सजगता के साथ आ रही नीचता

हरि मृदुल

सजगता के साथ आ रही नीचता

हरि मृदुल

और अधिकहरि मृदुल

    चेहरे पर यह जो मंद मुस्क़ुराहट है

    बड़े ही क़रीने से छिपी बैठी है इसमें कुटिलता

    अब जल्द ही बदलने जा रही है जो फ़िक-फ़िक करती हँसी में

    ऐसी हँसी कि सामने वाला भी मजबूरन हो-हो-हो करता

    उसमें शामिल हो जाए

    तो इस तरह बड़ी सजगता के साथ रही है नीचता

    कोट की जेब में बैठी थी यह अभी तक

    सफ़ेद रूमाल में छुपी थी

    सुनहरे चश्मे में बसी थी

    जूतों की नोक पर सजी थी नीचता

    उस आदमी ने कोट की जेब में हाथ डाला

    रूमाल निकाला आहिस्ता से

    चश्मे के साफ़ लेंस फिर से साफ़ किए

    फिर एक नज़र जूतों पर मारी

    फिर एक ऐसे कोण से सामने वाले को देखा

    कि सकपका गया सामने वाला

    फिर तो मुखरता से नमूदार हुई नीचता

    कभी काली नज़र आई

    कभी पीली

    कभी लाल

    तो कभी हरी

    इस तरह कितने तो रंग बदलती रही नीचता

    कभी ट्रस्ट बनाती

    कभी एनजीओ शुरू करती

    कॉलेज स्थापित करती

    हॉस्पिटल खोलती

    देसी रंग में दिखती

    फिर अचानक मल्टीनेशनल हो जाती

    पल भर में पाप को पुण्य में बदल देती नीचता

    हर विधि माल कमाना

    उद्देश्य था एकमात्र

    इसीलिए हर क़िस्म का चोगा पहनना मजबूरी

    लेकिन वास्तविक शक्ल तो दिख ही जाती

    और कुटिल अक़्ल भी

    परंतु ज़बरदस्त राजनीति थी नीचता की

    वह सबमें शामिल थी

    सब उसमें शामिल थे

    इस तरह वह बेहद सुविधाजनक स्थिति में थी

    साफ़-साफ़ कहूँ तो सत्ता में थी नीचता

    स्रोत :
    • रचनाकार : हरि मृदुल
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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