सिरि-थूलिभद्द फागु (पंचम भास)

जिन पद्म सूरि

सिरि-थूलिभद्द फागु (पंचम भास)

जिन पद्म सूरि

और अधिकजिन पद्म सूरि

    अह नयण कडक्खिहिं आहणए वांकउ जोवंती

    हाव-भाव सिंगार-भंगि नवनविय करंति॥

    तहवि भीजइ मुणि-पवरों तउ वेस बोलावइ

    तवणतुल्लु तुह विरह, नाह! मह तणु संतावइ॥१८॥

    बारहँ वरिसहँ तणउ नेहु किणि कारणि छंडिउ

    एवडु निट्ठुरपणउ काइँ मू-सिउँ तुम्हि मंडिउ॥

    थूलि भद्द पभणेइ वेस! अइ-खेदु कीजइ

    लोहिहि घडियउ हियउ मज्झ, तुह वयणि भीजइ॥१९॥

    ‘मह विलवंतिय उवरि, नाह! अणुराग धरीजइ

    एरिसु पावस-कालु सयलु मूसिउँ माणीजइ'॥

    मुणिवइ-जंपइ ‘वेस! सिद्धि-रमणी परिणोवा

    मणु लीणउ संजम-सिरोहिं सिउँ भोग रमेवा'॥२०॥

    भणइ कोस ‘साचउँ कियउँ ‘नवलइ राचइ लोउ’

    मूं मिल्हिवि संजम-सिरिहिं जउ रातउ मुणि-राउ’॥२१॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : आदिकाल की प्रामाणिक रचनाएँ (पृष्ठ 151)
    • संपादक : गणपति चंद्र गुप्त
    • रचनाकार : जिन पद्म सूरि
    • प्रकाशन : नेशनल पब्लिशिंग हॉउस
    • संस्करण : 1976

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