केलि-विलास (हेमंत)

चंदबरदाई

केलि-विलास (हेमंत)

चंदबरदाई

और अधिकचंदबरदाई

    क्षीनं वासर स्वास दीघ निसया शीतं जनेतं वने।

    सज्ज संजर वान यौवन तया आनंग आनंगने।

    यउ बाला तरुणी निवृत्तपत्त नलिणी दीना जीवा पिणे।

    मा कांत हिमवंत मत्त गमने प्रमदा आलंबने॥

    दिन साँस-सा छोटा हो रहा है, और रात लंबी होने लगी है। बस्तियों और वनों में शीत व्याप्त हो रहा है। यौवन के कारण शय्या संज्वर-कारिणी हो गई है और काम ही काम का देह पर अधिकार हो गया है। जो बाला तरुणी है, वह निवृत्त-पत्र नलिनी के समान इस प्रकार दीन हो गई है कि क्षण भर भी जीवित रहेगी। हे कंत, मदमस्त हेमंत में मत जाओ क्योंकि यौवना आश्रयहीन हो जाएगी।

    स्रोत :
    • पुस्तक : पृथ्वीराज रासउ (पृष्ठ 249)
    • रचनाकार : चंदबरदाई
    • प्रकाशन : साहित्य-सदन चिरगाँव (झाँसी)
    • संस्करण : 1963

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