बारहमासा

नरपति नाल्ह

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नरपति नाल्ह

और अधिकनरपति नाल्ह

     

    (1)

    चालियउ उलगाणउ कातिग मास।
    छोडीया मंदिर घर कविलास।
    छोडीया चउबारा चउषंडी।
    तठइ पंथि सिरि नयण गमाइया रोइ।
    भूष गई त्रिस ऊचटी।
    कहि न सषीय नींद किसी परि होइ॥

    (2)

    मगसिरियइ दिन छोटा जी होइ।
    सषीय संदेसउ न पाठवइ कोइ।
    संदेसइ ही बज पड्यउ।
    ऊँचा हो परबत नीचा घाट।
    परदेसे पर गयउ।
    तठइ चीरीय न आवइ न चालए बाट॥

    (3)

    देषि सषी हिव लागउं छइ पोस।
    धण मरतीय को मत दीयउ दोस।
    दुषि दाधी पंजर हुई।
    धान न भावए तज्या सिरि न्हाण।
    छांहडी धूप नू आलगइ।
    देषतां मंदिर हुयउ मसांण॥

    (4)

    माह मासइ सीय पडइ ठंठार।
    दाध छइ बनषंड कीधा छइ छार।
    आप दहंती जग दह्मउ।
    म्हाकी चोलीय माहि थी दाधउ गात्र।
    धणीय विहूणी धण ताकिजइ।
    तूंतउ उवइगउरे आविज्यो करइ पलाणि।
    जोबन छत्र उमाहियउ।
    म्हाकी कनक काया माहे फेरली आंण॥

    (5)

    फागुण फरहर्या कंपिया रूख।
    चितइ चकमियउ निसि नीद न भूख।
    दिन रायां रितु पालटी।
    म्हाकउ मूरष राउ न देषइ आइ।
    जीवउं तउ जोबन सही।
    फरहरइ चिहुं दिसि बाजइ छइ बाइ॥

    (6)

    चेत्र मासइ चतुरंगी हे नारि।
    प्रीय विण जीविजइ किसइ अधारि।
    कंचूयउ भीजइ जण हसइ।
    सात सहेलीय बइठी छइ आइ।
    दंत कबाड्या नइ नह रंग्या।
    चालउ सषी आपे षेलण जाइ।
    आज दिसइ स काल्हे नहीं।
    म्हे किउं होली हे षेलण जांह।
    उलगाणइ की गोरडी।
    म्हाकी आंगुली काढतां निगलीजइ बांह॥

    (7)

    वइसाषइ धुर लूणिजइ धान।
    सीला पाणी अरु पाका जी पान।
    कनक काया घट सींचिजइ।
    म्हाकउ मूरष राउ न जाणइ सार।
    हाथ लगामी ताजणउ।
    ऊभउ सेवइ राज दुआरि॥

    (8)

    देषि जेठाणी हिव लागउ छइ जेठ।
    मुह कुमलाणा नइ सूक गया होठ।
    मास दिहाडउ दारुण तवइ।
    धण कउ हे धरणि न लागए पाउ।
    अनल जलइ धण परजलइ।
    हंस सरोवर मेल्हिउ ठांह॥

    (9)

    आसाढइ धुरि बाहुडया मेंह।
    षलहल्या षाल नइ बहि गइ षेह।
    जइ रि आसाढ न आवई।
    माता रे मइगल जेउं पग देइ।
    सद मतवाला जिम दुलइ।
    तिहि धरि ऊलग काइं करेइ॥

    (10)

    स्रावण बरसइ छइ छोटीय धार।
    प्रीय विण जीविजइ किसइ अधारि।
    सही समाणी षेलइ काजली।
    तठइ चिडय कमेडीय मंडिया आस।
    बाबंहियउ प्रीय-प्रीय करइ।
    मोनइ अणष लावइ हो स्त्रावण मास॥

    (11)

    भाद्रवइ बरसइ छइ गुहरि गंभीर।
    जल थल महीयल सहु भर्या नीर।
    जांणि कि सायर ऊलट्यउ।
    निसि अंधारीय बीज षिवाइ।
    बादल धरती स्यउं मिल्या।
    मूरष राउ न देषइ जी आइ।
    हूं ती गोसामी नइ एकली।
    दुइ दुष नाह किउं सहणा जाइ॥

    (12)

    आसोजइ धण मंडिया आस।
    मांडिया मंदिर घर कविलास।
    धउलिया चउवारा चउषंडी।
    साधण धउलिया पउलि पगार।
    गउष चडी हरषी फिरइ।
    जउ घर आविस्यइ मुंध भरतार॥

    (1)

    राजमती ने कहा “चाकर बीसलदेव कार्तिक मास में गया। वह मंदिर घर तथा शयन गृह को छोड़ गया। वह अपनी चौपाल और चोखंडी (चार खंडों का राजभवन) छोड़ गया। तबसे उसके मार्ग में सिर दे रो-रोकर मैंने अपने नेत्र गँवा दिए; मेरी भूख जाती रही, और तृषा भी उचट गई। कहो सखी! फिर नींद कैसे आवे?

    (2)

    मार्गशीर्ष में दिन छोटा होने लगा है। हे सखी! मेरा पति कोई संदेश भी नहीं भेजता है। संदेशों पर मानो वज्रपात हो गया है। मार्ग में ऊँचे पर्वत और गहरी घाटियाँ पड़ती हैं। मेरा पति परदेश गया है। वहाँ से चिट्ठी आती है, और कोई उस मार्ग से जाता है।

    (3)

    हे सखी! देखो, अब पौष लग गया है। इस मरणासन्न स्त्री को कोई दोष मत देना। मैं दुख में दग्ध होकर पंजर मात्र हो गई हूँ। धान भाता नहीं है; शिर का स्नान छोड़ दिया है; छाँह-धूप नहीं भी शरीर अनुभव नहीं करता है, देखते-देखते राजभवन श्मशान हो गया है।

    (4)

    स्रोत :
    • पुस्तक : बीसलदेव रास (पृष्ठ 149)
    • संपादक : अगरचंद नाहटा
    • रचनाकार : नरपति नाल्ह
    • प्रकाशन : हिंदी परिषद् प्रकाशक, प्रयाग
    • संस्करण : 1959

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