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साँझ की शायरी
साँझ की शायरी गाने बैठातुम्हारा प्राचीन चाँद राह भटकता बंगोप सागर में
गिरिजा कुमार बलियार सिंह
अंधा रे जग अंधा
बेद किताब कुछ नहीं माने, प्यारी का सब धंदा।कहत है माधोनाथ गुसाईं, निर्मल फ़क़ीर चंदा॥
मध्व मुनीश्वर
ऐसा कहूँ नहीं जी परबंदा
ऐसा कहूँ नहीं जी परबंदा, छोड़े सब ही धंदा।कितवे सेंवी मुलुक गवायां, कुफ़र में डूबा अंधा।
मध्व मुनीश्वर
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मन श्रीराधाकृष्ण-धन ढूँड़ौ
मन श्रीराधाकृष्ण-धन ढूँड़ौ।नहिं तौ परिहौ भवसागर में मिलत न पंथ भेद अति ऊँड़ौं।
किशोरीदास
एक कोई काम अच्छे से नहीं होता गुरू
हर किसू का पार्लर लेकिन हुसुन हईयै नहींशायरी बर्बाद फ़र्नीचर भया ज़्यादा गुरू
संजय चतुर्वेदी
और राष्ट्रभक्ति थी
हमारा राष्ट्र टाई पहनकर इम्तिहान देने जाएगाइम्तिहान में शायरी पढ़कर ज़ीरो नंबर लाएगा
आयुष झा
जब चले जाएँगे हम लौट के सावन की तरह
जिसमें इंसान के दिल की न हो धडकन 'नीरज'शायरी तो है वो अख़बार के कतरन की तरह।