सिरि-थूलिभद्द फागु (तृतीय भास)

जिन पद्म सूरि

सिरि-थूलिभद्द फागु (तृतीय भास)

जिन पद्म सूरि

और अधिकजिन पद्म सूरि

    अइ सिंगारू करेइ वेस मोटइ मन-ऊलटि

    रइय (?) अंगि बहु-रंगि चंगि चंदण-रस-ऊगटि॥

    चंपक-केतकि-जाइ-कुसुम सिरि खुंप भरेई

    अति-अच्छउ सुकुमाल चीरू पहिरणि पहिरेइ॥१०॥

    लहलह-लहलह-लहलहए उरि मोतिय-हारो

    रणरण-रणरण-रणरणए पगि नेउर-सारो॥

    झगमग-झगमग-झगमगए कानिहिं वर कुंडल

    झलहल-झलहल-झलहलए आभणाहं मंडल॥११॥

    मयण-खग्गु जिम लहलहए जसु वेणी-दंडो

    सरलउ तरलउ सामलउ (?) रोमावलि दंडो॥

    तुंग पयोहर उल्लसइ [जिम] सिंगारथवक्का

    कुसुम-वाणि निय अमिय-कुंभ किर थापाणि मुक्का॥१२॥

    कज्जलि-अंजिवि नयण जुय सिरि सइँथउ फाडेई।

    बोरीयोवडि-कंचुलिय पुण उरमंडलि ताडेइ॥१३॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : आदिकाल की प्रामाणिक रचनाएँ (पृष्ठ 150)
    • संपादक : गणपति चंद्र गुप्त
    • रचनाकार : जिन पद्म सूरि
    • प्रकाशन : नेशनल पब्लिशिंग हॉउस
    • संस्करण : 1976

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