अस्पताल के फ़र्श पर

हुकुम ठाकुर

अस्पताल के फ़र्श पर

हुकुम ठाकुर

और अधिकहुकुम ठाकुर

    अस्पताल के फ़र्श पर

    चमक रहा है पसीना

    अस्पताल के उस प्रथम नागरिक का

    जिसके हाथ से पहली-पहली बार

    फिनायल की बोतल

    फ़र्श पर गिरकर फूट गई थी

    जिसे देखकर दीवारों ने कहा था—

    जियो भोले चित्रकार!

    इस पसीने से मिलना

    समुद्र, नमक और उन हड्डियों से मिलना है

    जिनसे मिलकर पृथ्वी ने

    पहली-पहली बार बधाई गाई थी

    और लकदक चैत की बंजारन शाम से पूछा था—

    बड़ी महक रही हो

    कौन-सा इत्र मलती हो

    यही वह जगह है

    जहाँ से पहली बार ब्रह्मसूत्रों ने

    थके हुए पैरों से

    हवा में छलाँग लगाई थी साबुत

    चुपचाप उन दो दोस्तों की बात सुनी थी

    जिनमें शर्त लगी थी

    कि उनके बिवाई भरे हाथों में

    किसके हाथ की रेखाएँ

    ज़्यादा साफ़ और कम खुरदरी दिखाई देती हैं

    यहीं खड़ा था

    वह दयार का प्राचीनतम पेड़

    कि जिसके कंधों पर बैठकर पृथ्वी

    दसो दिशाओं का विस्तार देख आई

    आकर पेड़ की जड़ों में बैठ गई बेफ़िक्र

    जहाँ टोकरी में रखा सूरज

    जलता रहा रात भर

    और जड़ें अपने कपड़ें सुखाती रहीं

    उन कपड़ों का सूखना सुनती रहीं

    वे दो धुँधली आँखें उस प्रथम नागरिक की

    सूखने की उस चटकन को

    बूँद-बूँद पीता रहा—गुनता रहा

    तनकर खड़ा अस्पताल।

    स्रोत :
    • पुस्तक : ध्वनियों के मलबे से (पृष्ठ 9)
    • रचनाकार : हुकुम ठाकुर
    • प्रकाशन : आधार प्रकाशन
    • संस्करण : 2016

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