कीनौ है प्रसाद, मेटि डार्यो है बिषाद

सेनापति

कीनौ है प्रसाद, मेटि डार्यो है बिषाद

सेनापति

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    कीनौ है प्रसाद, मेटि डार्यो है बिषाद, दौरि

    पाल्यौ प्रहलाद, रछा कीनी दुरदन की।

    दीनन सौं प्रीति, तेरी जानी यह रीति, सेना-

    पति परतीत कीनी तेरीयै सरन की॥

    कीजै गहर, बेग मेरौ दुख हर, मेरे

    आठहू पहर आस रावरे चरन की।

    सूझत और कोई निरभय ठौर राम

    देव सिरमौर, तो लौं दौर मेरे मन की॥

    वह ईश्वर कृपा करता है। वही दुःखों को दूर करता है। उसी ने दुर्दिन में दौड़कर प्रह्लाद की रक्षा की। प्रह्लाद को उसने ही बचाया। वह दोनों से प्रेम रखता है। दीनों से दूसरा कोई प्रेम नहीं करता, किंतु वह तो उन पर भी प्रेम दिखाता है। भगवान का यह व्यवहार जानकर ही मुझे भी भगवान पर विश्वास हुआ है और अब मैं भगवान तेरी शरण में आया हूँ। हे परमेश्वर, आप देर मत कीजिए, शीघ्र मेरा दुःख दूर कीजिए। मुझे तो आठों पहर आपके ही चरणों की आशा लगी रहती है। मुझे अपने उद्धार की आशा केवल आप से ही है। मुझे आपके अलावा और कोई ऐसी जगह, दूसरा कोई ऐसा सूझता ही नहीं है जो मुझे सब प्रकार से निर्भय बना सके। आप देवताओं में सिरताज हैं, सबसे ऊपर हैं, श्रेष्ठ समर्थ हैं इसलिए मेरा मन तो दौड़कर आपके पास ही जाया करता है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : कवित्त रत्नाकर (पृष्ठ 99)
    • रचनाकार : सेनापति
    • प्रकाशन : हिंदी परिषद् प्रकाशक, प्रयाग
    • संस्करण : 1971

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