पूरा ग़लत पाठ

स्नेहमयी चौधरी

पूरा ग़लत पाठ

स्नेहमयी चौधरी

और अधिकस्नेहमयी चौधरी

    उत्तराधिकार के नाम पर मिलीं

    कुछ चिट्ठियाँ जिनका जवाब देना है,

    कुछ उधार जो चुकता करना है,

    टूटे लोहे के बक्से, घिसे बरतन, कुछ गूदड़

    जिन्हें देख-देख कर अपने पर स्वयं

    दया दर्शाने से कुछ सिद्ध नहीं होता।

    जिन्हें छोड़ा भी नहीं जा सकता

    और रखने के लिए इस बड़े शहर में

    मकान का एक हिस्सा ही

    ख़ाली किया जा सकता है।

    बिजली का करेंट लगने से

    कमरे में एक चिड़िया ने—मेरे सामने—

    तड़प-तड़प कर जान छोड़ दी।

    बिना रुके हो रही बरसात... जल-ही-जल...

    इन सबके बीच ‘कन्फ़ेस’ करते हुए लगता है—

    बहुत से रास्तों में एक होता है वह

    आकाश तक पहुँचने वाली

    पसंद-नापसंद के बीच

    जिसका बिंदु स्थिर होता है।

    एक ओर जब कि मृत्यु की प्रतीक्षा ही

    उत्तेजना भरती हो,

    दूसरी ओर उस तक घिसटते-घिसटते

    सुबह और शाम की दूरी के घंटे

    उँगलियों पर ही गिने जा सके।

    चीज़ों के ठीक रूप की पहचान करते-करते,

    चीज़ों के सही मायने समझने की कोशिश में,

    उम्र की इस ड्योढ़ी पर पता लगा—

    उसका व्याकरण और अर्थ सभी उलटा था।

    ज़िंदगी के पूरे ग़लत पाठ को

    दुबारा सही ढंग से

    याद कर पाने का साहस जुटा रही हूँ।

    स्रोत :
    • पुस्तक : पूरा ग़लत पाठ (पृष्ठ 68)
    • रचनाकार : स्नेहमयी चौधरी
    • प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन
    • संस्करण : 1976

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