी-सी निकली, “गोपिया!”

    पाँवों से सिर तक एक थरथराहट के साथ मैं बिखर गया। पूरे प्राण से अपने को फूट पड़ने की छूट देता हुआ। कीचड़-सनी उँगलियों से माँ को जकड़ता हुआ ज़ोर से रो पड़ा।

    माँ भी वहीं मेरे पास बैठ गई। मुझे कौली में भरकर। और मैं कोख की गरमाहट में मुँह छिपाकर रोता रहा। बहुत दिनों बाद पहले की तरह।

    और सहसा मुझे लगा, बर्फ़ का एक विशाल ढेर पिघल रहा है। मेरा मन रुई की तरह हल्का और हल्का होने लगा। उस क्षण हवा का कोई झोंका आता तो मैं सचमुच ही उड़ने लगा होता।

    स्रोत :
    • पुस्तक : श्रेष्ठ हिन्दी कहानियाँ (1990-2000) (पृष्ठ 93)
    • संपादक : उमाशंकर चौधरी-ज्योति चावला
    • रचनाकार : संजय खाती
    • प्रकाशन : पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस प्रा. लिमिटेड

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