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भोगी के दिन अभ्यंग स्नान करि
परमानंद दास
मति गिरि! गिरै गोपाल के करते
मति गिरि! गिरै गोपाल के करते।अरे भैया ग्वाल लकुटिया टेकी अपने अपने कर के बलते॥
परमानंद दास
दिन दिन होत कंचुकी गाढी
अति भय भीत उरोज भुजन पर मोहन मूरति चाढी।'गोविंद' प्रभु मिलिने के कारन निकलि करारे ठाढी॥
गोविंद स्वामी
जमुना सी नाहिं कोऊ और दाता
जमुना सी नाहिं कोऊ और दाता।जेइ इनकी सरन जात हैं दौरि के ताहि कों तिहि छिनु करी सनाथा॥
गोविंद स्वामी
भोर और बरखा
नन्हीं-नन्हीं बूँदन मेहा बरसे, शीतल पवन सुहावन की।मीरा के प्रभु गिरधर नागर! आनंद-मंगल गावन की॥
मीरा
बैठे लाल कालिंदी के तीरा
समाचार सुनिये श्रीमुख के जो कहे श्याम शरीरा।तिहारे कारन चुन चुन राखे यह निरमोलक हीरा॥
परमानंद दास
राधा स्याम के संग बनी
अंग-अंग सौं मिलि कै गाढे, नील कंचन तनी।छीतस्वामी गिरिधरन के संग सोहै और घनी॥
छीतस्वामी
मधुकर! करहु और कछु बात
सुरति भई हरि के बिछुरन की, मन मिलिवे अकुलात।नातरु देखि देखि लीला भुवि, आनंद उर न समात॥
गोस्वामी हरिराय
ब्याह की बात चलावत मैया
ग्वाल बाल सब बरात चलेंगे और चलें बल भैया।परमानंद नंद के आनंद हंसि हंसि लेत बलैया॥