नृत्य वर्णन

पुहकर

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    सुखधाम सखी सब आनि बसीं। घन मै जनु दामिनि रेख धसीं॥

    अंग अंगनी अंग सुरंग रसीं। रितु आगम इंद्र वधू सरसीं॥

    कमलदल लोचन चंद्र मुखी। गज गौनि मरालति वाल सुखी॥

    सुर अप्छरि ते पुरहूत प्रिया। नव वैस उठंत उरोज हिया॥

    कबरी सिर स्याम बनाइ गुही। मिलि मुत्तिय चंदन माल छुही॥

    धँसि कुंकुम खौरि जो भाल रची। जिय मध्य विराजन आइ सची॥

    मकराकृत कुंडिल हीर जरे। जुग भान मनौ अहँकार भरे॥

    नव मुत्तिय बेसरि यौं लटकै। मनु देखत देवनि कौ अटकै॥

    मुख सुंदर मध्य तमोल भरे। जु विराजित कंचन मोल जरे॥

    रसना कटि छीन नबीन वजै। नव नूपुर नादि विवादि सजै॥

    पहिरीं कसि कंचुकि हार हियं। नव नागर नृत्य विचार कियं॥

    घन तंतु सुकिन्नर बीन बजै। सुरवील रबाब उपंग सजै॥

    मुरजा धुनि झंझ मृदंग तहाँ। सुर मंदिर ताल विलास जहाँ॥

    रंग भूमि सुरंग बनाइ रची। धरनी जमु कंचन हरि खची॥

    करि मंगल गाइनु गान ठयौ। सुर साधि सुग्राम अलाप लयौ॥

    षटराग अलापहिं संग त्रिया। गुन संगति अंसित इंद्र प्रिया॥

    पौहुप अंजुल पातरु हथ्थ लई। उघटी मुख संगित गत्त नई॥

    तत्थेई तत्येई सुतथ्थरियं। तत थुंगत थुंगतियं॥

    ग्रिडितं क्रिटितं क्रिटितं क्रिटिथा। गृढ़ता थियता थियता थियथा॥

    थिरडा थियतं क्रिततं तकियं। झिझिक्रट झिझिक्रट झंझकियं॥

    थिपि धिधि किमि किनि कै उबटैं। तनु तोरत तार सितार लटैं॥

    कटि किंकनि नूपुर हथ्य बलैं। सुखही गति तोटक छद चलैं॥

    उरमै बिरुपै तिरपै हुरमैं। भ्रमरी रस भंग नही सुरमैं॥

    लग लागत लाग सुडाग फिरैं। अलकै छुटकै तिजु भुंम्मि परैं॥

    गति यौ धर मान नवीन ठवैं। रसना रस नाइक ताल चवैं॥

    पसु पच्छि जे पेवत मौनु गरी। तिनि के जल पानि सुध्यौ बिसरी॥

    ससि कौ रथ चाहत भूलि रह्यौ। सरिता जल फेरि उलट्टि बह्यौ॥

    द्रुम पल्लव अंकुर और भये। किसलै दल रौम प्रगट्ट नये॥

    सुर गंध्रप चित्र समान रहै। कवि पुहुकर पै नहि जात कहै॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : रसरतन (पृष्ठ 127)
    • संपादक : शिवप्रसाद सिंह
    • रचनाकार : पुहकर
    • प्रकाशन : नागरीप्रचारिणी सभा, काशी
    • संस्करण : 1963

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