विपर्यास के रसिक

कुबेर दत्त

विपर्यास के रसिक

कुबेर दत्त

और अधिककुबेर दत्त

    ये शरीरों में सेंध लगाते हैं

    ख़ुद को झाड़ते-पोंछते, छूते तक नहीं

    वे भाषा ख़रीदते-बेचते हैं

    बेचते हैं संस्कृति का तंदूरी संस्करण।

    ख़ुद निखद्द

    भाषाहीन।

    काम ऊर्जा के मानिसक प्रकोष्ठों में

    हैं वे पुराने किराएदार

    जबरन क़ब्ज़ा किए हुए।

    प्रकाशस्तंभों पर दाग़ते हैं

    काली पिचकारियाँ

    वे

    विपर्यास के रसिक...

    मेरुदंड उनका

    नहीं एक सीध में

    नाभि के पीछे भरा है विष-समुद्र

    पर रसिक वे विपर्यास के

    बोलते हैं साखी, सबद, भजन...

    सयाने लोगों को

    अयाने वे

    ढकेलकर चूने की बावड़ी में

    पीते हैं जीवित रक्त

    बैठकर

    असैनिक जुंता मुख्यालयों में।

    हे भाई,

    भारतीय कवि भाई

    देख तू भी

    आसीन हैं वे

    मूर्तियों की जगह

    तेरे मुल्क के शिवालों में

    या कह दे फिर

    भर गया धुआँ

    आँखों में इतना

    कि वहाँ से ढुलक नहीं सकता

    आँसू भी एक।

    सनातन की ज्योति को थामकर

    कहो

    कि नहीं अब चल सकते तुम...

    क्योंकि

    तमाम मृत संप्रदाय

    खड़े हैं अगवा करने को तुम्हें...

    विपर्यास कभी

    होता है औपचारिक

    कभी अनौपचारिक

    वे उसे समारोहों में बदल देते हैं।

    और हम-तुम

    एक बार फिर ढकेल दिए जाते हैं

    ज़िंदगी-मौत की

    शतरंजी पर।

    मनचाहा मोहरा

    उठाता है विपर्यास का रसिक

    हँसता है कटखनी हँसी

    मनचाहा मोहरा चलता है

    मनचाहे घर में।

    स्रोत :
    • पुस्तक : काल काल आपात (पृष्ठ 138)
    • रचनाकार : कुबेर दत्त
    • प्रकाशन : किताब घर
    • संस्करण : 1994

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