सीख

और अधिकअरुण देव

    सच चाहे अप्रिय ही क्यों हो

    कहते रहना अपने सबसे प्रिय से

    अब यही एक रास्ता बचा है दोनों को बचाने का

    महत्वाकांक्षा की बर्बरता और लोभ के अंधड़ में

    जाग्रत रखना अपना विवेक

    संग्रह के ढेर और बाज़ार के शोर से हट कर

    कभी वह संतोष भी रखना

    जो छिपा रहता है संगीत, साहित्य और विचारों की कोख में

    करते रहना प्रयास कि प्रेम

    पशुओं और वनस्पतिओं के लिए भी पनपे

    जैसाकि वे अभी भी भूले नहीं हैं तुम्हें

    देह की सुख-साधना में

    मन का अपरिग्रह भी सीखना

    भारी मन लिए कहाँ जाओगे?

    उत्सव की रौशनी में

    एकांत का मौन अगर सुन सको तो सुनना

    यह भूलना कि लौटाना है तुम्हें

    हवा, जल, मिट्टी, आकाश

    और बार-बार लौटना भी है तुम्हें पृ्थ्वी पर

    अपनी ही संततियों की आँखों में

    यथार्थ की खुरदरी सतह पर

    भविष्य के स्वप्न की गुंजाइश रख सको तो अच्छी बात

    जो रह गए पीछे

    बढ़ा देना उनके लिए हाथ

    ये पुरखों की सीख है

    इसे दुहरा भर रहा हूँ

    कि भुला दिए जाए कहीं

    स्रोत :
    • रचनाकार : अरुण देव
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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